महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए सभी सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं और सरकारी सहायता प्राप्त कार्यालयों में आधिकारिक संचार के लिए मराठी भाषा के उपयोग को अनिवार्य कर दिया है। वर्ष 2024 में स्वीकृत मराठी भाषा नीति के तहत यह प्रावधान किया गया कि सभी सार्वजनिक कार्यों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मराठी भाषा का प्रयोग प्रमुख रूप से किया जाएगा।
भारत की मूल पहचान उसकी विविधता और बहुलता में निहित है। यही कारण है कि संविधान-निर्माताओं ने इस बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक परंपरा को स्वीकार करते हुए न केवल भाषाई विविधता बल्कि संघीय संरचना को भी संस्थागत मान्यता दी। किंतु इन संवैधानिक मूल्यों की जड़ें केवल आधुनिक भारत तक सीमित नहीं हैं; वे भारतीय इतिहास में गहराई से निहित रही हैं।
इसी ऐतिहासिक परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण हमें मराठा रियासतों में मिलता है। विशेषकर ग्वालियर की सिंधिया रियासत ने यह दिखाया कि शासन केवल शक्ति का केंद्रीकरण नहीं, बल्कि भाषाई बहुलता, सांस्कृतिक संरक्षण और संवैधानिक नवाचारों का भी माध्यम हो सकता है। यहाँ न केवल विभिन्न भाषाओं को सम्मान और संरक्षण मिला, बल्कि प्रशासन और शिक्षा में भी उनका सक्रिय प्रयोग हुआ। इस प्रकार मराठा शासकों ने आधुनिक संविधान-निर्माण से बहुत पहले ही भाषाई अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रयोगों की नींव रख दी थी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक दृष्टिकोण
- ब्रिटिश उपनिवेश काल में अधिकांश रियासतों ने पारंपरिक शासन व्यवस्था अपनाई, लेकिन ग्वालियर जैसी मराठा रियासतों ने संवैधानिकता की दिशा में कदम बढ़ाए।
- महाराजा जीवाजीराव सिंधिया ने विधानसभा की स्थापना की, जो भारतीय संविधान में राज्यों की विधानसभाओं की परिकल्पना (अनुच्छेद 168-212) से मेल खाती है।
- रियासत में शिक्षा और प्रशासन में बहुभाषी नीति अपनाना संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 (भाषाई एवं सांस्कृतिक अधिकार) का पूर्वाभास था।
बहुभाषी शिक्षा और संविधान की भाषा नीति
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343-351 में हिंदी, अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं के संतुलन की व्यवस्था की गई।
- ग्वालियर की मराठा रियासतों ने पहले ही यह प्रयोग कर लिया था:
- हिंदी और अंग्रेज़ी को शिक्षा का आधार बनाया।
- संस्कृत और फारसी जैसी शास्त्रीय भाषाओं का संरक्षण किया।
- मराठी और उर्दू का सम्मान बनाए रखा।
- यह संवैधानिक बहुभाषिकता के व्यावहारिक प्रयोग का ऐतिहासिक उदाहरण है।
सांस्कृतिक संरक्षण और संवैधानिक मूल्यों का मेल
- भारतीय संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 51A नागरिकों को सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का दायित्व सौंपते हैं।
- ग्वालियर घराना और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का संरक्षण इसी दृष्टिकोण से मेल खाता है।
- सिंधिया वंश ने संगीतज्ञों और विद्वानों को आश्रय देकर यह सुनिश्चित किया कि संस्कृति और परंपरा समाज की साझा धरोहर बनी रहे।
संवैधानिक सुधारों की दिशा
- ग्वालियर राज्य में प्रशासनिक सुधारों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव रखी:
- विधानसभा की स्थापना (ब्रिटिश काल से पहले ही)
- नीतिगत निर्णयों में जन-प्रतिनिधियों की भागीदारी
- महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक सुधार
- यह सब संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और अनुच्छेद 39 (राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत) से गहरे रूप से संबंधित है।
संघीय बहुलता और भारतीय संघवाद
- मराठा रियासतों ने दिखाया कि क्षेत्रीय राजनीति और भाषाई विविधता राष्ट्रीय एकता में बाधा नहीं बल्कि शक्ति का स्रोत है।
- यह दृष्टिकोण संविधान की संघीय संरचना (अनुच्छेद 1-2 और सातवीं अनुसूची) में परिलक्षित होता है।
- ग्वालियर जैसे राज्यों में भाषाई बहुलता और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण ने भारतीय संघवाद को ऐतिहासिक आधार प्रदान किया।
- सिंधिया वंश के मराठा शासकों ने हिंदी भाषी क्षेत्र में शासन करते हुए इस बात को समझा कि राजनीति केवल शक्ति का केंद्रीकरण नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक और सांस्कृतिक सहभागिता भी आवश्यक है।
- उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व देकर लोकतांत्रिक भावना को मजबूत किया।
- बहुभाषी शिक्षा ने विभिन्न भाषाई समूहों को जोड़ने का काम किया।
- सांस्कृतिक संरक्षण ने समाज को एकता और गर्व की भावना से जोड़ा।
