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भारत के विश्वगुरु बनने के लिए आवश्यक भारतीय विचार

21वीं सदी के वैश्विक परिदृश्य में भारत की पहचान एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी है। हाल के वर्षों में ‘विश्वगुरु’ बनने की आकांक्षा भारतीय नीति-निर्माण और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अक्सर दोहराया गया यह स्वप्न न केवल राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, बल्कि एक वैश्विक जिम्मेदारी का आह्वान भी है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल आर्थिक विकास, विशाल जनसंख्या और सैन्य शक्ति किसी राष्ट्र को ‘विश्वगुरु’ बना सकती है? वैश्विक नेतृत्व का मार्ग आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि उन मौलिक विचारों और ढांचों (Frameworks) से होकर गुजरता है, जिन्हें दुनिया स्वीकार करे और अपनाए। यदि भारत वास्तव में वैश्विक शिक्षक बनने की राह पर चलना चाहता है, तो उसे बाहरी अवधारणाओं का ‘कुशल उपभोक्ता’ बनने के बजाय मौलिक भारतीय विचारों का ‘उत्पादक’ बनना होगा।

1. वैचारिक प्रभुत्व का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन राष्ट्रों ने दुनिया पर राज किया, उन्होंने केवल अपनी तलवारों या जहाजों के दम पर ऐसा नहीं किया। उनकी शक्ति का असली स्रोत उनके द्वारा दिए गए ‘विचार’ थे। ब्रिटेन का वैश्विक दबदबा उसके ‘उदारवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र’ के निर्यात के कारण बना। संयुक्त राज्य अमेरिका ने शीत युद्ध के बाद दुनिया को ‘यथार्थवाद’ (Realism) और ‘उदार संस्थागतवाद’ (Liberal Institutionalism) जैसे ढांचे दिए, जिसके आधार पर आज भी अंतरराष्ट्रीय संबंध संचालित होते हैं।

आज चीन भी इसी मार्ग पर अग्रसर है। वह ‘तियानक्सिया’ (Tianxia – सब कुछ स्वर्ग के नीचे) और ‘डिजिटल संप्रभुता’ जैसे विचार पेश कर रहा है, जो पश्चिमी सार्वभौमिकता के विकल्प के रूप में देखे जा रहे हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जो राष्ट्र बहस की शर्तें तय करते हैं, वे ही यह निर्धारित करते हैं कि दूसरे देश क्या विकल्प चुन सकते हैं।

2. उपभोक्ता बनाम उत्पादक: भारत के सामने यथार्थ

वर्तमान में भारत की स्थिति एक ‘कुशल उपभोक्ता’ की अधिक है। हम पश्चिमी अवधारणाओं—चाहे वह लोकतंत्र हो, मानवाधिकार हो, या अंतरराष्ट्रीय कानून—को बहुत ही निपुणता के साथ अपने अनुकूल ढालते हैं, लेकिन हम शायद ही कभी ऐसे नए सिद्धांतों का निर्माण करते हैं जिन्हें दुनिया उद्धृत करे या जिससे दुनिया को अपनी समस्याओं का समाधान मिले।

भारत की विदेश नीति अक्सर यथार्थवाद या रचनावाद जैसे आयातित ढांचों के भीतर काम करती है। यहाँ तक कि क्वाड (Quad) या ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंचों पर भी भारत अपनी सक्षमता तो सिद्ध करता है, लेकिन वैचारिक नेतृत्व के मामले में अभी भी पीछे है। आत्मनिर्भता केवल उत्पादों के निर्माण तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह ‘बौद्धिक आत्मनिर्भरता’ की ओर भी मुड़नी चाहिए।

3. डिजिटल युग: भारत के लिए एक बड़ा अवसर

21वीं सदी तकनीक और डेटा की सदी है। भारत के पास एक अरब से अधिक उपयोगकर्ता और तेजी से बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढांचा है। यह वह क्षेत्र है जहाँ भारत दुनिया के लिए नए प्रतिमान (Norms) स्थापित कर सकता है। जब बात डिजिटल संप्रभुता, निजता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की नैतिकता की आती है, तो भारत के पास मौका है कि वह सिलिकॉन वैली या ब्रुसेल्स की शब्दावली अपनाने के बजाय अपनी परिस्थितियों के अनुकूल नए वैश्विक मानक तय करे। ‘इंडिया स्टैक’ (UPI, आधार आदि) इसका एक सफल उदाहरण है, लेकिन इसे एक व्यापक वैचारिक दर्शन में बदलने की आवश्यकता है।

