म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC) 2026 को भविष्य के इतिहासकार एक ऐसे बिंदु के रूप में याद रखेंगे जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी ‘ब्रेटन वुड्स’ और ‘वेस्टफेलियन’ व्यवस्था का औपचारिक अंत और एक अनिश्चित, बहु-ध्रुवीय व्यवस्था का उदय हुआ। जर्मनी के म्यूनिख में जुटे दुनिया के शीर्ष नेताओं, रणनीतिकारों और रक्षा विशेषज्ञों के बीच इस बार का विमर्श केवल संघर्षों को रोकने पर नहीं, बल्कि बदली हुई भू-राजनीतिक हकीकत को स्वीकार करने पर था।
म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन क्या है?

एकध्रुवीयता का सूर्यास्त और ‘पॉली-क्राइसिस’ का युग
- 2026 तक आते-आते यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका अब दुनिया का इकलौता ‘पुलिसमैन’ नहीं रहा। सम्मेलन की शुरुआत में ही ‘पॉली-क्राइसिस’ (बहु-संकट) शब्द गूंजा, जो यह दर्शाता है कि दुनिया एक साथ कई मोर्चों पर टूट रही है।
- भू-राजनीतिक दृष्टि से, म्यूनिख 2026 ने यह स्वीकार किया कि अब वैश्विक सुरक्षा का केंद्र अटलांटिक (यूरोप-अमेरिका) से खिसककर इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) की ओर पूरी तरह स्थानांतरित हो चुका है। पुरानी गठबंधन प्रणालियाँ अब सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रही हैं, जिससे राष्ट्र अब ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की ओर बढ़ रहे हैं।
यूरेशियाई धुरी बनाम पश्चिमी गठबंधन
- सम्मेलन में सबसे अधिक चर्चा चीन-रूस-ईरान के बीच उभरती हुई ‘रणनीतिक धुरी’ पर हुई। 2026 का यह भू-राजनीतिक संरेखण नाटो (NATO) के लिए एक अस्तित्वगत चुनौती बनकर उभरा है।
- रूस और पूर्वी यूरोप: यूक्रेन युद्ध के दीर्घकालिक खिंचाव ने यूरोप की रक्षा सीमाओं को पुनर्भाषित कर दिया है। म्यूनिख में पोलैंड और बाल्टिक देशों ने एक नई ‘यूरोपीय रक्षा ढाल’ की वकालत की, जो अमेरिका पर निर्भर न हो।
- चीन का प्रभाव: बीजिंग की ‘ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव’ (GSI) अब म्यूनिख के मंच पर पश्चिमी ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ को सीधी चुनौती दे रही है। सम्मेलन में यह स्पष्ट दिखा कि अफ्रीका और मध्य-पूर्व के देश अब सुरक्षा के लिए वाशिंगटन के बजाय बीजिंग और मॉस्को के साथ संतुलन बना रहे हैं।
मध्य-पूर्व: ‘पेट्रो-पॉलिटिक्स’ से ‘पावर-पॉलिटिक्स’ तक
म्यूनिख 2026 में मध्य-पूर्व (West Asia) का एक नया चेहरा सामने आया। सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अब केवल ऊर्जा आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि वैश्विक मध्यस्थ (Mediators) के रूप में उभरे हैं।
सम्मेलन के दौरान अब्राहम समझौते के विस्तार और ईरान के साथ क्षेत्रीय कूटनीति पर गहन चर्चा हुई। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में अमेरिका की घटती सक्रियता ने एक ‘शक्ति शून्य’ (Power Vacuum) पैदा किया था, जिसे अब क्षेत्रीय ताकतें खुद भरने की कोशिश कर रही हैं।
ग्लोबल साउथ:
- 2026 के सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ग्लोबल साउथ का एक सशक्त ब्लॉक के रूप में उभरना रही। भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों ने यह साफ कर दिया कि वे अब ‘गुटनिरपेक्ष’ नहीं, बल्कि ‘बहु-संरेखित’ (Multi-aligned) हैं।
- भारत की भूमिका: भारत को ‘विश्व-मित्र’ और एक ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ (Net Security Provider) के रूप में देखा गया। म्यूनिख में भारतीय नेतृत्व ने तर्क दिया कि जब तक वैश्विक संस्थानों (UNSC) में सुधार नहीं होता, तब तक कोई भी विश्व व्यवस्था ‘वैध’ नहीं मानी जाएगी।
- संसाधन राष्ट्रवाद: अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों ने ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (लिथियम, कोबाल्ट) पर अपनी संप्रभुता का दावा किया, जिसने भू-राजनीति में एक नया आयाम जोड़ दिया है—’खनिज कूटनीति’।
तकनीक का सैन्यीकरण:
म्यूनिख 2026 ने यह स्थापित किया कि अब भू-राजनीति का अर्थ भू-तकनीक (Geo-technology) है। सेमीकंडक्टर चिप्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और एआई (AI) अब केवल व्यापार के विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्राथमिक हथियार हैं।
सम्मेलन में ‘टेक-सॉवरेनटी’ पर जोर दिया गया। अमेरिका और चीन के बीच ‘तकनीकी शीत युद्ध’ ने दुनिया को दो डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्रों में बांटने का खतरा पैदा कर दिया है। यूरोपीय देशों ने ‘तीसरे रास्ते’ की तलाश की, ताकि वे तकनीकी रूप से किसी एक महाशक्ति के गुलाम न बन जाएं।
जलवायु और प्रवासन:
भू-राजनीतिक दृष्टि से, जलवायु परिवर्तन अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने तक सीमित नहीं है। सम्मेलन में ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ और जल-अधिकारों पर होने वाले संभावित युद्धों पर चर्चा हुई। 2026 तक, आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से नए समुद्री व्यापारिक मार्ग खुल गए हैं, जिससे रूस, अमेरिका और चीन के बीच इस क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए एक नई ‘ग्रेट गेम’ शुरू हो गई है।
वैश्विक शक्ति संतुलन 2026: एक तुलनात्मक विश्लेषण

निष्कर्ष:
म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2026 का समापन एक कड़वी हकीकत के साथ हुआ: दुनिया अब कभी भी 1990 के दशक की स्थिरता की ओर नहीं लौटेगी। नई विश्व व्यवस्था प्रतिस्पर्धी है, खंडित है और अत्यधिक जटिल है।
लेकिन इसी जटिलता में एक अवसर भी है। म्यूनिख में हुई चर्चाओं ने यह संकेत दिया कि अब कोई भी एक देश दुनिया को अपनी उंगलियों पर नहीं नचा सकता। ‘नई विश्व व्यवस्था’ अब सहयोग और संघर्ष के बीच एक निरंतर चलने वाला संतुलन (Dynamic Equilibrium) होगी। 2026 का म्यूनिख सम्मेलन इस बात की उद्घोषणा है कि हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ शांति ‘शक्ति के संतुलन’ पर नहीं, बल्कि ‘हितों के तालमेल’ पर टिकी होगी।
म्यूनिख से निकला यह संदेश वैश्विक राजधानियों के लिए एक चेतावनी भी है और एक आमंत्रण भी—कि वे पुरानी सोच को त्यागकर इस नई और चुनौतीपूर्ण दुनिया के साथ तालमेल बिठाएं।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

