भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ता केवल दो आर्थिक क्षेत्रों के बीच का व्यापारिक लेन-देन नहीं है, बल्कि यह दो महान लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच एक रणनीतिक गठबंधन की आधारशिला है। वैश्विक भू-राजनीति के बदलते दौर में, जहाँ आपूर्ति श्रृंखलाओं का विविधीकरण और आर्थिक सुरक्षा प्राथमिकता बन गई है, इस समझौते का महत्व और भी बढ़ गया है। वर्ष 2007 में शुरू हुई ‘व्यापक व्यापार और निवेश समझौते’ (BTIA) की वार्ता कई वर्षों के गतिरोध के बाद अब एक नए संकल्प के साथ पुनर्जीवित हुई है। यह समझौता भारत के लिए यूरोपीय बाजारों तक निर्बाध पहुंच और यूरोपीय संघ के लिए भारत के विशाल उपभोक्ता आधार में पैठ बनाने का एक ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत करता है।

व्यापारिक साझेदारी का वर्तमान स्वरूप और आर्थिक आधार
यूरोपीय संघ वर्तमान में भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक है और भारतीय निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य के रूप में कार्य करता है। दोनों पक्षों के बीच व्यापारिक संतुलन मशीनरी, रसायनों, तैयार माल और सेवाओं के आदान-प्रदान पर टिका है। भारत जहाँ एक सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी धाक जमा चुका है, वहीं यूरोपीय संघ अपनी उन्नत विनिर्माण तकनीक और नवाचार के लिए जाना जाता है। इस समझौते का प्राथमिक लक्ष्य उन व्यापारिक बाधाओं और उच्च शुल्कों को हटाना है जो वर्तमान में दोनों बाजारों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के सुगम प्रवाह को बाधित करते हैं। एक सफल एफटीए न केवल द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा को बढ़ाएगा, बल्कि यह दोनों अर्थव्यवस्थाओं को एक-दूसरे की पूरक शक्तियों से लाभ उठाने का अवसर भी प्रदान करेगा।
वार्ता के प्रमुख स्तंभ: व्यापार, निवेश और भौगोलिक संकेत
वर्तमान में चल रही वार्ता केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे तीन प्रमुख समझौतों के समूह के रूप में देखा जा रहा है।
- इसमें पहला स्तंभ ‘मुक्त व्यापार समझौता’ है जो माल और सेवाओं के लिए बाजार पहुंच सुनिश्चित करता है।
- दूसरा स्तंभ ‘निवेश संरक्षण समझौता’ (IPA) है, जिसका उद्देश्य निवेशकों के लिए एक सुरक्षित और अनुमानित कानूनी वातावरण तैयार करना है, ताकि भारत और यूरोपीय संघ के बीच पूंजी का प्रवाह बढ़ सके।
- तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ ‘भौगोलिक संकेत’ (GI) समझौता है। यह समझौता दोनों क्षेत्रों के विशिष्ट स्थानीय उत्पादों, जैसे दार्जिलिंग चाय या यूरोपीय वाइन की पहचान और उनकी गुणवत्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है, ताकि बौद्धिक संपदा अधिकारों का उल्लंघन न हो।
व्यापारिक अवरोध और संवेदनशील क्षेत्रों की चुनौतियां
समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा वे संवेदनशील क्षेत्र हैं जहाँ दोनों पक्षों के हित आपस में टकराते हैं। यूरोपीय संघ लंबे समय से भारत में आयातित ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट पर लगने वाले उच्च सीमा शुल्क को कम करने की मांग कर रहा है। दूसरी ओर, भारत अपनी कृषि और डेयरी क्षेत्र को लेकर अत्यधिक संवेदनशील है, क्योंकि इन क्षेत्रों को पूरी तरह खोलने से करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के कड़े नियम भारत के जेनेरिक दवा उद्योग के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। भारत चाहता है कि वह दुनिया की ‘फार्मेसी’ के रूप में अपनी भूमिका बनाए रखे और सस्ती दवाओं की उपलब्धता से समझौता न करे।
गैर-व्यापारिक मुद्दे: श्रम, पर्यावरण और सतत विकास
