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भारत में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव व्यवस्था’ (One Nation, One Election) पर विवाद

क्या है ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव व्यवस्था’ (One Nation, One Election)?

9 मार्च 2026 को एक राष्ट्र–एक चुनाव (ONOE) के मुद्दे पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में इस प्रस्ताव से जुड़े विभिन्न संवैधानिक, राजनीतिक और प्रशासनिक पहलुओं पर चर्चा की गई।

बैठक के दौरान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री Ghulam Nabi Azad ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि वन नेशन, वन इलेक्शन देश के लिए लाभकारी साबित हो सकता है। उनके अनुसार, यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराए जाएँ तो इससे शासन की निरंतरता बनी रहेगी, चुनावी खर्च कम होगा और विकास कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।

एक राष्ट्र, एक चुनाव व्यवस्था क्या है

  • देश में एक राष्ट्र, एक चुनाव की संभावना का अध्ययन करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति Ram Nath Kovind की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई थी।
  • इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि भारत में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएँ, और इस प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भी मंजूरी दे दी है।
  • एक राष्ट्र, एक चुनाव का विचार ऐसी चुनाव प्रणाली स्थापित करने का है जिसमें पूरे देश में केंद्र और राज्यों के चुनाव एक ही समय पर आयोजित हों। इसके लिए वर्तमान चुनाव चक्र को पुनर्गठित करना पड़ेगा ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों का समय एक-दूसरे से मेल खा सके।
  • इसका मतलब यह होगा कि मतदाता एक ही दिन या एक ही चुनावी अवधि के दौरान लोकसभा और राज्य विधानसभा दोनों के लिए मतदान कर सकेंगे, चाहे मतदान एक दिन में हो या कई चरणों में।
  • अभी की व्यवस्था में चुनाव तब कराए जाते हैं जब किसी सरकार का पाँच साल का कार्यकाल पूरा हो जाता है या किसी कारण से सरकार पहले ही भंग हो जाती है।
  • इसी वजह से भारत में लोकसभा और अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, जिससे उनके कार्यकाल में समानता नहीं रहती।

एक राष्ट्र, एक चुनाव की पृष्ठभूमि 

  • केंद्र सरकार, राज्य सरकारों एवं राजनीतिक दलों के साथ-साथ भारतीय निर्वाचन आयोग के प्रयासों से वर्ष 1957 में सात राज्यों, यथा- बिहार, बॉम्बे, मद्रास, मैसूर, पंजाब, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में एक साथ चुनाव हुए।
  • वर्ष 1967 के चौथे आम चुनावों तक सामान्यत: एक साथ चुनाव प्रचलन में थे।
  • हालाँकि, इसके बाद कई अवसरों पर केंद्र सरकारों ने संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग कर राज्य सरकारों को उनके कार्यकाल की समाप्ति से पहले ही बर्खास्त कर दिया और राज्यों व केंद्र में गठबंधन सरकारों के विफल रहने पर देश में अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।
  • वर्ष 1983 में चुनाव आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने का विचार प्रकट किया गया था।
  • वर्ष 1999 में विधि आयोग की रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख किया गया था। वर्तमान सरकार वर्ष 2014 से ही इस पर बल दे रही है।
  • अप्रैल 2018 में विधि आयोग के कार्य पत्र में उल्लेख किया गया था कि एक राष्ट्र, एक चुनाव को व्यावहारिक रूप देने के लिए कम-से-कम ‘पाँच संवैधानिक संशोधनों’ की आवश्यकता होगी।

एक राष्ट्रएक चुनाव: उद्देश्य और चुनौतियाँ

  • एक साथ चुनाव कराने के पक्षधर यह तर्क देते हैं कि इससे चुनावी खर्च कम होगा, सुरक्षा बलों की लगातार तैनाती से राहत मिलेगी और चुनावी आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में होने वाली बाधाएँ कम होंगी।
  • भारत की संसदीय प्रणाली में सरकार का अस्तित्व संसद के विश्वास पर निर्भर करता है। संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाते हैं, जबकि अनुच्छेद 83 और 172 केवल अधिकतम पाँच वर्ष की अवधि निर्धारित करते हैं। इसलिए यदि सरकार बहुमत खो देती है तो विधानसभा भंग करके नए चुनाव कराए जा सकते हैं।
  • प्रस्तावित 129वाँ संविधान संशोधन विधेयक में ‘अधूरे कार्यकाल के चुनाव’ (Unexpired-term elections) का विचार शामिल है, जिसके अनुसार समय से पहले भंग हुई विधानसभा का नया कार्यकाल केवल शेष अवधि तक ही रहेगा।
  • इससे मतदाताओं के जनादेश का महत्व कम हो सकता है और अल्पकालिक सरकारें दीर्घकालिक नीतियाँ बनाने से बच सकती हैं।

