हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय, जिसमें मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुँच को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई, इस दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक चेतना, नीति निर्माण और लैंगिक न्याय की दिशा में भी दूरगामी प्रभाव डालने वाला है।
मासिक धर्म (Menstruation) एक जैविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो मानव जीवन की निरंतरता के लिए अनिवार्य है। इसके बावजूद, यह प्रक्रिया सदियों से सामाजिक चुप्पी, शर्म, भेदभाव और अज्ञानता की शिकार रही है। भारत जैसे समाज में, जहाँ स्त्री देह से जुड़े विषयों पर खुलकर बात करना अब भी वर्जित माना जाता है, वहाँ मासिक धर्म केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि गरिमा, समानता और अधिकार का भी मुद्दा बन चुका है।
मासिक धर्म: जैविक सत्य और सामाजिक मिथक
वैज्ञानिक दृष्टि से मासिक धर्म स्त्री प्रजनन तंत्र का एक सामान्य हिस्सा है। फिर भी, भारतीय समाज में इसे लंबे समय तक “अपवित्र”, “अशुद्ध” या “लज्जाजनक” माना गया। इसके परिणामस्वरूप:
- महिलाओं को रसोई, पूजा, सामाजिक मेल-जोल से अलग किया गया।
- लड़कियों को स्कूल जाने से रोका गया।
- मासिक धर्म पर खुलकर बात करने को अशोभनीय माना गया।
ये सामाजिक मान्यताएँ न केवल अवैज्ञानिक हैं, बल्कि स्त्री की गरिमा और आत्मसम्मान को भी ठेस पहुँचाती हैं।
मासिक धर्म और लैंगिक असमानता
मासिक धर्म से जुड़ा भेदभाव वस्तुतः लैंगिक असमानता का प्रतिबिंब है। पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री के शरीर को नियंत्रित करने और उसके अनुभवों को हाशिये पर रखने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
कुछ प्रमुख उदाहरण:
- मासिक धर्म के दौरान स्कूल या कॉलेज में अनुपस्थिति।
- कार्यस्थलों पर संवेदनशील सुविधाओं की कमी।
- सैनिटरी उत्पादों पर कर (जो हाल तक लागू था)।
इस भेदभाव का सीधा प्रभाव लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य के अवसरों पर पड़ता है।
“मासिक धर्म गरीबी” (Menstrual Poverty): एक अनदेखी सच्चाई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में “मासिक धर्म गरीबी” शब्द का प्रयोग कर एक गहरी सामाजिक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया।
मासिक धर्म गरीबी का अर्थ:
- सैनिटरी पैड/उत्पादों की अनुपलब्धता।
- साफ पानी और शौचालयों की कमी।
- सुरक्षित निपटान व्यवस्था का अभाव।
NFHS-5 के अनुसार:
- 15–24 वर्ष की महिलाओं में स्वच्छ साधनों का उपयोग 77.3% तक पहुँचा है
- लेकिन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अब भी लगभग 20% का अंतर है
यह स्पष्ट करता है कि विकास का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँचा है।
शिक्षा पर प्रभाव: स्कूल छोड़ने की मजबूरी
मासिक धर्म स्वच्छता की कमी का सबसे गंभीर प्रभाव लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है।
- कई लड़कियाँ मासिक धर्म के दौरान स्कूल नहीं जातीं
- बार-बार अनुपस्थिति के कारण पढ़ाई छूट जाती है
- अंततः ड्रॉपआउट की संख्या बढ़ जाती है
यह स्थिति बालिका शिक्षा और लैंगिक समानता के राष्ट्रीय लक्ष्यों को कमजोर करती है।
संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
यह फैसला संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मासिक धर्म को एक निजी या घरेलू विषय के दायरे से निकालकर भारत के संविधान के मूल अधिकारों से सीधे जोड़ता है।
- अनुच्छेद 14 के तहत सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्राप्त है, लेकिन जब लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ शौचालय, पानी या सैनिटरी उत्पाद नहीं मिलते, तो वे शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों में लड़कों के बराबर नहीं रह पातीं। इस प्रकार वास्तविक समानता तभी संभव है जब उनकी विशेष जैविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
- अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध करता है, और मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं की कमी दरअसल स्त्रियों के साथ किया गया अप्रत्यक्ष लैंगिक भेदभाव है, क्योंकि यह समस्या केवल महिलाओं को प्रभावित करती है लेकिन समाधान को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया।
