भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) व्यापार समझौता, जिसके 26 जनवरी को हस्ताक्षरित होने की उम्मीद है, दोनों पक्षों के लिए सबसे व्यापक एवं पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौतों में से एक माना जा रहा है। भारत-ईयू व्यापार समझौते को आकार लेने में कई दशक लगे हैं। वर्ष 2022 में वार्ताएँ पुनः आरंभ होने के बाद दोनों अंततः इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के क़रीब पहुँचे हैं। इसकी बातचीत की शुरुआत 2007 में हुई थी, लेकिन 2013 में इसे छोड़ दिया गया था।
इस संदर्भ में, आइए भारत-ईयू संबंधों के महत्व एवं चुनौतियों को समझने का प्रयास करें तथा यह जानें कि इस संबंध को उसकी वांछित क्षमता तक पहुँचाने के लिए आगे का मार्ग क्या हो सकता है।
भारत–यूरोपीय संघ (India–EU) संबंधों का महत्व क्या है?

- प्रमुख व्यापारिक साझेदार:यूरोपीय संघ भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है (अमेरिका के बाद)। वर्ष 2024–25 में दोनों के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 137 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य भी है, जबकि भारत यूरोपीय संघ का दसवाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI):यूरोपीय संघ भारत में एक प्रमुख निवेशक है और कुल fdi प्रवाह का लगभग 17% योगदान देता है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होते हैं। 2015 से 2022 के बीच यूरोपीय संघ से भारत में fdi में 70% की वृद्धि हुई, जिसमें अकेले फ्रांस के निवेश में 370% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
- साझा मूल्य:भारत और यूरोपीय संघ विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षवाद तथा लोकतंत्र, विधि का शासन और मानवाधिकार जैसे साझा मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। यह उनकी रणनीतिक साझेदारी के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
- एकध्रुवीय या द्विध्रुवीय विश्व के प्रति संतुलन:भारत और यूरोपीय संघ बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के प्रमुख स्तंभ हैं। दोनों का हित इस बात में है कि वैश्विक शासन किसी एक शक्ति के वर्चस्व या तीव्र द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा (अमेरिका–चीन) से नियंत्रित न हो। उनकी साझेदारी अधिक संतुलित और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को बढ़ावा देती है।
- आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण:महामारी और यूक्रेन युद्ध के बाद, दोनों चीन पर अत्यधिक निर्भरता से जोखिम कम करने और आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण चाहते हैं (चीन +1 रणनीति)। इस संदर्भ में भारत की विनिर्माण क्षमता (मेक इन इंडिया) और यूरोपीय संघ की प्रौद्योगिकी व पूंजी उन्हें स्वाभाविक साझेदार बनाती है।
- द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौता वार्ताएँ:व्यापक मुक्त व्यापार समझौते के लिए चल रही वार्ताओं से भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए बाज़ार पहुँच बढ़ने, निवेश को सुगम बनाने, व्यापार बाधाओं को कम करने और भारत को यूरोपीय व वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से और अधिक जोड़ने की अपेक्षा है। यह समझौता सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं, डिजिटलीकरण और सतत व्यापार को भी समर्थन देता है।
- जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा में नेतृत्व:भारत और यूरोपीय संघ दोनों जलवायु परिवर्तन से निपटने और सतत ऊर्जा समाधानों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हरित हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता में सहयोग भारत के महत्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों और डीकार्बोनाइज़ेशन प्रयासों को समर्थन देता है।
- चीन कारक:भारत और यूरोपीय संघ दोनों चीन की बढ़ती सैन्य, आर्थिक और तकनीकी आक्रामकता को एक प्रमुख रणनीतिक चुनौती के रूप में देखते हैं।
भारत–यूरोपीय संघ संबंधों के समक्ष चुनौतियाँ क्या हैं?
