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मद्रास उच्च न्यायालय: न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह

The Madras High Court Must Break Its Silence

उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पहला कदम कोलेजियम प्रणाली के तहत होता है। जिसमें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उनके दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
कोलेजियम द्वारा सिफारिश किए जाने के बाद मामला राज्य सरकार के पास भेजा जाता है, जो उम्मीदवारों के संबंध में आपत्ति या स्पष्टीकरण मांग सकती है। हालांकि, यदि कोलेजियम अपनी सिफारिश दोहराता है या आवश्यक स्पष्टीकरण प्रदान करता है, तो राज्य सरकार को उसका निर्णय स्वीकार करना होता है।

मद्रास उच्च न्यायालय कोलेजियम की संरचना पर स्पष्टीकरण की मांग

  • नवंबर 2025 में मद्रास उच्च न्यायालय कोलेजियम ने छह जिला न्यायाधीशों के पदोन्नयन की सिफारिश की। राज्य सरकार ने उम्मीदवारों की योग्यता पर कोई आपत्ति नहीं जताई, बल्कि केवल एक प्रक्रियात्मक प्रश्न उठाया कि कोलेजियम का गठन विधिसम्मत था या नहीं।

न्यायमूर्ति निशा बानू का मामला

  • न्यायमूर्ति जे. निशा बानू, जिन्हें 2016 में उच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया था, वर्तमान में मद्रास उच्च न्यायालय की दूसरी वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं और इसलिए कोलेजियम की सदस्य होने की अधिकारी हैं।
  • हालाँकि, 14 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने उनका केरल उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने की सिफारिश की और उन्हें वहाँ नवम वरिष्ठता स्थान पर रखा।
  • लेकिन उन्होंने अब तक केरल उच्च न्यायालय में कार्यभार ग्रहण नहीं किया है और अभी भी मद्रास में सेवा दे रही हैं, इस प्रकार वे व्यवहारिक रूप से कोलेजियम की सदस्य हैं।

राज्य सरकार की चिंता: उन्हें शामिल क्यों नहीं किया गया?

राज्य सरकार ने पूछा कि जब न्यायमूर्ति निशा बानू अभी भी मद्रास उच्च न्यायालय में कार्यरत हैं, तो उन्हें कोलेजियम की बैठक से बाहर क्यों रखा गया और उनकी जगह न्यायमूर्ति एम. एस. रमेश को क्यों शामिल किया गया?

राज्य ने तीन प्रमुख स्पष्टीकरण मांगे;

  1. इस परिवर्तन का कानूनी आधार क्या है?
  2. क्या सुप्रीम कोर्ट का कोई निर्देश या संवैधानिक सिद्धांत ऐसा परिवर्तन उचित ठहराता है?
  3. क्या कोलेजियम ने यह मान लिया कि न्यायमूर्ति निशा बानू अब मद्रास उच्च न्यायालय की सदस्य नहीं हैं?

कोलेजियम ने इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया और इसके बजाय नौ और अधिवक्ताओं को रिक्तियों के लिए सिफारिश कर दी।

संवैधानिक और प्रक्रियात्मक प्रभाव

  • मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर स्पष्ट रूप से बताता है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उनके दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों को कोलेजियम बनाना चाहिए।
  • किसी वरिष्ठ न्यायाधीश की उपेक्षा संवैधानिक वैधता, संस्थागत अखंडता और निर्धारित नियमों के पालन पर गंभीर प्रश्न उठाती है।
  • चाहे यह गलती से हुआ हो या जानबूझकर न्यायमूर्ति निशा बानू को कोलेजियम से बाहर रखना, स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन है।
  • राज्य सरकार का यह अधिकार है कि वह स्पष्टीकरण मांगे, क्योंकि पारदर्शिता और संवैधानिक मानदंडों का पालन ही न्यायिक नियुक्तियों की नींव है।

