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भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण और संवैधानिक नैतिकता

भारत की भाषाई विविधता केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है, बल्कि यह हमारे सभ्यतागत ताने-बाने का आधार है। 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन ने क्षेत्रीय अस्मिताओं को एक राजनीतिक मंच प्रदान किया, लेकिन इसके साथ ही ‘भाषाई अल्पसंख्यकों’ की सुरक्षा की एक नई चुनौती भी पैदा हुई। आज के वैश्विक और गतिशील भारत में, जहाँ प्रवासन (Migration) एक अनिवार्य सत्य है, हर राज्य एक लघु भारत बन चुका है। हाल ही में केरल विधानसभा द्वारा पारित ‘मलयालम भाषा विधेयक, 2025’ पर उपजा विवाद और पड़ोसी राज्यों की चिंताएं यह स्पष्ट करती हैं कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीति और पहचान का एक जटिल मुद्दा भी है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने सबसे छोटे समूहों की विशिष्टता को कितनी सुरक्षा प्रदान करता है।

भाषाई अल्पसंख्यक: परिभाषा और वर्तमान परिदृश्य

भाषाई अल्पसंख्यक वे समूह हैं जिनकी मातृभाषा उस राज्य की आधिकारिक भाषा से अलग होती है। भारत की जनगणना के अनुसार, देश में 121 मुख्य भाषाएँ और 1500 से अधिक बोलियाँ हैं। वास्तविकता यह है कि भाषाई आधार पर राज्यों का सीमांकन कभी भी पूर्णतः सटीक नहीं था; यह हमेशा एक ‘अनुमानित’ विभाजन रहा है। यही कारण है कि केरल में कन्नड़ भाषी, कर्नाटक में मराठी भाषी, और असम में बंगाली भाषी समुदायों का एक बड़ा आधार मौजूद है। इन समूहों के अधिकारों की रक्षा करना किसी भी लोकतांत्रिक राज्य का संवैधानिक दायित्व है।

वर्तमान में, आर्थिक अवसरों के कारण बढ़ते प्रवासन ने इन भाषाई सीमाओं को और अधिक धुंधला कर दिया है। आज कोई भी राज्य पूरी तरह से ‘एकभाषी’ होने का दावा नहीं कर सकता। ऐसे में, राज्यों की भाषा नीतियां जमीनी हकीकतों पर आधारित होनी चाहिए न कि किसी संकीर्ण सांस्कृतिक एजेंडे पर।

संवैधानिक ढांचा: अल्पसंख्यकों का सुरक्षा कवच

भारतीय संविधान ने प्रारंभ से ही यह माना कि बहुसंख्यकवाद के प्रभाव में भाषाई विविधता लुप्त हो सकती है। अतः, निम्नलिखित अनुच्छेदों के माध्यम से एक त्रि-स्तरीय सुरक्षा तंत्र बनाया गया:

  • अनुच्छेद 29 (सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार): यह प्रत्येक नागरिक को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित करने का मौलिक अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 30 (संस्थानों की स्थापना): यह अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार देता है, ताकि वे अपनी भाषा को अगली पीढ़ी तक पहुँचा सकें।
  • अनुच्छेद 350A (प्राथमिक शिक्षा): यह राज्यों पर एक सकारात्मक दायित्व डालता है कि वे अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करें।
  • अनुच्छेद 350B: इसके माध्यम से ‘भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी’ का पद सृजित किया गया है, जो सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करता है।

मलयालम भाषा विधेयक और समरसता की चुनौती

केरल द्वारा प्रस्तुत नया विधेयक मलयालम को शिक्षा और प्रशासन के हर क्षेत्र में अनिवार्य बनाने का प्रयास करता है। हालांकि, पड़ोसी राज्यों द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं अक्सर गलतफहमी पर आधारित होती हैं। केरल के मामले में, विधेयक के प्रावधानों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसमें भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं।

विधेयक के सकारात्मक पहलू निम्नलिखित हैं:

  • प्रशासनिक सुगमता: अधिसूचित अल्पसंख्यक क्षेत्रों में लोग अपनी स्थानीय भाषाओं में सरकारी पत्राचार कर सकते हैं और उन्हें उन्हीं भाषाओं में उत्तर दिए जाने का प्रावधान है।
  • शैक्षिक छूट: अन्य राज्यों या विदेशों से आने वाले छात्रों के लिए नौवीं, दसवीं और उच्च माध्यमिक स्तर पर मलयालम परीक्षा से छूट दी गई है।
  • संवैधानिक अनुपालन: विधेयक स्पष्ट करता है कि मलयालम को बढ़ावा देने के प्रयास भारत के संविधान के प्रावधानों के अधीन होंगे।

यह उदाहरण दर्शाता है कि राज्य अपनी क्षेत्रीय भाषा को समृद्ध करने का लक्ष्य रख सकते हैं, बशर्ते वे भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों के साथ समझौता न करें। मुख्य चुनौती यह है कि समुदायों के बीच शत्रुता पैदा किए बिना प्रशासन और सार्वजनिक क्षेत्र में हर भाषा को उसका सही स्थान दिया जाए।

न्यायिक व्याख्या और ऐतिहासिक केस कानून

भाषाई अधिकारों को स्पष्ट करने में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) के मामले में, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘अल्पसंख्यक’ की स्थिति का निर्धारण राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाना चाहिए।