4. प्राचीन दर्शन और आधुनिक कूटनीति का मेल

भारत का ‘विश्वगुरु’ बनने का दावा उसके प्राचीन ज्ञान और दर्शन पर आधारित है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (दुनिया एक परिवार है) और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ केवल नारे नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक वैश्विक शासन व्यवस्था के आधार बन सकते हैं।

  • सतत विकास: पश्चिमी उपभोगवादी संस्कृति के विपरीत, भारतीय जीवन शैली प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की बात करती है। भारत ‘मिशन लाइफ’ (LiFE) जैसे विचारों के माध्यम से दुनिया को जलवायु परिवर्तन से लड़ने का एक नया ‘इंडियन मॉडल’ दे सकता है।
  • योग और आयुर्वेद: ये भारत की सॉफ्ट पावर के स्तंभ हैं, लेकिन इन्हें वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे (Global Healthcare Framework) के मुख्य विमर्श में शामिल करने के लिए और अधिक वैज्ञानिक अनुसंधान और वैचारिक दस्तावेजीकरण की जरूरत है।

5. अंत्योदय और लोकतंत्र का भारतीय स्वरूप

पश्चिमी लोकतंत्र अक्सर व्यक्तिवाद पर केंद्रित होता है, जबकि भारतीय लोकतंत्र का मूल ‘सामूहिकता’ और ‘विविधता में एकता’ है। भारत का ‘अंत्योदय’ (अंतिम व्यक्ति का उदय) का विचार समाजवाद और पूंजीवाद के बाइनरी से परे जाकर समावेशी विकास का एक नया रास्ता दिखाता है। अगर भारत अपनी विकास गाथा के इस हिस्से को वैश्विक सिद्धांतों के रूप में विकसित कर सके, तो वह उन विकासशील देशों (Global South) का नेतृत्व कर सकता है जो पश्चिमी मॉडलों से निराश हैं।

6. चुनौतियां: शिक्षा और अनुसंधान की कमी

विश्वगुरु बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा हमारे भीतर की बौद्धिक उदासीनता है। भारतीय विश्वविद्यालय और संस्थान अभी भी उन शोधों और सिद्धांतों को प्राथमिकता देते हैं जो पश्चिम में पहले से स्वीकृत हैं। जब तक हमारा शिक्षा तंत्र ‘गहन चिंतन’ (Deep Thinking) के बजाय केवल सूचना के प्रसंस्करण पर केंद्रित रहेगा, हम मौलिक विचार पैदा नहीं कर पाएंगे। ‘ब्रेन ड्रेन’ का एक कारण यह भी है कि भारत का बौद्धिक पारिस्थितिकी तंत्र मौलिक विचारों को वह सम्मान और संसाधन नहीं देता जो पश्चिमी देश देते हैं।

7. विश्वमित्र से विश्वगुरु तक का सफर

हाल ही में भारत ने अपनी छवि को ‘विश्वगुरु’ (शिक्षक) से ‘विश्वमित्र’ (दुनिया का मित्र) की ओर भी मोड़ने का प्रयास किया है। यह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव है क्योंकि ‘गुरु’ शब्द कभी-कभी संरक्षक या पितृसत्तात्मक लग सकता है, जो पड़ोस के छोटे देशों को असहज कर सकता है। वास्तविक ‘विश्वगुरु’ वह है जो दूसरों को सिखाने का दिखावा न करे, बल्कि अपने आचरण और विचारों से दूसरों को प्रेरित करे।

8. निष्कर्ष: नारों से हटकर क्रियान्वयन की ओर

विश्वगुरु कोई ऐसी उपाधि नहीं है जिसे कोई राष्ट्र खुद को दे सके; यह वह सम्मान है जो दुनिया किसी राष्ट्र के योगदान और उसकी वैचारिक स्पष्टता को देखकर उसे देती है। भारत के पास ज्ञान का भंडार है, युवा ऊर्जा है और एक सफल लोकतंत्र का अनुभव है। लेकिन इन सबके बावजूद, हमें एक ऐसे ‘आइडिया इकोसिस्टम’ की जरूरत है जो जोखिम लेने वाले विचारकों को प्रोत्साहित करे

अगर हमें 2047 तक विकसित भारत के साथ-साथ एक प्रभावशाली ‘विश्वगुरु’ बनना है, तो हमें अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के साथ-साथ अपनी ‘वैचारिक शक्ति’ का लोहा मनवाना होगा। हमें ऐसे सिद्धांत गढ़ने होंगे जो आने वाली सदियों की वैश्विक व्यवस्था का आधार बनें। अंततः, भारत की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वह पश्चिम की कितनी अच्छी नकल करता है, बल्कि इस पर निर्भर करेगी कि वह दुनिया को क्या नया और मौलिक दे पाता है।


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