जब प्रक्रियात्मक चूक संवैधानिक वैधता को खतरे में डालती है

  • न्यायिक नियुक्तियों में प्रक्रियात्मक नियम मात्र औपचारिकताएँ नहीं हैं बल्कि ये कोलेजियम की संवैधानिक वैधता का आधार हैं।
    क्योंकि कोलेजियम प्रणाली स्वयं न्यायिक दृष्टांतों पर आधारित है, इसे वैधता बनाए रखने के लिए स्थापित प्रक्रिया का कठोर पालन करना आवश्यक है।
  • किसी वरिष्ठ न्यायाधीश को बिना दर्ज कारणों के बाहर रखना और उसकी जगह किसी ऐसे न्यायाधीश को शामिल करना जिसका अधिकार क्षेत्र स्पष्ट नहीं है, कोलेजियम के निर्णयों की वैधता को कमजोर करता है।
  • एक गलत ढंग से गठित कोलेजियम की सिफारिशें शून्य हो सकती हैं, जिससे यह संकट उत्पन्न होता है कि निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है।

पारदर्शिता और स्पष्टीकरण की आवश्यकता

  • मद्रास उच्च न्यायालय कोलेजियम को कानून और प्रक्रिया के अनुसार यह स्पष्ट करना चाहिए कि न्यायमूर्ति निशा बानू को क्यों बाहर रखा गया और न्यायमूर्ति रमेश को क्यों शामिल किया गया।
  • कोलेजियम की चुप्पी न्यायपालिका की संरचनात्मक अखंडता को नुकसान पहुँचाती है और अटकलों को जन्म देती है।
  • किसी न्यायाधीश की विचारधारा या व्यक्तिगत पृष्ठभूमि को कभी भी संवैधानिक नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
  • न्यायिक निर्णयों का मार्गदर्शन निष्पक्षता, परामर्श और न्याय के सिद्धांतों से होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा संचालित कोलेजियम सुधारों की आवश्यकता

यह स्थिति कई पुराने सुधार प्रस्तावों को पुनः जीवित करती है:

  • कोलेजियम की संरचना पर स्पष्ट नियम
  • निर्णयों के कारणों का सार्वजनिक प्रकाशन
  • पारदर्शिता बढ़ाने हेतु अनिवार्य प्रकटीकरण

सुप्रीम कोर्ट को इस प्रणाली की समीक्षा करनी चाहिए ताकि अस्पष्टता और असंगति को रोका जा सके।

भारत में कोलेजियम प्रणाली का विकास

कॉलेजियम प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय  और  उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों की एक प्रणाली है  यह संविधान में निहित नहीं है। बल्कि, यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है।

सरकार कॉलेजियम द्वारा किए गए चयन पर आपत्ति उठा सकती है और स्पष्टीकरण मांग सकती है, लेकिन यदि कॉलेजियम उन्हीं नामों को दोहराता है, तो सरकार उन्हें पद पर नियुक्त करने के लिए बाध्य है।

इस प्रणाली का विकास कैसे हुआ

  • पहला न्यायाधीश मामला (1981): इसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) की सिफारिश को प्रधानता दी गई, परंतु कार्यपालिका को वैध कारणों से अस्वीकार करने का अधिकार था।
  • दूसरा न्यायाधीश मामला (1993): इसमें कोलेजियम प्रणाली की नींव रखी गई, जहाँ “परामर्श” का अर्थ वरिष्ठ न्यायाधीशों की सहमति (concurrence) माना गया।
  • तीसरा न्यायाधीश मामला (1998): इसमें कोलेजियम का विस्तार करते हुए CJI + चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों को शामिल किया गया।

संरचना

  • सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम: मुख्य न्यायाधीश (CJI) + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश
  • हाई कोर्ट कोलेजियम: मुख्य न्यायाधीश + दो वरिष्ठतम न्यायाधीश

न्यायाधीश नियुक्ति प्रक्रिया (Judicial Appointment Process)

  • CJI की नियुक्ति: निवर्तमान CJI अपने उत्तराधिकारी का नाम सुझाते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश: CJI वरिष्ठ न्यायाधीशों से परामर्श कर सिफारिशें विधि मंत्री को भेजते हैं।
  • हाई कोर्ट न्यायाधीश: मुख्य न्यायाधीश दो सहयोगियों के साथ सिफारिश करते हैं, जो मुख्यमंत्री और विधि मंत्री को भेजी जाती है।

संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)

  • अनुच्छेद 124: सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, CJI से परामर्श के बाद।
  • अनुच्छेद 217: हाई कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, CJI, राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद।

