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Colour Revolutions/रंग क्रांतियाँ: गुलाब क्रांति,ऑरेंज क्रांति,ट्यूलिप क्रांति,सीडर क्रांति,केसरिया क्रांति

2000 के दशक की शुरुआत में पूर्वी यूरोप के पूर्व साम्यवादी देशों में शुरू Colour Revolutions

रंग क्रांतियाँ उन जन-आंदोलनों की श्रृंखला को संदर्भित करती हैं जो सबसे पहले 2000 के दशक की शुरुआत में पूर्वी यूरोप के पूर्व साम्यवादी देशों में शुरू हुई थीं।
बाद में यह शब्द मध्य पूर्व और एशिया के लोकप्रिय आंदोलनों के लिए भी उपयोग किया जाने लगा।

  • इन क्रांतियों में आमतौर पर बड़े पैमाने पर सड़कों पर जन-संगठनों और प्रदर्शनों को देखा गया, जिनकी मुख्य माँगें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, शासन परिवर्तन तथा तानाशाही नेताओं को हटाने की रही हैं।
  • प्रदर्शनकारियों द्वारा अक्सर किसी विशिष्ट रंग को प्रतीक के रूप में अपनाया जाता है जैसे यूक्रेन की ऑरेंज क्रांति (Orange Revolution) में नारंगी रंग का उपयोग किया गया।
    हालाँकि, इस शब्द का उपयोग फूलों के नाम पर हुई क्रांतियों के लिए भी किया जाता है, जैसे ट्यूनीशिया की जैस्मिन क्रांति (Jasmine Revolution)

गुलाब क्रांति (Rose Revolution – जॉर्जिया, 2003)

  • 2003 में जॉर्जिया में हुए विवादित संसदीय चुनावों के बाद यह क्रांति शुरू हुई।
    चुनावी धांधली के आरोपों ने व्यापक शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को जन्म दिया।
  • विपक्षी नेता मिखाइल साकाशविली ने राष्ट्रपति एडुआर्ड शेवर्नाद्ज़े के इस्तीफे की मांग करते हुए अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • अंततः शेवर्नाद्ज़े ने इस्तीफा दे दिया और साकाशविली की पार्टी सत्ता में आई।
    इस क्रांति ने लोकतांत्रिक सुधारों, भ्रष्टाचार-विरोध और पश्चिमी देशों से निकट संबंधों पर ज़ोर दिया।

ऑरेंज क्रांति (Orange Revolution – यूक्रेन, 2004–2005)

  • राष्ट्रपति चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली के कारण यह क्रांति हुई।
    पूरे देश में कई हफ्तों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन, हड़तालें और धरने हुए।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने धांधली वाले चुनाव को रद्द कर फिर से मतदान का आदेश दिया, जिसमें विपक्षी नेता विक्टर युशचेंको विजयी हुए।
  • यह क्रांति स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक सुधारों की प्रतीक बनी।

ट्यूलिप क्रांति (Tulip Revolution – किर्गिस्तान, 2005)

  • राष्ट्रपति अस्कार अकायेव के भ्रष्ट और तानाशाही शासन के विरुद्ध यह जनआक्रोश फूटा।
    विपक्षी समूहों द्वारा किए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अकायेव को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
  • यद्यपि इससे तुरंत स्थिर लोकतंत्र स्थापित नहीं हुआ, परन्तु इसने अकायेव की लंबी तानाशाही का अंत कर किर्गिस्तान में लोकतांत्रिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।

सीडर क्रांति (Cedar Revolution – लेबनान, 2005)

  • पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की हत्या के बाद लेबनानी नागरिकों ने सीरियाई सेनाओं की वापसी और राजनीतिक संप्रभुता की बहाली की मांग करते हुए विशाल प्रदर्शन किए।
  • इस आंदोलन को “सीडर क्रांति” कहा गया।
  • परिणामस्वरूप लगभग तीन दशकों बाद सीरियाई सेना को लेबनान से हटना पड़ा, जो लेबनान की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

केसरिया क्रांति (Saffron Revolution – म्यांमार, 2007)

  • मुख्यतः बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में यह क्रांति म्यांमार की सैन्य सरकार की कठोर नीतियों और आर्थिक कुप्रबंधन के खिलाफ हुई।
  • शांतिपूर्ण मार्चों को सेना ने बेरहमी से कुचल दिया, परंतु इस आंदोलन ने म्यांमार के लोकतांत्रिक संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया।
  • यह तानाशाही के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गई।

जैस्मिन क्रांति (Jasmine Revolution – ट्यूनीशिया, 2010–2011)

  • एक सब्जी विक्रेता मोहम्मद बुआज़ीजी ने पुलिस उत्पीड़न और बेरोजगारी के विरोध में आत्मदाह किया, जिससे पूरे देश में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे।
  • इन प्रदर्शनों ने राष्ट्रपति ज़ीन अल आबिदीन बेन अली के 23 वर्ष लंबे शासन का अंत कर दिया।
    यही आंदोलन आगे चलकर अरब स्प्रिंग (Arab Spring) की शुरुआत बना।

स्नो क्रांति (Snow Revolution – आर्मेनिया, 2018)

  • प्रधानमंत्री सर्ज सार्गस्यान द्वारा सत्ता विस्तार के प्रयासों के विरोध में यह क्रांति शुरू हुई।
    निकोल पशिन्यन के नेतृत्व में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने सार्गस्यान को इस्तीफा देने पर मजबूर किया।
    यह आंदोलन भ्रष्टाचार-विरोध, लोकतांत्रिक सुधार और जवाबदेही की जन-आवाज़ बना।

