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भारत में विकेंद्रीकरण, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और संघीय पुनर्संरचना की आवश्यकता

भारत का संघीय प्रयोग अब लगभग आठ दशक पूरे कर चुका है, लेकिन यह शुरुआत से ही समान भागीदारों के बीच बना कोई सरल समझौता नहीं था। इसकी स्थापना राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता और एक विशाल, भाषाई रूप से विविध तथा सांस्कृतिक रूप से बहुस्तरीय समाज की वास्तविकता के बीच संतुलन बनाने के प्रयास के रूप में हुई थी।

1950 में लागू हुआ संविधान उस स्वतंत्रता आंदोलन की देन था जिसने एक ओर हर क्षेत्र, जाति, भाषा और समुदाय को आत्मनिर्णय का आश्वासन दिया था, तो दूसरी ओर नवगठित राज्य को देश की भौगोलिक अखंडता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी सौंपी थी। परिणामस्वरूप एक ऐसा संघ बना जिसे औपचारिक रूप से संघीय कहा गया, लेकिन केंद्र सरकार को इतनी शक्तियाँ दी गईं कि पारंपरिक संघीय व्यवस्था के समर्थकों को यह असहज कर सकता था।

समय के साथ इस व्यवस्था की कमजोरियाँ खत्म होने के बजाय और स्पष्ट होती गईं। परिसीमन (Delimitation) को लेकर तमिलनाडु की चिंताएँ, राज्य विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश की शिकायतें, तेलंगाना में किए गए वादों की धीमी प्रगति से असंतोष, तथा देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों का लगातार पिछड़ापन — ये सभी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि भारत की संघीय व्यवस्था गंभीर दबाव में है। अब सवाल यह नहीं रह गया है कि पुनर्संरचना की आवश्यकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है जो इसे संभव बना सके।

संवैधानिक ढाँचा और उसकी अंतर्निहित चुनौतियाँ

संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर ऐसा संविधान बनाया जिसमें केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हो। संविधान की सातवीं अनुसूची संसद और राज्य विधानसभाओं के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन करती है। इसमें संसद को व्यापक संघ सूची दी गई, साथ ही समवर्ती सूची भी बनाई गई जिसमें कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्यों दोनों को है, लेकिन टकराव की स्थिति में केंद्र का कानून प्रभावी रहता है।

इसके अलावा अवशिष्ट शक्तियाँ भी केंद्र के पास हैं। आपातकालीन प्रावधानों के तहत केंद्र सरकार आवश्यक समझे जाने पर राज्यों की सरकारों को भंग कर सकती है या उनके वित्तीय मामलों पर नियंत्रण कर सकती है। राज्यपाल की नियुक्ति भी केंद्र द्वारा होती है, जिससे राज्यों की कार्यपालिका में केंद्र की निरंतर उपस्थिति बनी रहती है।

यह व्यवस्था आंशिक रूप से विभाजन के अनुभव और इस आशंका के कारण बनाई गई थी कि कहीं देश फिर से विखंडित न हो जाए। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस व्यवस्था का समर्थन करते हुए कहा था कि सामान्य परिस्थितियों में भारत संघीय रहेगा, लेकिन असाधारण परिस्थितियों में यह एकात्मक रूप ले सकता है।

हालाँकि संविधान निर्माताओं ने शायद यह नहीं सोचा था कि सामान्य लोकतांत्रिक शासन भी केंद्र और राज्यों के बीच संघर्ष का मंच बन सकता है। कई बार केंद्र की शक्तियों का उपयोग वास्तविक आपात स्थितियों के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए किया गया।

1970 और 1980 के दशक में अनुच्छेद 356 का बार-बार प्रयोग इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ निर्णय ने इस पर न्यायिक नियंत्रण स्थापित किया। इसके बावजूद आज भी वित्तीय नियंत्रण, प्रशासनिक शर्तों और राज्य विधानसभाओं की उपेक्षा जैसे माध्यमों से केंद्रीकरण जारी है।

वित्तीय संघवाद: समस्या का केंद्र

भारत में केंद्र और राज्यों के बीच असंतुलन सबसे अधिक स्पष्ट रूप से सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र में दिखाई देता है। हर पाँच वर्ष में गठित होने वाला वित्त आयोग केंद्रीय करों के एक हिस्से को राज्यों में बाँटता है। पंद्रहवें वित्त आयोग ने राज्यों को विभाज्य करों का 41 प्रतिशत देने की सिफारिश की, जो एक सकारात्मक कदम था।

