in ,

भारत–ग्रीस संबंध: ऐतिहासिक विरासत से उभरती रणनीतिक साझेदारी तक

बदलता वैश्विक संदर्भ और भारत–ग्रीस समीकरण

भारत और ग्रीस दो ऐसे राष्ट्र हैं, जिनकी सभ्यतागत पहचान, समुद्री परंपरा और भू-रणनीतिक स्थिति उन्हें स्वाभाविक साझेदार बनाती है। एक ओर भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक उभरती शक्ति है, वहीं ग्रीस पूर्वी भूमध्यसागर में एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक केंद्र है।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच संबंधों का संस्थागत और रणनीतिक विस्तार इस बात का संकेत है कि द्विपक्षीय संबंध अब प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर संरचित रणनीतिक सहयोग की दिशा में विकसित हो रहे हैं।

भारतग्रीस संबंधों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत और ग्रीस के बीच संपर्कों का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। यह संबंध आधुनिक राज्य-व्यवस्था से बहुत पहले स्थापित हो चुके थे, जब व्यापार, संस्कृति और दार्शनिक आदान-प्रदान के माध्यम से सभ्यताएँ एक-दूसरे से जुड़ती थीं।

  • प्राचीन संपर्क और सिकंदर का अभियान: 326 ईसा पूर्व में सिकंदर का उत्तर-पश्चिम भारत तक पहुँचना इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। यद्यपि उसका सैन्य अभियान राजनीतिक दृष्टि से अल्पकालिक था, परंतु इससे भारत और यूनानी विश्व के बीच स्थायी सांस्कृतिक और वैचारिक संपर्कों की नींव पड़ी। सिकंदर के अभियान के बाद उत्पन्न हेलेनिस्टिक प्रभावों ने भारतीय उपमहाद्वीप में कला, स्थापत्य और शिल्प पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला।
  • मौर्य काल और राजनयिक संबंध: चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज का उल्लेख भारतीय इतिहास में मिलता है। मेगस्थनीज की कृति इंडिका भारत के राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक ढाँचे का एक महत्त्वपूर्ण बाह्य विवरण प्रस्तुत करती है।
  • गांधार कला और सांस्कृतिक समन्वय: इसमें यूनानी यथार्थवाद और भारतीय धार्मिक प्रतीकों का अद्वितीय मिश्रण दिखाई देता है। बुद्ध की मूर्तियों में हेलेनिस्टिक प्रभाव इस सांस्कृतिक समन्वय का सजीव प्रमाण हैं।

आधुनिक काल में संबंधों का पुनर्परिभाषण

  • स्वतंत्रता के बाद भारत और ग्रीस के संबंध सौहार्दपूर्ण रहे, परंतु लंबे समय तक वे सीमित दायरे में ही रहे।
  • शीत युद्ध की राजनीति, भौगोलिक दूरी और प्राथमिकताओं के अंतर के कारण संबंधों में रणनीतिक गहराई अपेक्षाकृत कम रही।
  • हालाँकि 21वीं सदी के दूसरे दशक के बाद परिस्थितियाँ बदलने लगीं। भारत की वैश्विक भूमिका में वृद्धि, यूरोप के साथ संबंधों का विस्तार, तथा भूमध्यसागर क्षेत्र के भू-राजनीतिक महत्व ने ग्रीस को भारत की विदेश नीति में अधिक प्रासंगिक बना दिया।
  • अगस्त 2023 में भारत–ग्रीस संबंधों को औपचारिक रूप से रणनीतिक साझेदारी तक उन्नत किया गया।
  • यह केवल एक कूटनीतिक घोषणा नहीं थी, बल्कि संबंधों के स्वरूप में गुणात्मक परिवर्तन का संकेत था।
  • इस उन्नयन ने रक्षा, सुरक्षा, संपर्क और आर्थिक सहयोग के लिए एक संस्थागत ढाँचा प्रदान किया।

बदलता वैश्विक संदर्भ और भारतग्रीस समीकरण

भारत–ग्रीस संबंधों को समझने के लिए व्यापक वैश्विक और क्षेत्रीय संदर्भों को ध्यान में रखना आवश्यक है। आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ प्रमुख प्रवृत्तियाँ इस संबंध को विशेष महत्व प्रदान करती हैं।