ONOE और संसाधनों की मांग

ONOE के समर्थक चुनावी खर्च को बड़ा मुद्दा बताते हैं।

लेकिन वास्तविकता में:

  • लोकसभा और विधानसभा चुनावों का कुल खर्च लगभग ₹4500 करोड़ है।
  • यह केंद्र सरकार के बजट का लगभग 0.25% और GDP का लगभग 0.03% है।

भारत की चरणबद्ध चुनाव प्रणाली से EVM, VVPAT, और सुरक्षा बल को अलग-अलग राज्यों में घुमाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव होंगे तो संसाधनों की मांग बढ़ सकती है।

लोकतंत्र में स्थिरता और जवाबदेही

  • भारत का संविधान स्थिरता से अधिक जवाबदेहीता को महत्व देता है।
  • संविधान सभा में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र में स्थिरता और जवाबदेही दोनों को एक साथ अधिकतम स्तर पर हासिल नहीं किया जा सकता।
  • इसलिए अनुच्छेद 75 और 164 के माध्यम से कार्यपालिका को विधायिका के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार बनाते हैं।
  • अनुच्छेद 83 और 172 के माध्यम से संसद और विधानसभाओं के लिए केवल अधिकतम 5 वर्ष की अवधि तय करते हैं, निश्चित कार्यकाल नहीं।
  • इसका अर्थ है कि यदि सरकार बहुमत खो दे तो विधानसभा भंग हो सकती है और नए चुनाव हो सकते हैं।

अधूरे कार्यकाल वाले चुनाव (Unexpired-Term Elections)

129वां संविधान संशोधन विधेयक 2024 (रामनाथ कोविंद समिति की सिफारिशों पर आधारित) में एक व्यवस्था प्रस्तावित है।

यदि कोई विधानसभा समय से पहले भंग हो जाए, तो नई सरकार केवल शेष बचे हुए कार्यकाल तक ही सत्ता में रहेगी।

इससे कई समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं:

  1. मतदाताओं के अधिकार का महत्व कम हो जाएगा क्योंकि सरकार का कार्यकाल छोटा होगा।
  2. छोटी अवधि की सरकारें दीर्घकालिक नीतियाँ बनाने से बच सकती हैं।
  3. यदि बहुत कम समय बचा हो तो शासन में नीतिगत ठहराव (policy dead zone) पैदा हो सकता है।

राज्यों में चुनाव टालने के लिए अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) लंबे समय तक लागू रह सकता है।

केंद्र में लंबा caretaker government चरण भी पैदा हो सकता है, जो अनुच्छेद 85 के तहत संसद की बैठक की संवैधानिक आवश्यकता से टकरा सकता है।

विवेकाधीन शक्तियाँ और दुरुपयोग का जोखिम

  • प्रस्तावित अनुच्छेद 82A के अनुसार यदि एक साथ चुनाव कराना संभव न हो तो भारत का चुनाव आयोग चुनाव टालने की सिफारिश कर सकता है।
  • लेकिन इसमें स्पष्ट मानदंड नहीं हैं, समय सीमा तय नहीं है और संसद की निगरानी का प्रावधान नहीं है
  • इससे यह संभावना बनती है कि किसी राज्य में सरकार गिर जाए, राष्ट्रपति शासन लगे और चुनाव राष्ट्रीय चक्र के साथ मिलाने के लिए टाल दिए जाएँ।
  • अमेरिकी विचारक अलेक्ज़ेंडर हैमिल्टन ने Federalist No. 59 में कहा था कि किसी प्रावधान का दुरुपयोग होने की संभावना ही संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर कर सकती है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India मामले में भी कहा कि संविधान की वैधता संस्थागत ढाँचे पर निर्भर करती है, केवल अच्छे इरादों पर नहीं।

