अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दो प्रमुख विचारधाराएँ—यथार्थवाद (Realism) और आदर्शवाद (Idealism)—विश्व राजनीति की प्रकृति, राज्य-व्यवहार और शांति-युद्ध की संभावनाओं को समझाने के दो भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। जहाँ यथार्थवाद शक्ति और सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, वहीं आदर्शवाद सहयोग और नैतिकता को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार मानता है।
यथार्थवाद की मुख्य धारणा
यथार्थवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय प्रणाली अराजक है और कोई विश्व सरकार राज्यों को नियंत्रित नहीं करती। इसलिए राज्य अपने राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और शक्ति-संतुलन को सर्वोपरि रखते हैं। मानव स्वभाव को स्वार्थी और संघर्ष-प्रवृत्त माना जाता है। हांस मॉर्गेंथाउ, थ्यूसीडाइड्स और केनेथ वॉल्ट्ज इसके प्रमुख प्रवर्तक हैं।
- शक्ति राजनीति,
- सुरक्षा द्वंद्व,
- आत्म-सहायता प्रणाली (Self-help)
इसके मूल तत्व हैं।
उदाहरण: रूस–यूक्रेन युद्ध, अमेरिका–चीन शक्ति प्रतिस्पर्धा — दोनों यथार्थवादी ढांचे को प्रमाणित करते हैं।
आदर्शवाद की मुख्य धारणा
आदर्शवाद मानव स्वभाव को सहयोगी मानता है और लोकतंत्र, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संस्थानों की शक्ति पर विश्वास करता है। इमैनुअल कांट और वुडरो विल्सन इसके प्रमुख समर्थक हैं।
- सामूहिक सुरक्षा,
- आर्थिक परस्पर निर्भरता,
- मानवाधिकार व नैतिकता
इसकी मुख्य आधारशिलाएँ हैं।
उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र, WTO, यूरोपीय संघ जैसे संस्थान आदर्शवादी विश्वास को मूर्त रूप देते हैं।
दोनों सिद्धांतों के बीच प्रमुख अंतर
- यथार्थवाद संघर्ष को अनिवार्य मानता है; आदर्शवाद सहयोग को संभव और टिकाऊ मानता है।
- यथार्थवाद शक्ति-केंद्रित है; आदर्शवाद नियम-केंद्रित है।
- यथार्थवाद में सैन्य शक्ति प्रमुख; आदर्शवाद में संस्थागत शक्ति और कूटनीति प्रमुख।
समकालीन प्रासंगिकता और आलोचनात्मक विश्लेषण
आज की विश्व राजनीति में न तो शुद्ध यथार्थवाद लागू होता है और न शुद्ध आदर्शवाद। वैश्वीकरण, आर्थिक निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने आदर्शवादी सिद्धांतों को मजबूत किया है। वहीं सुरक्षा संघर्ष, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रवाद यथार्थवाद की निरंतर प्रासंगिकता दिखाते हैं। इसीलिए विद्वान “नीलिबरल संस्थागतवाद” और “रचनावादी यथार्थवाद’’ जैसे मिश्रित दृष्टिकोण की बात करते हैं।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए यथार्थवाद और आदर्शवाद दोनों अनिवार्य हैं। एक ओर यथार्थवाद कठोर शक्ति-संतुलन की वास्तविकता को उजागर करता है, वहीं आदर्शवाद शांति, सहयोग और वैश्विक संस्थागत व्यवस्था की संभावना प्रस्तुत करता है। आधुनिक विश्व में नीति-निर्माण इन्हीं दोनों के संतुलन से संचालित होता है।
for factual information
यथार्थवाद (Realism)
- अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक (anarchic) है—कोई विश्व सरकार नहीं।
- राज्य (States) ही मुख्य अभिनेता हैं।
- मानव स्वभाव स्वार्थी माना जाता है।
- राज्य का प्रथम लक्ष्य—राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व।
- शक्ति (विशेषकर सैन्य शक्ति) ही परिणाम निर्धारित करती है।
आदर्शवाद (Idealism / Liberalism)
- मानव स्वभाव सहयोगी और नैतिक माना जाता है।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और कानून अराजकता को कम कर सकते हैं।
- शांति संभव है—सहयोग, लोकतंत्र, और आर्थिक परस्पर निर्भरता के माध्यम से।
- राज्य के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संगठन, NGO, व्यक्ति भी महत्वपूर्ण हैं।
- अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की समझ
यथार्थवाद
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति शून्य-योग खेल (Zero-sum) है।
- शक्ति-संतुलन (Balance of Power) से स्थिरता आती है।
- सुरक्षा द्वंद्व (Security Dilemma) सामान्य है।
आदर्शवाद
- राजनीति धनात्मक-योग खेल (Positive-sum) हो सकती है – सभी को लाभ।
- सामूहिक सुरक्षा (Collective Security) से शांति संभव।
- नियम-आधारित व्यवस्था (Rule-based order) शांति को बढ़ाती है, जैसे यूरोपीय संघ।
प्रमुख चिंतक
यथार्थवाद
- थ्यूसीडाइड्स
- मैकियावेली
- थोमस हॉब्स
- हांस मॉर्गेंथाउ
- केनेथ वॉल्ट्ज (Neorealism)
आदर्शवाद
- इमैनुअल कांट
- वुडरो विल्सन
- नॉर्मन एंजेल
- रिचर्ड कॉब्डन
- जोसेफ नाई (Neoliberalism)
प्रमुख अवधारणाएँ
यथार्थवाद
- शक्ति-राजनीति
- राष्ट्रीय हित
- सुरक्षा द्वंद्व
- शक्ति-संतुलन
- आत्म-सहायता प्रणाली (Self-help)
आदर्शवाद
- सामूहिक सुरक्षा
- अंतरराष्ट्रीय कानून
- संस्थागत सहयोग (UN, WTO आदि)
- मानवाधिकार व नैतिक सिद्धांत
- आर्थिक आपसी निर्भरता
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