  • बहुध्रुवीयता और रणनीतिक स्वायत्तता: विश्व राजनीति में शक्ति का संतुलन पुनर्गठित हो रहा है। अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा, यूरोप की सामरिक पुनर्संरचना और एशिया के बढ़ते महत्व ने मध्यम शक्तियों के लिए नए अवसर उत्पन्न किए हैं। भारत और ग्रीस दोनों ही नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और रणनीतिक स्वायत्तता के समर्थक हैं।
  • समुद्री भूराजनीति का उदय: समुद्री मार्ग, आपूर्ति श्रृंखलाएँ और ऊर्जा परिवहन वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। हिंद महासागर और भूमध्यसागर दोनों ही विश्व व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस संदर्भ में भारत और ग्रीस की समुद्री पहचान और क्षमताएँ उन्हें स्वाभाविक साझेदार बनाती हैं।
  • संपर्क गलियारे और आर्थिक पुनर्संतुलन: भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे पहल वैश्विक संपर्क संरचना को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। ग्रीस, यूरोप के प्रवेशद्वार के रूप में, इस परियोजना में एक संभावित केंद्रीय भूमिका निभा सकता है।

ग्रीस का भूरणनीतिक महत्व: भारत के दृष्टिकोण से

ग्रीस की भौगोलिक स्थिति उसे एक असाधारण रणनीतिक महत्व प्रदान करती है। वह यूरोप, एशिया और अफ्रीका के संगम पर स्थित है। पूर्वी भूमध्यसागर में उसकी स्थिति निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:

  • यूरोप की आपूर्ति श्रृंखलाओं का प्रवेश बिंदु
  • ऊर्जा परिवहन मार्गों की निकटता
  • नाटो एवं यूरोपीय संघ की सदस्यता
  • क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में भूमिका

भारत के लिए, ग्रीस केवल एक द्विपक्षीय साझेदार नहीं, बल्कि यूरोप तक पहुँच की एक रणनीतिक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।

रक्षा सहयोग, सैन्य कूटनीति और सुरक्षा आयाम

भारत–ग्रीस रक्षा सहयोग को समझने के लिए यह आवश्यक है कि इसे व्यापक वैश्विक शक्ति-संतुलन, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, तथा भारत की रक्षा कूटनीति के परिवर्तित दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा जाए।

भारत और ग्रीस के बीच रक्षा संपर्क पहले भी रहे हैं, परंतु वे सीमित, अवसरवादी और असंरचित थे। हाल के वर्षों में स्थिति में एक गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिला है, विशेषकर निम्नलिखित घटनाओं के बाद:

  • द्विपक्षीय उच्च-स्तरीय रक्षा वार्ताएँ
  • संयुक्त आशय घोषणा (Joint Declaration of Intent – JDI)
  • सैन्य सहयोग योजनाओं का औपचारिक आदान-प्रदान
  • समुद्री सुरक्षा ढाँचों में सहभागिता

यह परिवर्तन एक महत्वपूर्ण संकेत देता है कि संबंध अब संवादआधारित होकर संस्थागत और समयबद्ध सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं।

आत्मनिर्भर भारत और ग्रीस का एजेंडा 2030

भारत की रक्षा नीति का प्रमुख स्तंभ आत्मनिर्भर भारत है, जिसका उद्देश्य रक्षा उत्पादन में स्वदेशीकरण, प्रौद्योगिकी विकास और निर्यात क्षमता को बढ़ाना है। ग्रीस भी अपने Agenda 2030 रक्षा सुधार कार्यक्रम के तहत रक्षा आधुनिकीकरण और औद्योगिक क्षमता विस्तार पर बल दे रहा है।

दोनों देशों की नीतियों में यह समानता सहयोग के लिए एक स्वाभाविक आधार तैयार करती है-

भारत की प्राथमिकताएँग्रीस की प्राथमिकताएँ
स्वदेशी रक्षा उत्पादनरक्षा उद्योग आधुनिकीकरण
तकनीकी साझेदारीयूरोपीय रक्षा नेटवर्क से जुड़ाव
निर्यात क्षमताउद्योग पुनर्संरचना

यह नीतिगत अभिसरण रक्षा सहयोग को केवल सामरिक न रखकर औद्योगिकरणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित करता है।

रक्षा औद्योगिक सहयोग: संभावनाएँ और रणनीतिक लाभ

भारत विश्व के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में रहा है, परंतु अब उसका लक्ष्य सह-विकास और सह-उत्पादन की दिशा में है। ग्रीस, यूरोपीय संघ का सदस्य होने के कारण, भारत को निम्नलिखित लाभ दे सकता है:

  • यूरोपीय रक्षा प्रौद्योगिकियों तक अप्रत्यक्ष पहुँच
  • संयुक्त अनुसंधान एवं विकास
  • रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश
  • विशिष्ट समुद्री एवं नौसैनिक प्रणालियों में सहयोग