लेदर क्रांति (Leather Revolution – मोल्दोवा, 2003–2009)

  • छात्रों के नेतृत्व में यह आंदोलन चुनावी धांधली और भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ।
    यह आंदोलन यूरोपीय संघ से नज़दीकी संबंधों की जनता की इच्छा को भी दर्शाता था।
  • धीरे-धीरे इसने देश में लोकतांत्रिक चेतना और नागरिक सक्रियता को मज़बूत किया।

अरब स्प्रिंग (Arab Spring – 2010–2011 से आगे)

  • यह लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों की लहर थी जो ट्यूनीशिया से शुरू होकर पूरे अरब जगत में फैल गई।
    लोगों ने लोकतंत्र, मानवाधिकार, आर्थिक अवसर और भ्रष्टाचार व तानाशाही के अंत की मांग की।
  • ट्यूनीशिया जैसे देशों में लोकतांत्रिक संक्रमण सफल हुआ, परंतु लीबिया, सीरिया और यमन जैसे देशों में हिंसक संघर्ष शुरू हो गया।

अरब स्प्रिंग के प्रमुख उदाहरण

  • ट्यूनीशिया (2010–2011) – मोहम्मद बुआज़ीजी के आत्मदाह से शुरू हुए प्रदर्शन से राष्ट्रपति बेन अली को देश छोड़ना पड़ा।
  • मिस्र (2011) – काहिरा के तहरीर चौक पर लाखों लोगों ने राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के इस्तीफे की मांग की; उन्होंने 30 साल बाद सत्ता छोड़ी।
  • लीबिया (2011)मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह गृहयुद्ध में बदल गया; नाटो ने हस्तक्षेप किया और गद्दाफी की हत्या हुई।
  • यमन (2011) – प्रदर्शनों के दबाव में राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह ने 33 वर्षों बाद इस्तीफा दिया।
  • सीरिया (2011–वर्तमान)बशर अलअसद शासन के खिलाफ प्रदर्शन गृहयुद्ध में बदल गए, जो अब भी जारी है।
  • बहरीन (2011) – लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को सऊदी हस्तक्षेप से कुचल दिया गया।

पीपुल पावर क्रांति (People Power Revolution – फिलीपींस, 1986)

  • इसे EDSA क्रांति भी कहा जाता है।
    यह फर्डिनेंड मार्कोस की तानाशाही के खिलाफ शांतिपूर्ण जनआंदोलन था।
    लाखों नागरिकों ने असहयोग और विरोध में हिस्सा लिया, जिसके परिणामस्वरूप मार्कोस को देश छोड़ना पड़ा और कोराज़ोन अक्विनो राष्ट्रपति बनीं।

वेल्वेट क्रांति (Velvet Revolution – चेकोस्लोवाकिया, 1989)

  • छात्रों और बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में साम्यवादी शासन के खिलाफ यह शांतिपूर्ण आंदोलन हुआ।
    वृहद् प्रदर्शनों से एकदलीय शासन समाप्त हुआ, लोकतांत्रिक सुधार हुए और बाद में देश चेक गणराज्य और स्लोवाकिया में विभाजित हो गया।

कार्नेशन क्रांति (Carnation Revolution – पुर्तगाल, 1974)

  • लगभग रक्तहीन सैन्य विद्रोह ने दशकों पुरानी तानाशाही का अंत किया।
    सैनिकों ने अपनी राइफल में कार्नेशन (गुलदाउदी) के फूल लगाए, जो शांतिपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक बना।
  • इस क्रांति ने लोकतंत्र, उपनिवेशवाद के अंत और सामाजिक सुधारों की शुरुआत की।

सिंगिंग क्रांति (Singing Revolution – बाल्टिक देश, 1987–1991)

  • एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया के नागरिकों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और सामूहिक देशभक्ति गीतों के माध्यम से सोवियत शासन का विरोध किया।
    अंततः इन देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की।
  • यह इतिहास की सबसे अनोखी अहिंसक क्रांतियों में से एक मानी जाती है।

अंब्रेला मूवमेंट (Umbrella Movement – हांगकांग, 2014)

  • सर्वजन मताधिकार और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर यह आंदोलन शुरू हुआ।
    प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की आंसू गैस से बचने के लिए छतरियों का प्रयोग किया, जो प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं।
    यद्यपि सरकार ने सुधारों को दबा दिया, फिर भी इस आंदोलन ने हांगकांग की राजनीतिक चेतना को सशक्त किया।

यूरोमैदान क्रांति (Euromaidan Revolution – यूक्रेन, 2013–2014)

  • सरकार द्वारा यूरोपीय संघ के समझौते को त्यागने के निर्णय के खिलाफ यह आंदोलन शुरू हुआ।
    धीरे-धीरे यह लोकतंत्र और भ्रष्टाचार समाप्त करने की मांग में बदल गया।
    हिंसक झड़पों के बाद राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को पद छोड़ना पड़ा।

सूडानी क्रांति (Sudanese Revolution – 2018–2019)

  • राष्ट्रपति ओमर अलबशीर के तीन दशक लंबे शासन के खिलाफ हुए विशाल प्रदर्शनों ने उन्हें सत्ता से हटा दिया।
    एक संक्रमणकालीन सरकार बनी, जिसने सूडान में लोकतंत्र की उम्मीदें जगाईं, हालांकि चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं।

 


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