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भारत में हेट स्पीच और हेट क्राइम

Hate Speech and Hate Crime in India

हाल ही में The Hindu में प्रकाशित समाचार के अनुसार (फरवरी 2026), सुप्रीम कोर्ट ने घृणा-आधारित अपराधों (Hate Crimes) के लिए एक विशेष कानूनी ढांचे की मांग से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए अटॉर्नी जनरल से इस विषय पर विचार करने को कहा। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि पहचान-आधारित हिंसा और विभाजनकारी भाषण सामाजिक एकता, बंधुत्व और संवैधानिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा हैं।

यह परिदृश्य भारत में हेट स्पीच और हेट क्राइम से निपटने की कानूनी तथा संस्थागत चुनौतियों पर व्यापक विमर्श की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

हेट स्पीच क्या है?

267वीं विधि आयोग रिपोर्ट (2017) के अनुसार, हेट स्पीच ऐसे शब्द, संकेत, लेखन या दृश्य सामग्री हैं जिनका उद्देश्य किसी समूह के विरुद्ध उसकी पहचान जैसे धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, यौन अभिविन्यास आदि—के आधार पर घृणा, भय या हिंसा भड़काना हो।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

  • अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार।
  • अनुच्छेद 19(2): सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता, राज्य की संप्रभुता और अपराध के उकसावे को रोकने हेतु युक्तिसंगत प्रतिबंध की अनुमति।

अर्थात् अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है; यह जिम्मेदारी के साथ जुड़ी है।

हेट क्राइम क्या है?

हेट क्राइम वह अपराध है जो किसी व्यक्ति या समूह के विरुद्ध उसकी पहचान के आधार पर पूर्वाग्रह या घृणा से प्रेरित होकर किया जाता है।

भारत में हेट क्राइम की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, किंतु निम्न कानूनों के माध्यम से ऐसे अपराधों को संबोधित किया जाता है:

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 – समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने पर दंड।
  • अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 – जाति आधारित हिंसा व अपमान पर कठोर दंड।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 – सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले उम्मीदवार की अयोग्यता।

प्रमुख न्यायिक निर्णय

  1. शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022) – पुलिस को स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर हेट स्पीच पर FIR दर्ज करने का निर्देश।
  2. तेहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) – मॉब लिंचिंग रोकने हेतु नोडल अधिकारियों की नियुक्ति।
  3. श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ (2015) – आईटी एक्ट की धारा 66A निरस्त; अस्पष्ट प्रतिबंध असंवैधानिक।
  4. प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014) – हेट स्पीच की स्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता पर बल।

प्रमुख न्यायिक निर्णय

  1. शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022): इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने देश में बढ़ती घृणास्पद भाषण की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हेट स्पीच सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

मुख्य निर्देश

  • पुलिस को शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर FIR दर्ज करने का आदेश।
  • यदि पुलिस कार्रवाई में देरी करती है, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जा सकता है।
    यह निर्णय प्रवर्तन तंत्र की निष्क्रियता पर अंकुश लगाने और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
  1. तेहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (2018): यह मामला मॉब लिंचिंग और भीड़-आधारित हिंसा की घटनाओं से संबंधित था, जो प्रायः हेट स्पीच से प्रेरित होती हैं।

मुख्य निर्देश

  • प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति।
  • संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और निगरानी।
  • पीड़ितों के लिए मुआवजा और पुनर्वास योजना।
  • लिंचिंग को “भीड़ की अराजकता” नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की विफलता के रूप में देखने पर बल।

इस निर्णय ने राज्य की “निवारक जिम्मेदारी” (Preventive Responsibility) को स्पष्ट किया और मॉब हिंसा के विरुद्ध संस्थागत तंत्र स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

  1. श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ (2015): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

मुख्य आधार

  • “आपत्तिजनक”, “कष्टप्रद” जैसे शब्द अत्यंत अस्पष्ट थे।
  • अस्पष्ट और व्यापक शब्दावली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) का उल्लंघन करती है।

इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि हेट स्पीच पर रोक आवश्यक है, परंतु कानून स्पष्ट और सटीक होना चाहिए; अन्यथा वह मौलिक अधिकारों का हनन कर सकता है।

  1. प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच को परिभाषित करने और उससे निपटने के लिए विधिक सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया।

मुख्य बिंदु

  • विधि आयोग को हेट स्पीच की स्पष्ट परिभाषा सुझाने का निर्देश।
  • चुनाव आयोग को अधिक प्रभावी शक्तियाँ देने की सिफारिश।

इस निर्णय ने विधायी स्तर पर सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया और बाद में 267वीं विधि आयोग रिपोर्ट (2017) का मार्ग प्रशस्त किया।

कानूनी एवं संस्थागत चुनौतियाँ

  1. विधिक अस्पष्टता
  • हेट क्राइम की कोई स्वतंत्र परिभाषा नहीं।
  • “वैमनस्य”, “अपमान”, “उकसावा” जैसे शब्दों की व्यक्तिपरक व्याख्या।
  • अपराध के पीछे ‘दुर्भावनापूर्ण मंशा’ सिद्ध करना कठिन।
  1. प्रवर्तन में कमी
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद स्वतः संज्ञान की कार्रवाई असमान।
  • राजनीतिक दबाव और कमजोर साक्ष्य के कारण कम दोषसिद्धि दर।
  1. डिजिटल चुनौती
  • सोशल मीडिया एल्गोरिद्म उत्तेजक सामग्री को बढ़ावा देते हैं।
  • फर्जी अकाउंट और VPN से पहचान कठिन।
  • विदेशी सर्वरों पर होस्ट की गई सामग्री पर नियंत्रण सीमित।
  1. सामाजिकराजनीतिक कारक
  • चुनावी लाभ हेतु विभाजनकारी भाषण।
  • ऐतिहासिक सामाजिक पूर्वाग्रह (जाति, धर्म)।
  • NCRB द्वारा विशिष्ट डेटा की कमी, जिससे नीति निर्माण प्रभावित।

अलग कानून की मांग क्यों?