कॉलेजियम प्रणाली में हालिया परिवर्तन

हाल के विकास यह संकेत देते हैं कि भारत की कोलेजियम प्रणाली में परिवर्तन किए जा रहे हैं, जिनमें न्यायाधीश पद के उम्मीदवारों के लिए साक्षात्कार की शुरुआत और न्यायपालिका में न्यायाधीशों के रिश्तेदारों को बाहर रखने के प्रयास शामिल हैं। इन कदमों का उद्देश्य पारदर्शिता और विविधता को बढ़ाना है, किंतु इनके कार्यान्वयन और सरकारी प्रभाव से जुड़ी चुनौतियाँ अब भी गंभीर बनी हुई हैं।

सुप्रीम कोर्ट की कोलेजियम ने अपनी कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। दो मुख्य सुधार सामने आए हैं-

  1. न्यायाधीश उम्मीदवारों के साक्षात्कार: उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए अब उम्मीदवारों का साक्षात्कार किया जाएगा।
  2. करीबी रिश्तेदारों को बाहर रखना: उच्च न्यायिक पदों पर कार्यरत न्यायाधीशों के निकट संबंधियों को न्यायिक नियुक्तियों से बाहर रखने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि विविधता को प्रोत्साहन मिले।

यद्यपि ये सुधार तार्किक प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके कार्यान्वयन और दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर चिंताएँ हैं। दोनों सुधारों का उद्देश्य न्यायपालिका की अखंडता को सुदृढ़ करना और प्रतिनिधित्व बढ़ाना है।

परिवर्तनों का मूल्यांकन

  • विविधता बनाम योग्यता: न्यायिक परिवारों के सदस्यों को बाहर रखने से कुछ योग्य उम्मीदवार छूट सकते हैं। हालांकि, उद्देश्य विविधता और योग्यता के बीच संतुलन स्थापित करना है।
  • अनिश्चित प्रभाव: यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ये सुधार कितने प्रभावी होंगे। उनकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि सरकार कोलेजियम की सिफारिशों का कितना सम्मान करती है।

कोलेजियम प्रणाली की प्रमुख चुनौतियाँ

  1. पारदर्शिता की कमी: निर्णय प्रक्रिया अस्पष्ट और जनसुलभ नहीं।
  2. कोई बाध्यकारी नियम नहीं: निर्णय व्याख्या पर निर्भर रहते हैं।
  3. सरकारी देरी: सिफारिशों को लंबे समय तक रोका जा सकता है।
  4. राजनीतिक प्रभाव: नियुक्तियों में राजनीतिक दखलंदाजी का खतरा।
  5. नियुक्ति प्रक्रिया की अक्षमता: उच्च न्यायालयों में रिक्तियाँ बढ़ रही हैं, जिससे मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है।
  6. योग्य उम्मीदवारों का बहिष्कार: परिवारिक संबंधों के आधार पर योग्य उम्मीदवारों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
  7. सुधारों के क्रियान्वयन की अस्पष्टता: साक्षात्कार और पारिवारिक बहिष्कार जैसे सुधारों के लिए ठोस ढाँचा नहीं है।
  8. न्यायिक स्वतंत्रता बनाम सरकारी नियंत्रण: सरकार की देरी या असहमति न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करती है।
  9. संवैधानिक स्पष्टता की कमी: कोलेजियम प्रणाली का कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान नहीं है, जिससे असमंजस पैदा होता है।

कोलेजियम प्रणाली से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ

  1. अस्पष्टता (Opacity): कोलेजियम की कार्यप्रणाली पर कोई बाध्यकारी नियम नहीं हैं। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (MoP) के उल्लंघन पर कार्यवाही कैसे होगी, यह स्पष्ट नहीं है।
  2. सरकारी हस्तक्षेप: न्यायपालिका के अंतिम शब्द होने के बावजूद सरकार कोलेजियम की सिफारिशों को रोक या विलंबित कर सकती है।
  • दूसरा न्यायाधीश मामला (1993): इसमें कहा गया कि “परामर्श” का अर्थ वरिष्ठ न्यायाधीशों की सहमति है, जिससे कोलेजियम प्रणाली बनी।
  • चौथा न्यायाधीश मामला (2015): कोर्ट ने दोहराया कि कोलेजियम प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने और संविधान की मूल संरचना की रक्षा के लिए आवश्यक है। इसलिए NJAC अधिनियम, 2014 को पास किया गया

लेकिन उसके बाद ही न्यायपालिका और कार्यपालिका (Executive) के बीच इस बात पर विवाद बढ़ा कि नियुक्तियों में अंतिम निर्णय किसका होना चाहिए- सरकार का या न्यायपालिका का?