1-मुक्त व्यापार समझौता वार्ताओं का ठहराव:द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौता (btia) पर बातचीत 2007 में शुरू हुई, 2013 में रुक गई, और उसके बाद धीमी व कठिन पुनः शुरुआत देखी गई। यह सबसे प्रतीकात्मक और प्रमुख बाधा है। इसके मुख्य अवरोध बिंदु हैं:
- बाज़ार पहुँच (market access):यूरोपीय संघ ऑटोमोबाइल, वाइन, स्पिरिट्स और दुग्ध उत्पादों पर कम शुल्क चाहता है। भारत अपने पेशेवरों के लिए अधिक पहुँच (मोड-4 सेवाएँ) और आसान वीज़ा व्यवस्था की मांग करता है।
- भौगोलिक संकेतक (gis):यूरोपीय संघ शैम्पेन, पार्मेज़ान जैसे gis की कड़ी सुरक्षा करता है, जो भारत में प्रचलित कुछ सामान्य नामों (जैसे “स्कॉच व्हिस्की”) से टकरा सकती है।
- डेटा स्थानीयकरण और डिजिटल व्यापार:भारत के डेटा गोपनीयता और डेटा स्थानीयकरण नियम यूरोपीय डिजिटल कंपनियों के लिए बड़ी चिंता हैं।
- सतत विकास:यूरोपीय संघ व्यापार को कड़े श्रम और पर्यावरण मानकों से जोड़ने पर ज़ोर देता है, जिसे भारत संभावित गैर-शुल्क बाधाओं के रूप में देखता है।
2-कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (cbam):कार्बन-गहन आयात (जैसे इस्पात, सीमेंट, एल्युमिनियम) पर यह नया कर भारत को भेदभावपूर्ण और वस्तुतः व्यापार बाधा लगता है, जो उसके निर्यात को नुकसान पहुँचा सकता है।
3-प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और डिजिटल विनियम:जहाँ भारत अधिक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण चाहता है, वहीं डेटा गोपनीयता, डिजिटल संप्रभुता और साइबर सुरक्षा नियम (जैसे eu का gdpr) भारतीय व्यवसायों के लिए अड़चनें पैदा करते हैं।
4-वीज़ा और गतिशीलता के मुद्दे:भारतीय छात्रों और पेशेवरों को eu में कड़े वीज़ा, कार्य-अनुमति और गतिशीलता नियमों का सामना करना पड़ता है, जिससे लोगों-से-लोग और व्यापारिक संपर्क सीमित होते हैं।
5-रक्षा और रणनीतिक मतभेद:रूस पर भारत की रक्षा-निर्भरता, उन्नत सैन्य तकनीक में यूरोप के साथ गहन सहयोग को सीमित करती है। फ्रांस के साथ पनडुब्बी परियोजनाओं और स्पेन के साथ c-295 विमान जैसी पहलों के बावजूद, eu-भारत रक्षा संबंध अमेरिका या रूस के साथ संबंधों की तुलना में पीछे हैं।
6-यूक्रेन-रूस संघर्ष:यह हाल का सबसे तीव्र मतभेद है। eu का मुख्य रणनीतिक फोकस रूस का मुकाबला करना और यूक्रेन का समर्थन करना है। भारत ने शांति का आह्वान करते हुए तटस्थ रुख अपनाया, रूस से तेल आयात बढ़ाया और संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ मतदान से परहेज़ किया। इससे तनाव और विश्वास-घाटे पैदा हुए हैं, तथा eu को रूस के साथ भारत की निकटता पर चिंता है।
7-चीन कारक:
- चीन के साथ व्यापार: चिंताओं के बावजूद, भारत और eu—दोनों के चीन के साथ बड़े आर्थिक संबंध बने हुए हैं। चीन eu का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जो भारत से काफ़ी आगे है। भारत भी चीन के साथ उल्लेखनीय व्यापार बनाए हुए है (2024 में चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत था)।
- खतरे की भिन्न धारणाएँ: भारत के लिए चीन प्रत्यक्ष पड़ोसी और सैन्य प्रतिस्पर्धी है, जबकि eu के लिए चीन का प्रश्न आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक मानकों से जुड़ा है; उसके लिए रूस अभी भी अधिक तात्कालिक सुरक्षा खतरा बना हुआ है।
भारत–यूरोपीय संघ (India-EU) संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु उठाए गए प्रमुख पहलें क्या रही हैं?

- भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं, जो दोनों पक्षों के बीच गहरे होते रणनीतिक और आर्थिक जुड़ाव को दर्शाती हैं। इस दिशा में सबसे बड़ी आर्थिक पहल साल 2021 में नौ साल के लंबे अंतराल के बाद ‘मुक्त व्यापार समझौते’ (FTA) के लिए वार्ताओं की औपचारिक बहाली रही है।
- इसके साथ ही एक स्टैंड-अलोन निवेश संरक्षण समझौते (IPA) और भौगोलिक संकेत (GI) समझौते पर भी काम शुरू किया गया है। यह प्रस्तावित एफटीए न केवल वस्तुओं, सेवाओं और निवेश संरक्षण को कवर करता है, बल्कि इसका उद्देश्य बाजार तक पहुंच बढ़ाना, लचीली आपूर्ति श्रृंखला बनाना और डिजिटल एवं हरित बदलावों में सहयोग करते हुए आधुनिक विनियामक मानकों के साथ तालमेल बिठाना है।
- रणनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर ‘भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद’ (TTC) की 2022 में शुरुआत एक मील का पत्थर साबित हुई है। इस पहल ने भारत को अमेरिका के समकक्ष खड़ा कर दिया है, क्योंकि यूरोपीय संघ का ऐसा तंत्र केवल इन्हीं दो देशों के साथ है। टीटीसी के माध्यम से तीन कार्य समूह—रणनीतिक तकनीक और डिजिटल शासन (जैसे AI, 5G/6G और सेमीकंडक्टर), हरित एवं स्वच्छ ऊर्जा तकनीक (जैसे हाइड्रोजन और बैटरी स्टोरेज), तथा व्यापार एवं निवेश लचीलेपन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
- इसके पूरक के रूप में, व्यापार और निवेश पर ‘उच्च स्तरीय संवाद’ (High-Level Dialogue) भी आयोजित किया जाता है, जो द्विपक्षीय व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए मंत्री-स्तरीय राजनीतिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
- दोनों शक्तियों ने ‘भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक साझेदारी: 2025 का रोडमैप’ के माध्यम से भविष्य की रूपरेखा तैयार की है, जो जलवायु परिवर्तन, सुरक्षा और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में संयुक्त कार्रवाई को निर्देशित करता है।
- सुरक्षा के क्षेत्र में, भारत ने यूरोपीय संघ की ‘इंडो-पैसिफिक महासागर पहल’ (IPOI) और समुद्री सुरक्षा रणनीति के साथ हाथ मिलाया है। गिनी की खाड़ी और अदन की खाड़ी में किए गए संयुक्त नौसैनिक अभ्यास इस बात का प्रमाण हैं कि दोनों पक्ष एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
- ऊर्जा और जलवायु के मोर्चे पर ‘स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु साझेदारी’ (CECP) के तीसरे चरण (2025-2028) पर सहमति बनी है, जिसमें ग्रीन हाइड्रोजन और अपतटीय पवन ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में गहरा सहयोग शामिल है।
- वैज्ञानिक और बुनियादी ढांचागत सहयोग भी इन संबंधों का एक महत्वपूर्ण आधार है। परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग में अनुसंधान एवं विकास (R&D) सहयोग और भारत की सर्न (CERN) में सहयोगी सदस्यता वैज्ञानिक तालमेल को दर्शाती है।
- इसके अतिरिक्त, 2020 की ‘कनेक्टिविटी पार्टनरशिप’ और हालिया ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) जैसी परियोजनाएं चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के एक पारदर्शी और संप्रभु विकल्प के रूप में उभरी हैं। विशेष रूप से IMEC को आधुनिक युग के ‘सिल्क रोड’ के रूप में देखा जा रहा है, जो न केवल व्यापारिक मार्ग बल्कि ऊर्जा और नवाचार के क्षेत्र में भी यूरोप और भारत को जोड़ने की क्षमता रखता है।
आगे की राह क्या हो सकती है?