एक स्वतंत्र “हेट क्राइम कानून” की मांग इसलिए की जा रही है क्योंकि:

  • यह अपराध की स्पष्ट परिभाषा देगा।
  • पूर्वाग्रह-प्रेरित अपराधों को अलग श्रेणी में दर्ज किया जा सकेगा।
  • दंड प्रक्रिया में सुसंगतता आएगी।
  • सांख्यिकीय डेटा संकलन आसान होगा।
  • पीड़ितों को न्याय और क्षतिपूर्ति की स्पष्ट व्यवस्था मिलेगी।

संभावित समाधान

हेट स्पीच और हेट क्राइम से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें विधिक सुधार, प्रशासनिक जवाबदेही, डिजिटल नियंत्रण, न्यायिक सक्रियता और सामाजिक जागरूकता शामिल हों। निम्नलिखित उपाय इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं:

स्वतः संज्ञान (Suo Motu) FIR अनिवार्यता: 2022 के सुप्रीम कोर्ट निर्देशों का कठोर पालन हो, जिसके अनुसार पुलिस को हेट स्पीच के मामलों में बिना शिकायत की प्रतीक्षा किए स्वतः FIR दर्ज करनी चाहिए।
यदि ऐसा करने में देरी हो, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाए।

24 घंटे में डिजिटल कंटेंट हटाने की व्यवस्था: आईटी नियम 2026 के तहत जिला नोडल अधिकारियों को प्राथमिकता चैनल प्रदान किया जाए।

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को 24 घंटे के भीतर भड़काऊ और घृणास्पद सामग्री हटाने की बाध्यता हो।
    इससे “वायरल नफरत” को प्रारंभिक स्तर पर रोका जा सकेगा।

स्पष्ट परिभाषा का संहिताकरण: एक स्वतंत्र कानून बनाया जाए जो “हेट स्पीच” और “हेट क्राइम” को स्पष्ट रूप से परिभाषित करे।

  • यह परिभाषा हिंसा के उकसावे, भेदभाव या गंभीर सामाजिक बहिष्कार पर आधारित हो।
    इससे अभियोजन में स्पष्टता आएगी और पूर्वाग्रह-आधारित अपराधों को अलग श्रेणी में दर्ज किया जा सकेगा।

संवैधानिक टॉर्ट देयता: सार्वजनिक पदाधिकारियों द्वारा दिए गए घृणास्पद भाषण को नागरिक दायित्व (Civil Wrong) माना जाए।

  • यदि ऐसे वक्तव्य से किसी व्यक्ति के गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 21) और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन होता है, तो पीड़ित राज्य से क्षतिपूर्ति की मांग कर सके।
    यह व्यवस्था सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को अधिक जिम्मेदार बनाएगी।

सेवा नियमों का कठोर अनुपालन: अखिल भारतीय सेवा नियमों में संशोधन कर “हेट स्पीच की रोकथाम या रिपोर्ट करने में विफलता” को गंभीर कदाचार घोषित किया जाए।

  • ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों को तत्काल निलंबित किया जा सके। इससे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित होगी।

विशाखाशैली आचार संहिता: सुप्रीम कोर्ट द्वारा “विशाखा बनाम राजस्थान राज्य” (1997) की तर्ज पर संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए एक आचार संहिता तैयार की जाए।

  • इसमें “संयम का कर्तव्य” (Duty of Restraint) अनिवार्य हो, ताकि उच्च पदों पर बैठे व्यक्ति संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित “बंधुत्व” के सिद्धांत को बढ़ावा दें।

विशेष फास्टट्रैक हेट कोर्ट: हेट क्राइम मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की जाएँ, जो 6 माह के भीतर मुकदमों का निपटारा करें।
त्वरित न्याय से निवारक प्रभाव उत्पन्न होगा और पीड़ितों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास मजबूत होगा।

निष्कर्ष

हेट स्पीच और हेट क्राइम को रोकने के लिए केवल दंडात्मक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। विधिक स्पष्टता, प्रशासनिक जवाबदेही, त्वरित न्याय, डिजिटल नियंत्रण और सामाजिक शिक्षा इन सभी के समन्वय से ही संविधान में निहित समानता, गरिमा और बंधुत्व के आदर्शों की रक्षा की जा सकती है। भारत का संविधान समानता (अनुच्छेद 14), गरिमा (अनुच्छेद 21) और बंधुत्व (प्रस्तावना) के मूल्यों पर आधारित है। हेट स्पीच और हेट क्राइम इन मूल्यों को भीतर से कमजोर करते हैं।

वर्तमान चुनौती केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और सामाजिक चेतना के विकास की है। विधिक स्पष्टता, डिजिटल उत्तरदायित्व और संस्थागत जवाबदेही के समन्वय से ही भारत समान नागरिकता और राष्ट्रीय एकता के आदर्श को साकार कर सकता है।


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