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भारत में परमाणु ऊर्जा का नया चरण: शांति बिल 2025

भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। हाल के वर्षों में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में नीतिगत बदलावों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग ने भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा के एक नए युग का द्वार खोल दिया है। हालाँकि, इस दिशा में प्रगति केवल नीतिगत घोषणाओं तक सीमित नहीं रह सकती; असली चुनौती अब तकनीकी जटिलताओं, वित्तीय बाधाओं और विनियामक ढांचे को धरातल पर उतारने की है।

परमाणु ऊर्जा की नई दिशा: पृष्ठभूमि और संदर्भ

भारत ने लंबे समय तक अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयले पर निर्भरता बनाए रखी है, लेकिन ‘नेट ज़ीरो’ (Net Zero) 2070 के लक्ष्य ने ऊर्जा मिश्रण में परमाणु शक्ति की भूमिका को अनिवार्य बना दिया है। परमाणु ऊर्जा न केवल कार्बन-मुक्त है, बल्कि यह पवन और सौर ऊर्जा की तरह अनिश्चित नहीं है। यह ‘बेस लोड’ (Base Load) बिजली प्रदान करने में सक्षम है, जो औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक है। भारत का परमाणु कार्यक्रम वर्तमान में अपनी कुल बिजली उत्पादन का लगभग 3% ही योगदान देता है, जिसे सरकार अगले दो दशकों में तीन गुना करने का लक्ष्य रख रही है।

नीतिगत बदलाव और विदेशी सहयोग का मार्ग

भारत अब विदेशी परमाणु आपूर्तिकर्ताओं और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी के लिए अपने दरवाजे खोल रहा है। अमेरिका के साथ ‘123 समझौते’ के बाद से ही भारत ने वैश्विक परमाणु मुख्यधारा में प्रवेश किया था, लेकिन अब फ्रांस (EDF) और रूस (Rosatom) के साथ सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाया जा रहा है।

  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: परमाणु ऊर्जा अधिनियम में संभावित संशोधन निजी कंपनियों को परमाणु संयंत्रों के निर्माण और संचालन में भागीदार बनने की अनुमति दे सकते हैं, जो अब तक केवल सार्वजनिक क्षेत्र (NPCIL) तक सीमित था।
  • SMR तकनीक पर जोर: ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स’ (SMRs) पर ध्यान केंद्रित करना एक रणनीतिक बदलाव है। ये रिएक्टर छोटे, सुरक्षित और कम पूंजी वाले होते हैं, जिन्हें औद्योगिक केंद्रों के पास स्थापित किया जा सकता है।

भू-राजनीतिक आयाम और आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा

परमाणु ऊर्जा केवल बिजली का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह गहरी भू-राजनीति से जुड़ा है। भारत के लिए यूरेनियम की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती रही है।

  • आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण: भारत ने कजाकिस्तान, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौते किए हैं।
  • स्वदेशी तकनीक का विकास: भारत का ‘तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम’ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिसका लक्ष्य भारत के विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करना है। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) की सफलता भारत को इस क्षेत्र में वैश्विक नेता बना सकती है।

तकनीकी और सुरक्षा चुनौतियां

परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ सुरक्षा संबंधी चिंताएं (Safety Concerns) भी बढ़ती हैं। फुकुशिमा और चेरनोबिल जैसी घटनाओं की यादें जनता के मन में डर पैदा करती हैं।

  • अपशिष्ट प्रबंधन: परमाणु कचरे का सुरक्षित निपटान एक दीर्घकालिक चुनौती है, जिसके लिए भारत को उन्नत भू-वैज्ञानिक समाधानों की आवश्यकता है।
  • विनियामक संस्था की स्वतंत्रता: ‘परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड’ (AERB) को और अधिक स्वायत्त और शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है ताकि अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

आर्थिक और वित्तीय बाधाएं

परमाणु संयंत्रों की सबसे बड़ी कमी उनकी उच्च ‘पूंजीगत लागत’ (Capital Cost) और निर्माण में लगने वाला लंबा समय है।

  • पूंजी का अभाव: निजी क्षेत्र को आकर्षित करने के लिए सरकार को ‘परमाणु क्षति के लिए नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम’ (CLND Act) से संबंधित कानूनी अनिश्चितताओं को स्पष्ट करना होगा। विदेशी कंपनियां इस अधिनियम की क्षतिपूर्ति धाराओं के कारण निवेश करने से हिचकिचाती हैं।
  • प्रति यूनिट लागत: सौर ऊर्जा की गिरती कीमतों के मुकाबले परमाणु बिजली को आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाए रखना एक कठिन कार्य है।

भविष्य की राह:

जैसा कि विश्लेषण संकेत देता है, “कठिन परिश्रम अब शुरू होता है” क्योंकि भारत को एक साथ तीन मोर्चों पर काम करना है: तकनीकी नवाचार (SMR और थोरियम), वित्तीय मॉडलिंग (निजी निवेश), और कूटनीतिक संतुलन (NSG सदस्यता और यूरेनियम आपूर्ति)।

भारत को चाहिए कि वह अपने स्वदेशी ‘प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स’ (PHWR) के बेड़े को बढ़ाने के साथ-साथ विदेशी तकनीक के एकीकरण के बीच संतुलन बनाए रखे। इसके अतिरिक्त, स्थानीय समुदायों के साथ विश्वास बहाली (जैसे कुडनकुलम और जैतापुर के विरोधों के संदर्भ में) अत्यंत आवश्यक है।

स्रोत:

https://indianexpress.com/article/opinion/columns/india-moves-towards-unlocking-nuclear-energy-the-hard-work-begins-now-10440817/?ref=top_opinion


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