आधुनिक व्यापार समझौतों में यूरोपीय संघ का जोर अब केवल आर्थिक पहलुओं पर नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय मानकों पर भी है। यूरोपीय संघ चाहता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के कड़े मानकों का पालन करे और व्यापार को सतत विकास लक्ष्यों से जोड़े। भारत ने पारंपरिक रूप से इन गैर-व्यापारिक बाधाओं का विरोध किया है, क्योंकि उसका मानना है कि इन्हें व्यापार समझौतों से जोड़ने का उद्देश्य विकासशील देशों के निर्यात को रोकना हो सकता है। विशेष रूप से ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) जैसे पर्यावरणीय करों ने भारतीय निर्यातकों के मन में आशंकाएं पैदा कर दी हैं, जिन्हें इस वार्ता के दौरान सुलझाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था और डेटा सुरक्षा के नए आयाम
डिजिटल सेवाओं के इस युग में डेटा का सुगम प्रवाह व्यापार की रीढ़ बन गया है। भारत के विशाल आईटी क्षेत्र के लिए यूरोपीय बाजार में पहुंच बनाना इस समझौते का एक मुख्य उद्देश्य है। हालांकि, यूरोपीय संघ के कड़े ‘सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन’ (GDPR) और भारत को ‘डेटा सुरक्षित’ देश का दर्जा न मिलना सेवाओं के व्यापार में बड़ी रुकावट है। यदि इस समझौते के माध्यम से भारत को एक सुरक्षित डेटा गंतव्य के रूप में मान्यता मिलती है, तो यह भारतीय तकनीकी कंपनियों के लिए यूरोप में व्यापार के असीमित द्वार खोल देगा। दोनों पक्ष एक ऐसे ढांचे पर काम कर रहे हैं जो निजता के अधिकारों और व्यापारिक सुगमता के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
भू-राजनीतिक अनिवार्यता और चीन पर निर्भरता कम करना
इस समझौते का एक बड़ा कारण वैश्विक राजनीति की वर्तमान स्थिति भी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन के साथ बढ़ते तनाव ने यूरोपीय संघ को अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए भारत जैसे विश्वसनीय लोकतांत्रिक साझेदार की ओर देखने पर मजबूर किया है। ‘डी-रिस्किंग’ की इस नीति के तहत यूरोपीय संघ भारत को एक स्थिर वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में देखता है। भारत के लिए भी यह समझौता अपनी ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी योजनाओं को वैश्विक स्तर पर सफल बनाने का एक माध्यम है। दोनों पक्ष यह समझते हैं कि आर्थिक एकीकरण न केवल समृद्धि लाएगा, बल्कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए एक रणनीतिक आवश्यकता भी है।
निष्कर्ष: एक संतुलित और समावेशी भविष्य की ओर
अंततः, भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता एक ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रिया है जो वैश्विक व्यापार के भविष्य को नया आकार दे सकती है। हालांकि वार्ता की मेज पर कई जटिल मुद्दे हैं, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बढ़ती राजनीतिक इच्छाशक्ति एक सकारात्मक संकेत है। एक सफल समझौता वही होगा जो दोनों क्षेत्रों की आर्थिक आकांक्षाओं और उनकी सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के बीच सामंजस्य बिठा सके। यदि भारत और यूरोपीय संघ इन बाधाओं को पार कर लेते हैं, तो यह न केवल दो बाजारों का मिलन होगा, बल्कि यह दुनिया को यह संदेश भी देगा कि साझा मूल्यों वाले लोकतंत्र एक न्यायसंगत और खुली व्यापार व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं।
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के प्रमुख प्रावधानों और वार्ताओं के केंद्र बिंदुओं का सार:
- सीमा शुल्क में कटौती: दोनों पक्ष अधिकांश वस्तुओं पर लगने वाले आयात शुल्क (Import Duties) को शून्य या न्यूनतम करने का लक्ष्य रख रहे हैं।
- बाजार पहुंच (Market Access): भारतीय कपड़ा, चमड़ा और कृषि उत्पादों के लिए यूरोपीय बाजार को खोलना और यूरोपीय कारों व वाइन के लिए भारतीय बाजार तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना।