लेकिन इसके साथ एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। केंद्र सरकार ने पिछले वर्षों में सेस और अधिभार पर अधिक निर्भरता बढ़ाई है। ये कर विभाज्य करों के दायरे में नहीं आते, इसलिए राज्यों को इनमें कोई हिस्सा नहीं मिलता।

2011-12 से 2022-23 के बीच केंद्र के कुल कर राजस्व में सेस और अधिभार का हिस्सा काफी बढ़ गया और कुछ आकलनों के अनुसार यह लगभग एक चौथाई तक पहुँच गया। राज्यों को इस राजस्व में हिस्सा नहीं मिलता, जबकि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक योजनाओं को लागू करना पड़ता है।

इससे विशेष रूप से दक्षिण और पश्चिम के औद्योगिक राज्यों में असंतोष बढ़ रहा है, क्योंकि वे कर राजस्व में अधिक योगदान करते हैं लेकिन बदले में अपेक्षाकृत कम संसाधन प्राप्त करते हैं।

वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था ने भी नई चुनौतियाँ पैदा की हैं। राज्यों को राजस्व घाटे की भरपाई के लिए जो मुआवजा देने का वादा किया गया था, वह 2022 में समाप्त हो गया। कई राज्यों ने अपने वित्तीय नियोजन को इसी मुआवजे पर आधारित किया था। अब वे ऐसी परिषद पर निर्भर हैं जिसे स्थायी रूप से इस उद्देश्य के लिए नहीं बनाया गया था।

क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और पहचान की राजनीति

भारतीय संघवाद की गहरी चुनौती केवल आर्थिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक भी है। 1956 से 1960 के दशक की शुरुआत तक राज्यों का पुनर्गठन मुख्यतः भाषाई आधार पर किया गया था। यह इस बात की स्वीकृति थी कि भाषा राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है,लेकिन यह समाधान पूर्ण नहीं था।

  • पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड की मांग समय-समय पर उठती रही है।
  • असम में बोडोलैंड आंदोलन क्षेत्रीय पहचान की मांग को दर्शाता है।
  • मणिपुर में विभिन्न समुदायों की अलग-अलग क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने गंभीर मानवीय संकट पैदा कर दिया है।

ये केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे नहीं हैं, बल्कि यह उस मूलभूत इच्छा का परिणाम हैं जिसमें लोग चाहते हैं कि शासन उनके भाषा, संस्कृति और अनुभव को समझने वाले लोगों द्वारा किया जाए।

2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे नए राज्यों का गठन इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक इच्छा होने पर क्षेत्रीय मांगों को स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन केवल नए राज्य बना देने से समस्या हल नहीं होती यदि वित्तीय और प्रशासनिक ढांचा वही बना रहे।

परिसीमन विवाद और प्रतिनिधित्व का प्रश्न

हाल के वर्षों में परिसीमन का मुद्दा संघीय असंतुलन का एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। दक्षिण भारत के कई राज्यों — जैसे केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक — ने लंबे समय तक परिवार नियोजन नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया।

यदि लोकसभा सीटों का परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो इन राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं। इसका अर्थ होगा कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में कम प्रतिनिधित्व मिलेगा।

तमिलनाडु के नेताओं ने इसे “दोहरी सजा” बताया है —

  • पहली, क्योंकि वे केंद्रीय करों में अधिक योगदान देते हैं;
  • दूसरी, क्योंकि अब उनकी संसद में आवाज भी कम हो सकती है।

सहकारी संघवाद

  • 2014 के बाद केंद्र सरकारों ने सहकारी संघवाद की अवधारणा को बार-बार दोहराया है। योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग बनाया गया, जिसे अधिक परामर्श आधारित संस्था बताया गया। इसी तरह GST परिषद को सहयोगात्मक शासन का उदाहरण बताया गया,लेकिन व्यवहार में यह सहयोग हमेशा स्पष्ट नहीं दिखता।
  • नीति आयोग के पास योजना आयोग की तरह वित्तीय संसाधन आवंटित करने की शक्ति नहीं है, इसलिए वह मुख्यतः सलाह देने वाली संस्था बनकर रह गया है।
  • कई राज्यों को अब विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों से सीधे बातचीत करनी पड़ती है, जिससे अक्सर उन राज्यों को लाभ मिलता है जिनकी राजनीतिक स्थिति केंद्र से बेहतर संबंध रखती है।
  • केंद्र प्रायोजित योजनाएँ भी कई बार ऐसी शर्तों के साथ आती हैं जो राज्यों की स्वतंत्रता को सीमित कर देती हैं। यदि कोई राज्य स्वास्थ्य या पोषण योजना को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलना चाहता है, तो उसे केंद्रीय दिशानिर्देशों की बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
  • 2020 के कृषि कानूनों का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। इन्हें राज्यों और किसानों से पर्याप्त परामर्श के बिना लागू किया गया था। बाद में लंबे आंदोलन के बाद इन्हें वापस लेना पड़ा। यह घटना संघीय परामर्श की उपेक्षा के परिणामों को स्पष्ट करती है।