आज के भारत के लिए प्रासंगिकता
- आज जब भाषाई पहचान और राष्ट्रीय एकता को लेकर बहस चल रही है, मराठा रियासतों का उदाहरण हमें संतुलन का मार्ग दिखाता है।
- यह सिद्ध करता है कि बहुभाषी शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और संवैधानिक सुधार एक साथ संभव हैं।
- संघीय बहुलता ही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
वर्तमान में शास्त्रीय भाषाओ का संवैधानिक पक्ष
- वर्ष 1960 में मराठी को महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया।
- वर्ष 2024 में मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ।
- भारत में दो आधिकारिक भाषाएँ (हिंदी और अंग्रेज़ी) हैं तथा संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं का उल्लेख है।
- इसमें असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं।
- भारतीय संविधान केभाग XVII में अनुच्छेद 343 से 351 तक आधिकारिक भाषाओं का उल्लेख है।
भारत के अन्य राज्यों में अनिवार्य क्षेत्रीय भाषाएँ
- तमिलनाडु: यहाँ सरकारी संचार के लिये तमिल भाषा का प्रयोग अनिवार्य है और सरकारी नौकरियों हेतु कक्षा 10 की तमिल परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक है।
- कर्नाटक: साइनबोर्ड में 60 प्रतिशत कन्नड़ भाषा का उपयोग अनिवार्य किये जाने के साथ यहाँ सरकारी कार्यालयों और व्यवसायों के साइनबोर्डों में कन्नड़ भाषा का प्रयोग किया जाना अनिवार्य है।
- झारखंड: झारखंड में सरकारी नौकरियों के लिये क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया है, जिसके तहत उम्मीदवारों को मुंडारी, संथाली, हो या कुरुख जैसी भाषाओं में कम से कम 30% अंक लाना अनिवार्य कर दिया गया है।
- पश्चिम बंगाल: सरकारी नौकरियों के लिये बंगाली भाषा में पारंगत उम्मीदवारों को नियुक्त करने को प्रोत्साहित करता है।
राजभाषा से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान क्या हैं?
- अनुच्छेद 345: संविधान के अनुच्छेद 345 में कहा गया है कि राज्य विधानमंडल आधिकारिक उद्देश्यों के लिये एक या एक से अधिक भाषाओं का चयन कर सकता है।
- इसमें राज्य में पहले से ही बोली जाने वाली भाषा या भाषाएँ, अथवा हिंदी शामिल हैं।
- अनुच्छेद 347: संविधान का अनुच्छेद 347 किसी राज्य की जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को मान्यता देने से संबंधित है।
- यह राष्ट्रपति को ऐसी भाषाओं को आधिकारिक रूप से मान्यता देने का अधिकार देता है, यदि राज्य की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसा अनुरोध करता है।
- यह प्रावधान राज्य के आधिकारिक ढाँचे में क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने की अनुमति देता है, जिससे भाषाई समावेशिता सुनिश्चित होती है।
- अनुच्छेद 350A: संविधान के अनुच्छेद 350A के अनुसार राज्यों को भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों के लिये मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। यह प्राथमिक शिक्षा पर लागू होता है।
- अनुच्छेद 351: संविधान का अनुच्छेद 351 राज्यों के अपनी आधिकारिक भाषाओं को बढ़ावा देने के भाषाई अधिकारों का हनन किये बिना संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के प्रसार को बढ़ावा देने का प्रावधान करता है।
संघ की भाषाओं से संबंधित समितियाँ और आयोग
- राजभाषा आयोग (1955): इसकी स्थापना बी.जी. खेर की अध्यक्षता में की गई थी, जिसने संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी और अंग्रेज़ी के प्रयोग के मुद्दे की जाँच की और हिंदी में परिवर्तन के लिये सिफारिशें कीं।
- संसदीय राजभाषा समिति (1976): संसदीय राजभाषा समिति (1976) ने संस्थाओं और केंद्रीय सेवा परीक्षाओं में अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी को शामिल करने की सिफारिश की।
- हालाँकि, इन प्रस्तावों को विशेष रूप से गैर-हिंदी भाषी राज्यों के प्रतिरोध के कारण पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है।
निष्कर्ष
मराठा रियासतें, विशेषकर ग्वालियर के सिंधिया शासक, केवल क्षेत्रीय शक्ति केंद्र नहीं थे, बल्कि उन्होंने भारतीय संविधान में बाद में दर्ज होने वाले कई मूल्यों का व्यावहारिक प्रयोग किया।
- बहुभाषी शिक्षा ने अनुच्छेद 343-351 की पृष्ठभूमि तैयार की।
- सांस्कृतिक संरक्षण ने अनुच्छेद 29-30 और 51A का पूर्वाभास दिया।
- संवैधानिक सुधारों ने लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत किया।
- संघीय बहुलता ने भारतीय संघवाद को दिशा दी।
इस प्रकार, मराठा रियासतों का योगदान न केवल इतिहास में, बल्कि भारतीय संविधान और लोकतंत्र की आत्मा में भी गहराई से दर्ज है।
(Source: The Daily Guardian)
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