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भारत के राष्ट्रपति का अभिभाषण

संवैधानिक अधिदेश, संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक जवाबदेही

प्रस्तावना

भारतीय संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति का अभिभाषण केवल एक औपचारिक रस्म नहीं है, बल्कि यह गणतंत्र की सर्वोच्चता और शासन की पारदर्शिता का एक जीवंत प्रतीक है। यह एक ऐसा क्षण होता है जब देश का संवैधानिक प्रमुख (Head of State) और जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि एक छत के नीचे मिलते हैं। प्रत्येक आम चुनाव के बाद नवगठित लोकसभा के प्रथम सत्र और प्रत्येक वर्ष के पहले संसदीय सत्र के आरंभ में राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित किया जाता है। यह संबोधन सरकार की नीतियों का एक विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ कार्यपालिका अपनी उपलब्धियों और भविष्य के विजन को विधायिका के सम्मुख रखती है। यह प्रक्रिया न केवल संसदीय कार्यप्रणाली को दिशा प्रदान करती है, बल्कि संवैधानिक संतुलन को भी सुदृढ़ करती है।

संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 86 और 87 का विश्लेषण

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 86 और 87 राष्ट्रपति को संसद को संबोधित करने की शक्ति और कर्तव्य प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 86(1) राष्ट्रपति को विवेकपूर्ण अधिकार देता है कि वह कभी भी किसी एक सदन या दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित कर सकते हैं। हालांकि, अनुच्छेद 87 ‘विशेष अभिभाषण’ (Special Address) की व्यवस्था करता है, जो अनिवार्य है।

अनुच्छेद 87(1) के अनुसार, राष्ट्रपति के लिए दो अवसरों पर अभिभाषण देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है:

  1. प्रत्येक आम चुनाव के बाद प्रथम सत्र के प्रारंभ में।
  2. प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र (बजट सत्र) के प्रारंभ में।

संविधान के मूल पाठ में यह प्रावधान था कि राष्ट्रपति “प्रत्येक सत्र” के आरंभ में अभिभाषण देंगे, लेकिन 1951 के प्रथम संविधान संशोधन द्वारा इसे “प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र” तक सीमित कर दिया गया ताकि संसदीय समय का बेहतर प्रबंधन हो सके। इस अभिभाषण का मुख्य उद्देश्य संसद को उन कारणों से अवगत कराना होता है जिनके लिए उसे बुलाया गया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और औपनिवेशिक विरासत

भारत में राष्ट्रपति के अभिभाषण की जड़ें ब्रिटिश संसदीय परंपरा ‘स्पीच फ्रॉम द थ्रोन’ (Speech from the Throne) में देखी जा सकती हैं। भारत में इसकी औपचारिक शुरुआत ‘भारत सरकार अधिनियम, 1919’ के माध्यम से हुई। उस समय गवर्नर-जनरल को ‘इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ को संबोधित करने का अधिकार था। 1921 में पहली बार ड्यूक ऑफ कनॉट ने सम्राट की ओर से भारतीय विधायिका को संबोधित किया था। स्वतंत्रता के पश्चात, जब भारत एक संप्रभु गणराज्य बना, तो इस परंपरा को लोकतांत्रिक रंग दिया गया। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद, 31 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में संसद के दोनों सदनों को संबोधित कर इस नई परंपरा की नींव रखी।

अभिभाषण का निर्माण और मंत्रिपरिषद की भूमिका

संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति का अभिभाषण वास्तव में ‘सरकार का अभिभाषण’ होता है। अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। इसलिए, अभिभाषण का मसौदा प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और कैबिनेट सचिवालय द्वारा तैयार किया जाता है। विभिन्न मंत्रालय अपनी योजनाओं और आंकड़ों का विवरण भेजते हैं, जिसे एक नीतिगत दस्तावेज का रूप दिया जाता है।

भले ही राष्ट्रपति को सरकार की किसी नीति से व्यक्तिगत असहमति हो, लेकिन संवैधानिक परंपरा के अनुसार वे वही भाषण पढ़ते हैं जो मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृत होता है। यह संसदीय प्रणाली के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है जहाँ वास्तविक शक्ति निर्वाचित कार्यपालिका के पास होती है और राष्ट्रपति राज्य की एकता और निरंतरता के प्रतीक होते हैं।

वैश्विक तुलना: 

भारतीय राष्ट्रपति का अभिभाषण अन्य देशों की प्रणालियों से प्रेरित तो है, लेकिन इसकी अपनी विशिष्टताएं हैं:

  • ब्रिटेन (Speech from the Throne): ब्रिटेन में राजा या रानी द्वारा संसद के उद्घाटन पर भाषण दिया जाता है। भारतीय व्यवस्था काफी हद तक इसी पर आधारित है, जहाँ सम्राट केवल सरकार द्वारा लिखा गया भाषण पढ़ते हैं।
  • अमेरिका (State of the Union Address): अमेरिकी राष्ट्रपति का संबोधन भारतीय राष्ट्रपति के अभिभाषण से काफी भिन्न है। अमेरिका में राष्ट्रपति स्वयं कार्यपालिका का प्रमुख (Head of Government) होता है, इसलिए उनका भाषण उनके अपने व्यक्तिगत एजेंडे और राजनीतिक विजन को दर्शाता है। वे किसी ‘मंत्रिपरिषद’ की सलाह के बाध्य नहीं होते।
  • भारत का अंतर: भारत में राष्ट्रपति का अभिभाषण अधिक औपचारिक और संवैधानिक है, जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र के एजेंडे को प्रस्तुत करता है।

धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks): विधायी नियंत्रण का उपकरण