ग्रीस की विशेषज्ञता विशेष रूप से समुद्री प्रणालियों, जहाज़रानी और नौसैनिक तकनीकों में उल्लेखनीय है।

समुद्री भूराजनीति, इंडोपैसिफिकमेडिटेरेनियन कनेक्शन और IMEC

भारत हिंद महासागर क्षेत्र का केंद्रीय शक्ति-ध्रुव है, जबकि ग्रीस पूर्वी भूमध्यसागर और एजियन क्षेत्र का एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र है। इन दोनों के बीच सहयोग केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि व्यापक समुद्री सुरक्षा संरचना और वैश्विक संपर्क प्रणाली का हिस्सा बनता जा रहा है।

समकालीन विश्व में समुद्री क्षेत्र तीन कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है:

  1. वैश्विक व्यापार का केंद्र – लगभग 80–90% वैश्विक व्यापार समुद्री मार्गों से होता है।
  2. ऊर्जा सुरक्षा – तेल, गैस और उभरते हरित ईंधन समुद्री परिवहन पर निर्भर हैं।
  3. सैन्य रणनीति – नौसैनिक शक्ति वैश्विक प्रभाव का प्रमुख साधन बन चुकी है।

भारत और ग्रीस दोनों इन तीनों आयामों में सक्रिय भूमिका रखते हैं।

भारत और ग्रीस: दो समुद्री सभ्यताओं का अभिसरण

() भारत की समुद्री दृष्टि

भारत की समुद्री रणनीति बहुआयामी है:

  • हिंद महासागर में स्थिरता और सुरक्षा
  • समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा (Sea Lanes of Communication – SLOCs)
  • SAGAR सिद्धांत (Security and Growth for All in the Region)
  • इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI)
  • समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA)

भारत स्वयं को एक “नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर” के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।

() ग्रीस की समुद्री पहचान

ग्रीस विश्व की सबसे बड़ी व्यापारी नौवहन शक्तियों में से एक है। उसकी विशेषताएँ:

  • वैश्विक शिपिंग टननेज में प्रमुख हिस्सेदारी
  • भूमध्यसागर के सामरिक मार्गों पर स्थिति
  • यूरोपीय समुद्री व्यापार में केंद्रीय भूमिका
  • नौसैनिक परंपरा और तकनीकी विशेषज्ञता

ग्रीस का समुद्री अनुभव भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

IMEC: संपर्क राजनीति में ग्रीस की केंद्रीय भूमिका

भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण संपर्क पहलों में से एक माना जा रहा है।

IMEC के प्रमुख उद्देश्य

  • एशिया–यूरोप व्यापार को सुगम बनाना
  • आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण
  • वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करना
  • भू-राजनीतिक संतुलन स्थापित करना

ग्रीस की भौगोलिक स्थिति उसे IMEC का संभावित अंतिम यूरोपीय नोड बनाती है इसलिए, ग्रीस के बंदरगाह, विशेषकर पिराएस, इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

बहुध्रुवीय विश्व और संतुलन राजनीति

समकालीन विश्व राजनीति का एक प्रमुख लक्षण है – बहुध्रुवीयता (Multipolarity)। अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा, रूस–पश्चिम तनाव, तथा यूरोप की सामरिक पुनर्संरचना ने मध्यम शक्तियों के लिए नई कूटनीतिक संभावनाएँ उत्पन्न की हैं।

भारत और ग्रीस दोनों ही निम्नलिखित सिद्धांतों के समर्थक हैं:

  • रणनीतिक स्वायत्तता
  • नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था
  • संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान
  • संतुलित साझेदारियाँ

इस वैचारिक समानता से दोनों देशों के बीच सहयोग का आधार मजबूत होता है।

तुर्कीग्रीस प्रतिद्वंद्विता और भारत का दृष्टिकोण

ग्रीस और तुर्की के बीच ऐतिहासिक, भौगोलिक और सामरिक मतभेद लंबे समय से मौजूद हैं। एजियन सागर, साइप्रस, तथा समुद्री अधिकार क्षेत्र इन विवादों के प्रमुख विषय रहे हैं।

भारत प्रत्यक्ष रूप से इन विवादों का पक्षकार नहीं है, परंतु निम्नलिखित कारणों से यह समीकरण भारत के लिए प्रासंगिक है:

  1. तुर्कीपाकिस्तान निकटता – तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा एवं राजनीतिक सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय रहा है।
  2. रणनीतिक संतुलन का अवसर – ग्रीस के साथ निकटता भारत को क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से लाभ दे सकती है।
  3. राजनयिक संकेत – यह सहयोग भारत की बहुध्रुवीय संतुलन नीति का उदाहरण बनता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की नीति प्रतिद्वंद्विता आधारित नहीं, बल्कि हित आधारित और संतुलित है।