वैश्विक अनुभव से सीख

  • 2019 में इंडोनेशिया ने राष्ट्रपति, राष्ट्रीय संसद, क्षेत्रीय संसद और स्थानीय परिषदों के चुनाव एक साथ कराए।
  • इसका उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना और खर्च कम करना था।
  • लेकिन परिणामस्वरूप चुनावी व्यवस्था पर अत्यधिक दबाव पड़ा, लगभग 900 चुनाव कर्मियों की मृत्यु हो गई, और हजारों लोग बीमार पड़ गए।

2024 में भी समस्याएँ जारी रहने के बाद इंडोनेशिया की संवैधानिक अदालत ने 2029 से राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव अलग-अलग कराने का आदेश दिया।

अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी स्थिर शासन के लिए एक साथ चुनाव जरूरी नहीं हैं।

  • कनाडा में संघीय और प्रांतीय चुनाव अलग-अलग होते हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया में यह संभव ही नहीं है क्योंकि राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल चार वर्ष निश्चित है, जबकि संघीय संसद का कार्यकाल अलग है।
  • जर्मनी में स्थिरता “Constructive Vote of No Confidence” से सुनिश्चित होती है, जिसमें चांसलर को हटाने से पहले नए नेता का चुनाव करना अनिवार्य होता है।

जर्मनी के राज्यों में चुनाव जानबूझकर अलग-अलग समय पर कराए जाते हैं, ताकि संघीय ढाँचा मजबूत रहे।

चुनाव प्रणाली और लोकतांत्रिक सुरक्षा का सम्बन्ध

  • दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे देशों में प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन प्रणाली है, जिससे कई दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है और अल्पसंख्यक समूहों की आवाज़ सुरक्षित रहती है।
  • भारत में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली है।
  • यदि चुनाव एक साथ होंगे तो राष्ट्रीय स्तर की लहर, संसद और राज्यों दोनों में एक ही दल को भारी जीत दिला सकती है
  • इससे क्षेत्रीय दल कमजोर हो सकते हैं, राजनीतिक विविधता घट सकती है
  • अमेरिका का उदाहरण भी पूरी तरह लागू नहीं होता क्योंकि वहाँ राष्ट्रपति प्रणाली है, जहाँ कार्यपालिका संसद के विश्वास पर निर्भर नहीं होती।
  • भारत में संसदीय प्रणाली है जहाँ सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए संसद का विश्वास बनाए रखना पड़ता है।

आगे की राह 

  • एक साथ चुनाव कराने के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति का अभाव है।
  • ऐसे में आदर्श मध्य मार्ग यह हो सकता है कि लोकसभा चुनाव एक चक्र में और सभी राज्य विधानसभा चुनाव ढाई साल बाद दूसरे चक्र में कराए जाएं।
  • इससे यह सुनिश्चित होगा कि लोकतांत्रिक और संघीय सिद्धांतों से समझौता किए बिना एक साथ चुनाव कराने के लाभ प्राप्त किए जा सकें।
  • यदि सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लिया जाए तो यह व्यवस्था अगले दशक में लागू किए जाने के साथ ही उसके बाद भी इसे जारी रखा जा सकता है।

निष्कर्ष

  • एक साथ चुनाव कराने से संघवाद (फेडरलिज़्म) कमजोर पड़ सकता है, विधायिका की जवाबदेही कम हो सकती है और भारत के संसदीय लोकतंत्र के संतुलन में बदलाव आ सकता है।
  • वन नेशन, वन इलेक्शन (ONOE) का प्रस्ताव प्रशासनिक सुविधा, लागत में कमी और चुनावी अभियान से होने वाले व्यवधानों को कम करने का वादा करता है, लेकिन इसके संवैधानिक प्रभाव बहुत व्यापक हैं।
  • चुनावों की आवृत्ति को प्रशासनिक बोझ के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिनिधिक सरकार की एक आवश्यक विशेषता के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों की व्यवस्था लगातार लोकतांत्रिक निगरानी सुनिश्चित करती है और राज्यों की स्वायत्तता को बनाए रखती है।

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