अभिभाषण के पश्चात, संसद के दोनों सदनों में ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पर चर्चा होती है। यह चर्चा भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है। विपक्ष को सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करने का अवसर मिलता है, वहीं सत्ता पक्ष अपनी योजनाओं का बचाव करता है।

अनुच्छेद 87(2) के तहत संसद को चर्चा के लिए समय आवंटित करना अनिवार्य है। चर्चा के अंत में प्रधानमंत्री उत्तर देते हैं और फिर प्रस्ताव पर मतदान होता है। यदि धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में गिर जाता है, तो इसे सरकार में ‘अविश्वास’ माना जाता है और प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ सकता है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिका हमेशा विधायिका के प्रति जवाबदेह रहे।

न्यायिक दृष्टिकोण और संवैधानिक सीमाएं

भारतीय न्यायपालिका ने भी समय-समय पर राष्ट्रपति के अभिभाषण की पवित्रता पर टिप्पणी की है। अदालतों का मानना है कि अभिभाषण के दौरान सदन में अनुशासन बनाए रखना अनिवार्य है। ‘योगेंद्र शर्मा बनाम भारत संघ’ जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि राष्ट्रपति अभिभाषण का कुछ हिस्सा नहीं पढ़ते हैं या उसमें कुछ जोड़ते हैं, तो भी उसे संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा, बशर्ते मूल संदेश स्पष्ट हो। हालांकि, संवैधानिक नैतिकता यह कहती है कि राष्ट्रपति को सरकार द्वारा स्वीकृत पाठ का ही पालन करना चाहिए।

राज्यों में राज्यपाल का अभिभाषण (अनुच्छेद 176)

संघ के समान ही, राज्यों में राज्यपाल को भी अनुच्छेद 176 के तहत राज्य विधानसभा के प्रथम सत्र और वर्ष के प्रथम सत्र में अभिभाषण देने का अधिकार है। यहाँ भी राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं। हाल के वर्षों में केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच अभिभाषण के पाठ को लेकर विवाद देखे गए हैं, जिसने सहकारी संघवाद और संवैधानिक मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी है।

अभिभाषण के दौरान ‘व्यवधान’ और संसदीय आचार संहिता

पिछले कुछ दशकों में राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान विपक्षी दलों द्वारा नारेबाजी या बहिर्गमन (Walkout) की घटनाएं बढ़ी हैं। संविधान विशेषज्ञों का तर्क है कि चूंकि राष्ट्रपति पूरे राष्ट्र और संविधान का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उनके संबोधन में बाधा डालना संसदीय गरिमा के विरुद्ध है। पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन और प्रणब मुखर्जी ने कई बार सदस्यों को याद दिलाया कि अभिभाषण के दौरान शांति बनाए रखना एक ‘संवैधानिक कर्तव्य’ है। लोकसभा और राज्यसभा की आचार संहिताएं भी ऐसे आचरण को ‘गंभीर दुराचार’ की श्रेणी में रखती हैं।

निष्कर्ष

राष्ट्रपति का अभिभाषण भारतीय गणतंत्र की सामूहिक चेतना का दर्पण है। यह केवल सरकार का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के भविष्य के निर्माण का एक विजन दस्तावेज है। यह प्रक्रिया हमें याद दिलाती है कि सत्ता परिवर्तनशील है, लेकिन संवैधानिक संस्थाएं और लोकतांत्रिक परंपराएं शाश्वत हैं। धन्यवाद प्रस्ताव के माध्यम से होने वाली चर्चा यह सुनिश्चित करती है कि सरकार की हर नीति जनभावनाओं की कसौटी पर कसी जाए। अंततः, राष्ट्रपति का अभिभाषण संसदीय लोकतंत्र के उस पवित्र धागे को मजबूत करता है जो कार्यपालिका, विधायिका और भारत की जनता को एक सूत्र में पिरोता है।

महत्वपूर्ण तथ्य और कॉन्सेप्ट्स (One-Liners)

  • संवैधानिक अनुच्छेद: अनुच्छेद 86 (संबोधन का अधिकार) और अनुच्छेद 87 (विशेष अभिभाषण का कर्तव्य)।
  • अनिवार्यता: प्रत्येक आम चुनाव के बाद का पहला सत्र और प्रत्येक वर्ष का पहला सत्र।
  • अभिभाषण का मसौदा: सरकार (मंत्रिपरिषद) द्वारा तैयार किया जाता है, राष्ट्रपति केवल पढ़ते हैं।
  • आह्वान के कारण: राष्ट्रपति को संसद को बुलाने के कारणों से अवगत कराना होता है।
  • धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks): यह एक ‘नीतिगत प्रस्ताव’ है जिस पर चर्चा के बाद मतदान होता है।
  • संसदीय परिणाम: यदि धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में पारित नहीं होता, तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।
  • संशोधन का अधिकार: सदस्य धन्यवाद प्रस्ताव में संशोधन का प्रस्ताव रख सकते हैं (राज्यसभा में कई बार ऐसा हुआ है)।
  • प्रथम अभिभाषण: डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा 31 जनवरी 1950 को दिया गया था।
  • संविधान संशोधन: 1951 के प्रथम संशोधन ने “प्रत्येक सत्र” की जगह “वर्ष के प्रथम सत्र” में अभिभाषण को सीमित किया।
  • संयुक्त बैठक: राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण हमेशा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Central Hall) में होता है।
  • कोरम (Quorum): राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए सदन के कोरम की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह ‘सदन की बैठक’ नहीं, बल्कि ‘संबोधन’ है।
  • राज्यपाल की भूमिका: राज्यों में राज्यपाल के लिए समान शक्ति अनुच्छेद 176 के तहत दी गई है।

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