- सेवाओं का व्यापार: भारतीय आईटी और पेशेवर कामगारों के लिए आसान वीजा (Mode 4) और यूरोपीय वित्तीय व दूरसंचार सेवाओं के लिए बेहतर अवसर प्रदान करना।
- निवेश संरक्षण समझौता (IPA): निवेशकों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक समर्पित कानूनी ढांचा तैयार करना ताकि द्विपक्षीय पूंजी प्रवाह सुरक्षित रहे।
- भौगोलिक संकेत (GI): दार्जिलिंग चाय, कोल्हापुरी चप्पल जैसे भारतीय और शैम्पेन, फेटा पनीर जैसे यूरोपीय विशिष्ट उत्पादों की वैश्विक पहचान सुरक्षित करना।
- बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR): नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कड़े पेटेंट नियम लागू करना, जिस पर भारत के जेनेरिक दवा उद्योग की चिंताएं शामिल हैं।
- डिजिटल व्यापार: सीमा पार डेटा प्रवाह (Cross-border data flow) को सुगम बनाना और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए नए मानक स्थापित करना।
- श्रम और पर्यावरण मानक: व्यापार को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मानकों और सतत विकास लक्ष्यों (Sustainability goals) से जोड़ना।
- सरकारी खरीद (Government Procurement): एक-दूसरे के देशों में सरकारी ठेकों और निविदाओं में कंपनियों को भाग लेने की अनुमति देना।
- विवाद निपटान तंत्र: व्यापारिक मतभेदों को सुलझाने के लिए एक पारदर्शी और प्रभावी कानूनी प्रक्रिया स्थापित करना।
प्रमुख डेटा:
- शून्य शुल्क पहुंच: यूरोपीय संघ (EU) भारत के 99% से अधिक निर्यात (व्यापार मूल्य के आधार पर) के लिए तत्काल या चरणबद्ध तरीके से शून्य-शुल्क पहुंच प्रदान करेगा।
- भारतीय टैरिफ में कटौती: भारत अगले 7-10 वर्षों में ईयू से होने वाले 97% आयात पर शुल्क समाप्त करेगा, जिससे ईयू की कंपनियों को सालाना लगभग €4 बिलियन (₹36,000 करोड़) की बचत होगी।
- औसत शुल्क में गिरावट: समझौते के बाद ईयू का भारत पर औसत टैरिफ 3.8% से घटकर 0.1% हो जाएगा।
- कपड़ा और परिधान (Textiles): इस क्षेत्र में 10-12% का टैरिफ हटकर 0% हो जाएगा, जिससे निर्यात $7-8 बिलियन से बढ़कर $30-40 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।
- इंजीनियरिंग सामान: वर्तमान में 22% तक के ऊंचे टैरिफ का सामना करने वाले इंजीनियरिंग निर्यात के अगले दो वर्षों में $20 बिलियन से बढ़कर $25 बिलियन होने की उम्मीद है।
- समुद्री उत्पाद (Marine Products): झींगा और प्रोसेस्ड सीफूड पर 26% तक का शुल्क समाप्त होगा, जिससे भारतीय निर्यातकों को सीधा लाभ मिलेगा।
- फार्मास्युटिकल्स: टैरिफ से अधिक लाभ ‘नियामक सहयोग’ (Regulatory Cooperation) से होगा, जिससे दवाओं की मंजूरी तेज होगी और भारत को $572 बिलियन के यूरोपीय फार्मा बाजार में बड़ी हिस्सेदारी मिलेगी।
- ऑटोमोबाइल (Automobiles): लग्जरी कारों (₹25 लाख से ऊपर) पर शुल्क 110% से घटाकर 10% किया जाएगा, लेकिन सालाना 2.5 लाख यूनिट्स का कोटा रहेगा। मास-मार्केट कारों (सस्ती कारें) को सुरक्षित रखा गया है।
- कृषि और डेयरी: भारत ने अपने डेयरी क्षेत्र, चावल, गेहूं और दालों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है; इन पर ईयू को कोई रियायत नहीं दी गई है।
- शराब और स्पिरिट: प्रीमियम वाइन पर शुल्क 150% से घटाकर शुरुआत में 75% और फिर 20-30% किया जाएगा।
- कुल व्यापार लक्ष्य: वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार (वस्तु + सेवा) लगभग $140 बिलियन है, जिसके 2030 तक $200-$220 बिलियन और 2032 तक दोगुना होने का अनुमान है।
- सेवा क्षेत्र (Services): भारत को 144 ईयू सेवा उप-क्षेत्रों (आईटी, बिजनेस, शिक्षा) में पहुंच मिलेगी, जबकि भारत ने 102 उप-क्षेत्र ईयू के लिए खोले हैं।
- निवेश (FDI): ईयू का भारत में निवेश स्टॉक (वर्तमान में €140 बिलियन) अगले दशक में तेजी से बढ़ने की संभावना है, जिससे लाखों नए रोजगार सृजित होंगे।
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