साइप्रस मुद्दा और भारत की स्थिति

ग्रीस और तुर्की के बीच साइप्रस प्रश्न एक प्रमुख विवाद का विषय है। भारत का दृष्टिकोण परंपरागत रूप से निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित रहा है:

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का सम्मान
  • द्वि-क्षेत्रीय, द्वि-सामुदायिक संघीय समाधान का समर्थन
  • अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप समाधान

यह रुख भारत की नियमआधारित व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो ग्रीस के दृष्टिकोण से सामंजस्य रखता है।

भारतग्रीस संबंध की प्रमुख चुनौतियाँ

  • भारत और ग्रीस के बीच व्यापारिक संबंध उनकी रणनीतिक निकटता की तुलना में अत्यंत सीमित हैं। व्यापार संरचना में विविधता का अभाव, निवेश प्रवाह का अभाव आदि की यह स्थिति रणनीतिक साझेदारी की आर्थिक नींव को कमजोर करती है।
  • प्रत्यक्ष समुद्री और हवाई संपर्कों की कमी व्यापार एवं सहयोग के विस्तार में बाधक है।
  • ग्रीस के प्रमुख बंदरगाह पिराएस पर चीनी कंपनी COSCO का नियंत्रण भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से एक संवेदनशील प्रश्न प्रस्तुत करता है।
  • रणनीतिक साझेदारी के बावजूद भारत–ग्रीस संबंधों में अभी भी नियमित उच्च-स्तरीय तंत्रों की कमी है।
  • दोनों देशों के बीच दूरी और पारस्परिक आर्थिक–सांस्कृतिक जागरूकता की कमी भी संबंधों के विस्तार को प्रभावित करती है।
  • चुनौतियों के बावजूद भारत–ग्रीस संबंधों में कई महत्वपूर्ण अवसर निहित हैं।

आगे की राह

  • भारत–ग्रीस संबंधों को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए आर्थिक आयाम को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
  • भारत–ग्रीस संबंध अभी विकासशील अवस्था में हैं, परंतु उनमें दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता निहित है। यदि दोनों देश आर्थिक, संपर्क, और संस्थागत चुनौतियों को दूर करते हैं, तो यह साझेदारी हिंद-प्रशांत और यूरोप के बीच एक स्थायी रणनीतिक सेतु बन सकती है।

निष्कर्ष 

  • भारत–ग्रीस संबंध एक महत्वपूर्ण परिवर्तनशील चरण से गुजर रहे हैं, जहाँ ऐतिहासिक और सभ्यतागत संपर्क अब ठोस रणनीतिक सहयोग में रूपांतरित हो रहे हैं। हाल के वर्षों में रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा सहभागिता और संपर्क गलियारों (विशेषकर IMEC) के संदर्भ में उभरी निकटता यह दर्शाती है कि दोनों देश संबंधों को दीर्घकालिक और संरचित आधार पर विकसित करने के इच्छुक हैं।
  • ग्रीस, भारत के लिए केवल एक द्विपक्षीय साझेदार नहीं, बल्कि यूरोप तक पहुँच का एक रणनीतिक प्रवेशद्वार, समुद्री संपर्क का प्रमुख केंद्र, तथा भूमध्यसागर क्षेत्र में संतुलनकारी सहयोगी के रूप में उभर रहा है। वहीं भारत, ग्रीस के लिए एक विश्वसनीय, उभरती वैश्विक शक्ति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अवसरों का द्वार प्रस्तुत करता है।
  • यद्यपि आर्थिक संबंधों की सीमाएँ, संपर्क बाधाएँ और भू-राजनीतिक जटिलताएँ चुनौतियाँ उत्पन्न करती हैं, परंतु साझा हितों, नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थन और बहुध्रुवीय विश्व में संतुलनकारी कूटनीति की आवश्यकता इन संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में प्रेरित करती है।
  • यदि दोनों देश संस्थागत संवाद तंत्रों को मजबूत करें, आर्थिक एवं लॉजिस्टिक सहयोग का विस्तार करें, तथा समुद्री और रक्षा क्षेत्रों में दीर्घकालिक रणनीति अपनाएँ, तो भारत–ग्रीस साझेदारी भविष्य में हिंद-प्रशांत और यूरोप के बीच एक स्थायी रणनीतिक सेतु के रूप में स्थापित हो सकती है।

 

 


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

भारत एवं AI क्रांति के वैश्विक परिणाम