- वहीं अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें सम्मान के साथ जीने, स्वास्थ्य और स्वच्छता का अधिकार भी शामिल है। यदि किसी लड़की या महिला को मासिक धर्म के दौरान अस्वच्छ परिस्थितियों में रहना पड़े, संक्रमण का खतरा उठाना पड़े या सामाजिक अपमान झेलना पड़े, तो यह उसकी मानवीय गरिमा का उल्लंघन है।
- यह फैसला ने इस विषय को निजी चुप्पी से निकालकर सार्वजनिक नीति और संवैधानिक न्याय के केंद्र में स्थापित किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट कहा कि स्वच्छ उत्पादों, साफ पानी और शौचालयों की कमी केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या भी है।
- न्यायालय ने यह जिम्मेदारी राज्य पर डाली कि वह सभी लड़कियों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ सुलभ बनाए और उन सामाजिक रूढ़ियों व भेदभाव को समाप्त करे जो मासिक धर्म के दौरान लड़कियों को नियमित गतिविधियों में भाग लेने से रोकते हैं। निर्णय में कहा गया कि यह प्रथा किशोर लड़कियों की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन करती है।
- हालाँकि स्वच्छ भारत अभियान और जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार ने प्रगति की है, लेकिन अदालत ने कहा कि इनका क्रियान्वयन असमान और कई बार अधूरा रहा है।
- गैर-सरकारी संगठनों के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन समस्या की व्यापकता को देखते हुए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक है।
- अंततः, यह निर्णय याद दिलाता है कि मासिक धर्म कोई कलंक नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इससे जुड़ी सुविधाएँ कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार हैं।
नारीवादी परिप्रेक्ष्य: मासिक धर्म, सत्ता और स्त्री की देह पर नियंत्रण
नारीवाद (Feminism) के दृष्टिकोण से मासिक धर्म केवल एक स्वास्थ्य या स्वच्छता का विषय नहीं है, बल्कि यह स्त्री की देह पर सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत नियंत्रण का प्रतीक है।
नारीवादी चिंतन लंबे समय से इस बात पर बल देता रहा है कि पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्री के शरीर को “नियंत्रण”, “लज्जा” और “अनुशासन” के दायरे में रखा है, और मासिक धर्म इस नियंत्रण का सबसे सशक्त उदाहरण है।
देह–राजनीति (Body Politics) और मासिक धर्म
नारीवादी सिद्धांत के अनुसार, स्त्री की देह कभी भी पूरी तरह उसकी अपनी नहीं मानी गई।
यह देह-राजनीति स्त्री को यह संदेश देती है कि उसका शरीर “समस्या” है, जिसे छुपाया जाना चाहिए।
नारीवाद का एक केंद्रीय सिद्धांत है – “The Personal is Political” अर्थात जो कुछ निजी दिखता है, वह वास्तव में सत्ता संरचनाओं से जुड़ा होता है।
मासिक धर्म को लंबे समय तक “निजी मामला” कहकर:
- राज्य ने जिम्मेदारी से बचाव किया
- समाज ने चुप्पी बनाए रखी
- संस्थानों ने सुविधाओं की अनदेखी की
नारीवाद इस असमानता को चुनौती देता है और कहता है कि नीति–निर्माण में स्त्री अनुभवों को केंद्र में रखा जाना चाहिए, न कि उन्हें अपवाद की तरह देखा जाए।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस नारीवादी सिद्धांत को साकार करता है, क्योंकि यह मासिक धर्म को:
- घर की चारदीवारी से निकालकर
- सार्वजनिक नीति और संवैधानिक अधिकार
के दायरे में लाता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक पूर्ण विराम है, जो उस चुप्पी पर, उस उपेक्षा पर, और उस भेदभाव पर जो मासिक धर्म से जुड़ा रहा है। यह याद दिलाता है कि मासिक धर्म कोई कलंक नहीं, बल्कि जीवन की प्रक्रिया है, और इससे जुड़ी सुविधाएँ कोई दया नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार हैं।
जब तक हर लड़की और महिला मासिक धर्म के दौरान सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन नहीं जी पाती, तब तक समानता का सपना अधूरा रहेगा। यह फैसला उस सपने को साकार करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
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