- लचीलेपन के साथ एफटीए वार्ताओं में तेजी:दोनों पक्षों को मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप देने के लिए लचीला और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। संवेदनशील क्षेत्रों को चरणबद्ध तरीके से संबोधित करते हुए, पारस्परिक मान्यता समझौतों के माध्यम से नियामकीय समन्वय को मजबूत करना आवश्यक है। इसमें बाजार तक पहुंच, बौद्धिक संपदा अधिकार और स्थिरता मानकों जैसे मुद्दों के समाधान तलाशना भी शामिल है।
- प्रौद्योगिकी सहयोग को सुदृढ़ करना:प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए समर्पित ढांचे स्थापित करने, संतुलित पहुंच सुनिश्चित करने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर तथा साइबर सुरक्षा जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग को मजबूत करने पर निरंतर ध्यान दिया जाना चाहिए। गोपनीयता संरक्षण और व्यावसायिक नवाचार की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाते हुए डेटा-साझाकरण समझौतों को सुगम बनाना भी महत्वपूर्ण है। डीप टेक, डिजिटल विनिर्माण और सेमीकंडक्टर में यूरोप की अग्रणी भूमिका भारत की सॉफ्टवेयर क्षमता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (जैसे UPI) और बड़े पैमाने पर लागू होने वाले प्लेटफॉर्मों की गतिशीलता के साथ मेल खाती है। साथ मिलकर वे स्वच्छ ऊर्जा नवाचार, जैव-प्रौद्योगिकी, महासागर स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और लचीली स्वास्थ्य प्रणालियों में नेतृत्व कर सकते हैं।
- जलवायु और ऊर्जा नीति से जुड़ी चिंताओं का समाधान:हरित ऊर्जा समाधानों के क्रियान्वयन के लिए संयुक्त रोडमैप विकसित करना, नवीकरणीय ऊर्जा निवेशों पर नीतियों का सामंजस्य स्थापित करना, तथा कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे मुद्दों पर समाधान खोजना आवश्यक है ताकि भारतीय निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। हरित हाइड्रोजन और कार्बन-न्यूट्रल पहलों के लिए अधिक वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी-साझाकरण भी महत्वपूर्ण है।
- सुरक्षा और रक्षा सहयोग को गहरा करना:सैन्य उपकरणों के संयुक्त उत्पादन के अवसरों की खोज, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करना, तथा साइबर सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने को मजबूत करना आवश्यक है। यूरोपीय संघ की स्थायी संरचित सहयोग (pesco) परियोजनाओं में भारत की भागीदारी की रुचि और सूचना सुरक्षा समझौते (soia) पर वार्ता इस दिशा को और स्पष्ट करती है।
- बहुपक्षीय सहभागिता को मजबूत करना:भारत और यूरोपीय संघ को संयुक्त राष्ट्र, G-20 और WTO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर मिलकर कार्य जारी रखना चाहिए, ताकि वैश्विक चुनौतियों का समाधान किया जा सके और साझा मूल्यों को बढ़ावा दिया जा सके। साथ ही, संस्थानों में सुधार कर उन्हें इक्कीसवीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना भी आवश्यक है।प
- मानव गतिशीलता:छात्रों, वैज्ञानिकों और विद्वानों के लिए एक व्यापक गतिशीलता समझौता प्रतिभा पूलों को समृद्ध करेगा, भारत की बेरोजगारी की समस्या को कम करने में सहायक होगा और द्विपक्षीय नवाचार को प्रोत्साहित करेगा। विचारों के युग में, सीमा-पार विचारक उतने ही मूल्यवान हैं जितनी सीमा-पार पूंजी।
निष्कर्ष:
भारत और यूरोपीय संघ को अपनी साझेदारी की अपार संभावनाओं का उपयोग करते हुए महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग, लचीली आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण और रणनीतिक व सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना चाहिए। उन्हें पारस्परिक विश्वास को बढ़ावा देना, वैश्विक शासन को आकार देना और लोकतंत्र, विधि के शासन तथा बहुपक्षवाद के साझा मूल्यों का समर्थन करना होगा।
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