in , ,

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और न्यायिक द्वंद्व

सर्वोच्च न्यायालय का खंडित फैसला

भ्रष्टाचार किसी भी जीवंत लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाली एक ऐसी सामाजिक व्याधि है, जिसे मिटाने के लिए ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ (Prevention of Corruption Act – PCA), 1988 को एक मारक हथियार के रूप में लाया गया था। हालाँकि, हाल के वर्षों में इस कानून की व्याख्या को लेकर न्यायपालिका के भीतर मतभेद और विवाद उभरकर सामने आए हैं। विशेष रूप से, सर्वोच्च न्यायालय के हालिया ‘खंडित फैसले’ (Split Verdict) ने सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में ‘रिश्वत की मांग’ और ‘स्वीकृति’ को साबित करने के मानकों पर नई बहस छेड़ दी है। यह लेख उस कानूनी जटिलता का विश्लेषण करता है जहाँ न्याय की तराजू एक तरफ सार्वजनिक जवाबदेही और दूसरी तरफ आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के बीच झूल रही है।

1. मामले की पृष्ठभूमि: कानूनी विवाद का मूल

विवाद का मुख्य केंद्र भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और धारा 13 हैं। सामान्यतः, भ्रष्टाचार के किसी मामले को साबित करने के लिए अभियोजन (Prosecution) को तीन चीजें साबित करनी होती हैं: रिश्वत की मांग (Demand), उसकी स्वीकृति (Acceptance) और अवैध परितोषण की बरामदगी (Recovery)।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि यदि ‘रिश्वत की मांग’ का कोई सीधा सबूत (जैसे गवाह या रिकॉर्डिंग) मौजूद न हो, तो क्या केवल ‘बरामदगी’ और ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’ के आधार पर किसी सार्वजनिक सेवक को दोषी ठहराया जा सकता है? एक न्यायाधीश का मानना था कि कानून को सख्त होना चाहिए ताकि भ्रष्टाचारियों को तकनीकी खामियों का लाभ न मिले, जबकि दूसरे न्यायाधीश का तर्क था कि बिना पुख्ता सबूत के सजा देना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

2. ‘नीरज दत्ता’ फैसले का साया और वर्तमान व्याख्या

इस कानूनी उलझन को समझने के लिए 2022 के ‘नीरज दत्ता बनाम राज्य’ मामले के फैसले को देखना अनिवार्य है। उस समय पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि यदि शिकायतकर्ता (Complainant) मर जाता है या गवाही देने में असमर्थ है, तो भी ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्यों’ के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला चलाया जा सकता है।

लेकिन, हालिया खंडित फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘नीरज दत्ता’ फैसले का अर्थ यह कतई नहीं है कि ‘रिश्वत की मांग’ को साबित करने की आवश्यकता ही खत्म हो गई है। न्यायालय के भीतर एक पक्ष का तर्क है कि मांग का प्रमाण (Proof of Demand) एक अनिवार्य शर्त (Sine qua non) है, और इसके बिना केवल पैसों की बरामदगी किसी को अपराधी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

3. धारा 7 और धारा 13: बदलते आयाम

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 ‘लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेने’ से संबंधित है, जबकि धारा 13 ‘आपराधिक कदाचार’ (Criminal Misconduct) की व्याख्या करती है। 2018 के संशोधन के बाद, इन धाराओं को और अधिक व्यापक बनाया गया था।

  • धारा 7: अब इसमें ‘अनुचित लाभ’ (Undue Advantage) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो केवल नकद तक सीमित नहीं है।

चुनौती: अभियोजन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना होता है कि जो पैसा बरामद हुआ, वह ‘रिश्वत’ के रूप में ही दिया गया था, न कि किसी अन्य वैध लेनदेन या उधार के रूप में। खंडित फैसले ने इसी बिंदु पर संदेह पैदा कर दिया है कि क्या ‘स्वैच्छिक स्वीकृति’ को केवल अनुमान (Presumption) के आधार पर सजा का आधार बनाया जा सकता है।

4. लोक सेवकों के लिए सुरक्षा कवच: धारा 17A

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में एक और विवादित आयाम धारा 17A है, जिसे 2018 में जोड़ा गया था। यह धारा कहती है कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले संबंधित सरकार की ‘पूर्व मंजूरी’ (Prior Sanction) अनिवार्य है।

  • तर्क: सरकार का कहना है कि यह ईमानदार अधिकारियों को झूठी शिकायतों और उत्पीड़न से बचाने के लिए आवश्यक है।

विरोध: आलोचकों और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान जांच एजेंसियों के हाथ बांध देता है और प्रभावशाली भ्रष्ट अधिकारियों को एक ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर इस सुरक्षा और जांच की निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