2015 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को संविधान के मूल ढाँचे (basic structure) के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक और अमान्य घोषित कर दिया।

NJAC अधिनियम, 2014 क्या था?

संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014 द्वारा अनुच्छेद 124A, 124B, और 124C जोड़े गए, जिनसे न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक नई संस्था राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाई गई।

NJAC की संरचना

  1. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) – अध्यक्ष
  2. सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश
  3. विधि मंत्री (Law Minister)
  4. दो “प्रतिष्ठित व्यक्ति” (Eminent Persons)- जिन्हें प्रधानमंत्री, CJI और विपक्ष के नेता की समिति द्वारा चुना जाना था

NJAC का उद्देश्य

  • कोलेजियम प्रणाली की अस्पष्टता (opacity) और भाई-भतीजावाद (nepotism) को दूर करना
  • न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना
  • कार्यपालिका को भी नियुक्ति प्रक्रिया में समान भागीदारी देना
  • न्यायपालिका की विविधता और दक्षता बढ़ाना

NJA C के खिलाफ याचिकाएँ (Petitions Challenging NJAC)

कई वकीलों और संगठनों ने NJAC अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, यह कहते हुए कि—

  • यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता (independence) को कमजोर करता है,
  • और संविधान के मूल ढाँचे (basic structure doctrine) का उल्लंघन करता है।

इन याचिकाओं की सुनवाई संविधान पीठ (Constitution Bench) द्वारा की गई, जिसमें पाँच न्यायाधीश शामिल थे;
Justices J.S. Khehar, Madan B. Lokur, Kurian Joseph, Adarsh Kumar Goel, और J. Chelameswar

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 

बहुमत का तर्क 

  • NJAC न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) को खतरे में डालता है।
  • न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका (सरकार) की भागीदारी से न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
  • यह संविधान के मूल ढाँचे सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) का उल्लंघन करता है।

न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर का असहमति मत 

  • उन्होंने माना कि कोलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी है और NJAC उसे सुधारने का प्रयास था।
  • उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को भी “जवाबदेही” स्वीकार करनी चाहिए।

मुख्य कारण: सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को असंवैधानिक क्यों ठहराया?

मुख्य कारणविवरण
1. न्यायिक स्वतंत्रता का हननNJAC में विधि मंत्री और दो “प्रतिष्ठित व्यक्तियों” की उपस्थिति न्यायिक नियुक्तियों पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ा सकती थी।
2. शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन (Separation of Powers)संविधान के अनुसार, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियाँ अलग हैं। NJAC ने कार्यपालिका को न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अधिकार दिया।
3. ‘Eminent Persons’ की परिभाषा अस्पष्टइन व्यक्तियों के चयन का कोई स्पष्ट मानदंड नहीं था, जिससे संभावित राजनीतिक नियुक्तियों का खतरा था।
4. न्यायपालिका की प्रधानता (Judicial Primacy) समाप्त होनाJudges’ Cases के अनुसार, नियुक्तियों में न्यायपालिका की अंतिम सहमति (concurrence) आवश्यक है — जिसे NJAC ने कमजोर कर दिया।
5. मूल ढाँचे का उल्लंघन (Basic Structure Doctrine)न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है; NJAC ने इस सिद्धांत को क्षति पहुँचाई।

कोलेजियम प्रणाली की बहाली

NJAC के खारिज होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम प्रणाली को फिर से लागू किया और उसके सुधार के लिए सरकार से सुझाव मांगे।
हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि कोलेजियम प्रणाली अस्पष्ट और जवाबदेहीहीन है लेकिन उसका सुधार संविधान के भीतर ही किया जाना चाहिए, न कि उसे खत्म कर।

निष्कर्ष

2015 का NJAC निर्णय केवल एक कानूनी फैसला नहीं था, बल्कि यह संविधान के मूल सिद्धांत न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण की पुनर्पुष्टि थी।
हालाँकि कोलेजियम प्रणाली में सुधार आवश्यक है, परंतु उसे समाप्त कर कार्यपालिका को अधिकार देना न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है।
इसलिए, भविष्य का रास्ता सहयोग आधारित सुधार (collaborative reform) होना चाहिए, न कि टकराव।

 


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