हाल के न्यायिक निर्णयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्यपाल या केंद्र सरकार विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए नहीं रोक सकते। केरल का विधेयक भी इसी न्यायिक सक्रियता के कारण पुनः चर्चा में आया। न्यायालयों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि राज्य की ‘क्षेत्रीय भाषाई नीति’ अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकती।

डी.ए.वी. कॉलेज बनाम पंजाब राज्य मामले में न्यायालय ने कहा था कि विश्वविद्यालय भाषाई अल्पसंख्यकों पर राज्य की भाषा को शिक्षा के एकमात्र माध्यम के रूप में नहीं थोप सकते।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और भाषाई अधिकार:

भारत की नई शिक्षा नीति 2020 बहुभाषावाद पर जोर देती है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि जहाँ तक संभव हो, प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। यह नीति भाषाई अल्पसंख्यकों के बच्चों के लिए एक वरदान है, क्योंकि यह उस भाषाई बोझ को कम करती है जो एक बच्चा तब महसूस करता है जब उसे घर पर एक भाषा और स्कूल में दूसरी भाषा बोलनी पड़ती है। शिक्षा नीति का उद्देश्य छात्रों को भाषाई रूप से सक्षम बनाना है, न कि उन्हें किसी एक भाषा के सांचे में ढालना।

भाषाई अल्पसंख्यकों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ:

  • भाषाई साम्राज्यवाद: क्षेत्रीय गौरव के नाम पर कई बार अल्पसंख्यक भाषाओं के स्कूलों को बंद किया जाता है या उन्हें मिलने वाले संसाधनों में कटौती की जाती है।
  • प्रशासनिक बाधाएं: सरकारी नौकरियों और परीक्षाओं में केवल राज्य की मुख्य भाषा की अनिवार्यता अल्पसंख्यकों को समान अवसर से वंचित कर देती है।
  • लुप्त होती बोलियाँ: जिन बोलियों का कोई लिखित व्याकरण नहीं है, वे राज्य की मुख्य भाषा के प्रभाव में तेजी से विलुप्त हो रही हैं, जिससे एक पूरी सांस्कृतिक विरासत लुप्त हो जाती है।
  • प्रवासन और अलगाव: बाहरी राज्यों से आने वाले श्रमिक अक्सर भाषाई बाधा के कारण न्याय और सामाजिक सेवाओं तक नहीं पहुँच पाते।

अंतर-राज्यीय विवाद और समाधान के तंत्र

भाषाई अल्पसंख्यकों का मुद्दा अक्सर राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव का कारण बनता है। बेलगाम का विवाद इसका प्रमुख उदाहरण है। ऐसे मामलों में, केंद्र सरकार की भूमिका और ‘अंतर-राज्यीय परिषद’ (Inter-State Council) की सक्रियता अनिवार्य है। दुर्भाग्यवश, यह परिषद लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी है। इसे फिर से जीवंत करने और भाषाई समूहों के बीच सद्भावनापूर्ण संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य और सीख

कनाडा और स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने अपनी भाषाई विविधता को संवैधानिक सुरक्षा के माध्यम से प्रबंधित किया है। इन देशों ने भाषाई अधिकारों को केवल एक रियायत नहीं, बल्कि नागरिकता का अनिवार्य हिस्सा माना है। भारत को भी ‘भाषाई आधिपत्य’ के बजाय ‘भाषाई सह-अस्तित्व’ के मार्ग पर चलना होगा।

सुझाव और आगे की राह

  • तकनीकी का उपयोग: आधुनिक अनुवाद उपकरणों और एआई का उपयोग करके सरकारी सूचनाओं को अल्पसंख्यक भाषाओं में भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • बहुभाषी शिक्षा: त्रिभाषा सूत्र (Three-Language Formula) को उसकी वास्तविक भावना के साथ लागू किया जाए, जिसमें अल्पसंख्यक भाषा को भी सम्मानजनक स्थान मिले।
  • संवेदीकरण: बहुसंख्यक समुदाय को यह समझना होगा कि उनकी भाषा का विकास दूसरी भाषाओं के दमन पर आधारित नहीं होना चाहिए।
  • संवाद को बढ़ावा: राज्यों को एक-दूसरे की भाषाओं और संस्कृतियों को मनाने के लिए साझा मंच तैयार करने चाहिए।

निष्कर्ष

भाषा केवल एक कोड नहीं है; यह वह खिड़की है जिससे हम दुनिया को देखते हैं। हर राज्य में भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना केवल एक कानूनी दायित्व नहीं है, बल्कि यह भारत की ‘विविधता में एकता’ के मंत्र की परीक्षा है। केरल का हालिया उदाहरण हमें सिखाता है कि क्षेत्रीय गौरव और अल्पसंख्यक अधिकारों का संतुलन संभव है।

संवैधानिक नैतिकता यह मांग करती है कि बहुमत की आवाज इतनी तेज न हो जाए कि वह अल्पसंख्यकों की कोमल वाणी को दबा दे। भाषाई समूहों के बीच सद्भावना को बढ़ावा देना राष्ट्र-निर्माण की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हमें एक ऐसा भारत बनाना होगा जहाँ एक व्यक्ति अपनी मातृभाषा में बोलने पर खुद को अजनबी महसूस न करे, चाहे वह देश के किसी भी कोने में क्यों न हो। जैसा कि वर्तमान समय की आवश्यकता है, हमें ‘एक राष्ट्र, अनेक भाषाएँ’ के आदर्श को मजबूती से थामे रखना होगा।


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