संघीय पुनर्संरचना की आवश्यकता

भारत की संघीय व्यवस्था को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता किसी अलगाववादी भावना से नहीं बल्कि एक व्यावहारिक समझ से उत्पन्न होती है। 1.4 अरब लोगों वाले देश को केवल एक केंद्रीय निर्णय-प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावी ढंग से संचालित करना कठिन है।

भारत की भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक विविधता इतनी व्यापक है कि एक ही नीति हर राज्य के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, गुजरात की आर्थिक नीतियाँ नागालैंड के लिए उपयुक्त नहीं हो सकतीं, और राजस्थान की कृषि आवश्यकताएँ केरल या पश्चिम बंगाल से भिन्न हैं।

एक नए संघीय ढांचे में कई सुधार आवश्यक हो सकते हैं:

  • वित्तीय सुधार: सेस और अधिभार की सीमा निर्धारित की जाए।
  • विभाज्य करों का हिस्सा बढ़ाया जाए: वित्त आयोग राज्यों की विकास संबंधी जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखे।
  • विधायी सुधार: समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने से पहले राज्यों से अनिवार्य परामर्श हो।
  • प्रतिनिधित्व सुधार: परिसीमन के लिए ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान न हो।
  • राज्यसभा को अधिक प्रभावी संघीय सदन बनाया जाए: राज्यसभा को यदि वास्तविक संघीय मंच बनाया जाए, जहाँ राज्यों का अधिक समान प्रतिनिधित्व हो और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़े कानूनों में उसकी निर्णायक भूमिका हो, तो संघीय संतुलन मजबूत हो सकता है।

निष्कर्ष: संघवाद एक जीवंत समझौता

  • भारतीय राज्य कमजोर नहीं है। सात दशकों के लोकतंत्र, आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन ने ऐसी संस्थाएँ और राजनीतिक संस्कृति विकसित की है जो अत्यधिक विविधता को संभाल सकती हैं। लेकिन मजबूती का अर्थ कठोरता नहीं होना चाहिए।
  • संघीय समझौता समय-समय पर बदलती परिस्थितियों के अनुसार पुनः समायोजित होना चाहिए — जैसे जनसंख्या परिवर्तन, आर्थिक असमानताएँ, क्षेत्रीय पहचान का विकास और राज्यों की प्रशासनिक क्षमता का बढ़ना।
  • यदि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से व्यक्त किया जाता है, तो वे राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा नहीं बल्कि उसकी मजबूत नींव बन सकती हैं।
  • ऐसा संघ जहाँ तमिलनाडु, ओडिशा और मेघालय जैसे राज्य राष्ट्रीय नीति निर्माण में स्वयं को वास्तव में प्रतिनिधित्वित महसूस करें और अपने लोगों के लिए शासन लागू करने में सक्षम हों, वह कहीं अधिक मजबूत होगा।
  • इतिहास यह बताता है कि वे संघीय व्यवस्थाएँ जिनमें क्षेत्रीय पहचान की अनदेखी की जाती है, अंततः अस्थिरता का सामना करती हैं।
  • इसलिए संघीय पुनर्संरचना की मांग मूलतः भारतीय लोकतंत्र के वादे को गंभीरता से लेने की मांग है — ताकि हर क्षेत्र के लोग, अपनी भाषा और अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से, अपने जीवन की दिशा तय करने में वास्तविक भूमिका निभा सकें।
  • यह केवल एक प्रशासनिक सुधार का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस भारत के निर्माण का निमंत्रण है जो अपनी सभ्यता की विशालता और आने वाले समय की जटिल चुनौतियों दोनों के अनुरूप हो।

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