5. परिस्थितिजन्य साक्ष्य बनाम प्रत्यक्ष प्रमाण

कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि ‘अपराध को संदेह से परे साबित किया जाना चाहिए’। भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर ‘ट्रैप’ (रंगे हाथ पकड़ना) लगाया जाता है। खंडित फैसले में एक न्यायाधीश का दृष्टिकोण यह था कि यदि आरोपी के पास से पैसा बरामद हुआ है और वह उसकी संतोषजनक व्याख्या नहीं दे पाता, तो यह माना जाना चाहिए कि उसने रिश्वत मांगी थी।

वहीं, दूसरा दृष्टिकोण यह है कि ‘बरामदगी’ और ‘मांग’ दो अलग-अलग चीजें हैं। कई बार किसी को फंसाने के लिए उसकी जेब या दराज में पैसे रखे जा सकते हैं। इसलिए, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने सक्रिय रूप से पैसे मांगे थे, तब तक उसे दोषी मानना ‘अनुच्छेद 21’ (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन हो सकता है।

6. भ्रष्टाचार के मामलों में देरी और अभियोजन की विफलता

NCRB के आंकड़े बताते हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि (Conviction Rate) की दर भारत में काफी कम है। इसका मुख्य कारण जांच में देरी, गवाहों का मुकर जाना और कानूनी व्याख्याओं में अस्पष्टता है। सर्वोच्च न्यायालय का खंडित फैसला इस अस्पष्टता को और बढ़ाता है, जिससे निचली अदालतों में मुकदमों के निस्तारण में और अधिक समय लग सकता है। जब तक एक बड़ी पीठ (Larger Bench) इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं देती, तब तक जांच एजेंसियां और आरोपी दोनों ही अनिश्चितता के भंवर में रहेंगे।

7. अंतरराष्ट्रीय मानक और भारत की स्थिति

भारत ‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (UNCAC) का हस्ताक्षरकर्ता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ‘कठोर उत्तरदायित्व’ (Strict Liability) के सिद्धांतों पर जोर दिया जाता है। कई विकसित देशों में, यदि किसी लोक सेवक की संपत्ति उसकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक पाई जाती है, तो सबूत का बोझ (Burden of Proof) आरोपी पर होता है कि वह अपनी बेगुनाही साबित करे। भारत में भी धारा 20 के तहत कुछ धारणाएं (Presumptions) मौजूद हैं, लेकिन उन्हें ‘मांग’ साबित करने की अनिवार्यता के साथ कैसे जोड़ा जाए, यह अभी भी एक कानूनी पहेली बनी हुई है।

8. तकनीकी युग में डिजिटल साक्ष्य की भूमिका

2026 के इस दौर में, अब केवल मौखिक गवाही पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल साक्ष्य (कॉल रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी फुटेज, व्हाट्सएप चैट) की भूमिका बढ़ गई है। ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ (अब भारतीय साक्ष्य संहिता) के तहत डिजिटल साक्ष्यों की स्वीकार्यता ने अभियोजन को मजबूत किया है। यदि जांच एजेंसियां वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करें, तो ‘रिश्वत की मांग’ को साबित करने के लिए शिकायतकर्ता की गवाही पर निर्भरता कम की जा सकती है।

9. न्यायिक पारदर्शिता और ‘खंडित फैसले’ का प्रभाव

खंडित फैसला (1:1 का निर्णय) कानून के शासन के लिए एक अनूठी चुनौती है। इसका मतलब है कि कानून उस विशेष बिंदु पर ‘मौन’ या ‘अस्थिर’ हो गया है। ऐसे मामलों को अंततः मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक बड़ी पीठ (तीन या पाँच न्यायाधीशों की पीठ) को भेजा जाता है। इस देरी का लाभ अक्सर उन प्रभावशाली लोगों को मिलता है जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप होते हैं। न्यायालय को चाहिए कि वह ‘लोक सेवा की शुचिता’ और ‘अभियुक्त के अधिकार’ के बीच एक ऐसा सुसंगत सिद्धांत प्रतिपादित करे जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति को पुख्ता करे।

10. निष्कर्ष: एक स्पष्ट वैधानिक दिशा की आवश्यकता

भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है, यह शासन व्यवस्था के प्रति आम आदमी के विश्वास की हत्या है। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अब यह चुनौती है कि वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की व्याख्या इस तरह करे कि वह न तो ईमानदार अधिकारियों के लिए सिरदर्द बने और न ही भ्रष्ट लोगों के लिए ‘कानूनी ढाल’।

‘रिश्वत की मांग’ को साबित करने के मानक इतने कड़े नहीं होने चाहिए कि अपराधी बच निकले, और न ही इतने ढीले होने चाहिए कि निर्दोष को फंसाया जा सके। अंततः, भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना केवल कानूनों से नहीं, बल्कि उन कानूनों की स्पष्ट, कठोर और न्यायसंगत न्यायिक व्याख्या से ही संभव होगा। 2018 के संशोधनों और हालिया न्यायिक मतभेदों के बीच, एक बड़ी पीठ का स्पष्ट फैसला अब समय की मांग है ताकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में कोई कानूनी अस्पष्टता आड़े न आए।


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

नाटो का भविष्य खतरे में?

क्लासिकी उदारवाद (Classical liberalism)