राजनीति विज्ञान में “राजनीतिक संस्कृति” और “राजनीतिक समाजीकरण” दो अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं, जो किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता, विकास और परिवर्तन को समझने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। इन अवधारणाओं का व्यवस्थित अध्ययन मुख्यतः 20वीं सदी के मध्य में behavioral approach के विकास के साथ प्रारंभ हुआ।
विशेष रूप से गैब्रियल आल्मंड, सिडनी वर्बा, डेविड ईस्टन तथा अन्य विद्वानों ने इन अवधारणाओं को सैद्धांतिक और व्यावहारिक आधार प्रदान किया।
राजनीतिक समाजीकरण क्या है?
- अब यदि “राजनीतिक समाजीकरण” की अवधारणा की बात करें, तो यह उस प्रक्रिया को दर्शाती है जिसके माध्यम से व्यक्ति राजनीतिक मूल्य, विश्वास और व्यवहार सीखता है।
- इस क्षेत्र में हर्बर्ट हाइमन ने अपनी पुस्तक Political Socialization (1959) में यह तर्क दिया कि राजनीतिक व्यवहार की नींव बचपन में ही पड़ जाती है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि परिवार और प्रारंभिक सामाजिक अनुभव व्यक्ति के राजनीतिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित करते हैं।
- डेविड ईस्टन ने अपनी प्रसिद्ध कृति A Systems Analysis of Political Life (1965) में राजनीतिक प्रणाली का एक मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने “input” और “output” की अवधारणा के माध्यम से यह समझाया कि राजनीतिक व्यवस्था कैसे कार्य करती है।
- ईस्टन का महत्वपूर्ण तर्क यह था कि राजनीतिक समाजीकरण नागरिकों में “support” (समर्थन) उत्पन्न करता है, जो किसी भी राजनीतिक प्रणाली की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
- बाद में ईस्टन और डेनिस ने अपनी पुस्तक Children in the Political System (1969) में यह बताया कि बच्चे धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतीकों, अधिकार और संस्थाओं को समझना सीखते हैं, जिससे उनके राजनीतिक दृष्टिकोण विकसित होते हैं।
इसी प्रकार, गैब्रियल आल्मंड और जी. बी. पॉवेल ने अपनी पुस्तक Comparative Politics: A Developmental Approach (1966) में राजनीतिक समाजीकरण को उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जिसके द्वारा राजनीतिक संस्कृति का संरक्षण और परिवर्तन होता है।
- उनका तर्क था कि यह प्रक्रिया न केवल राजनीतिक स्थिरता बनाए रखती है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन को भी संभव बनाती है।
- उन्होंने यह भी बताया कि परिवार, विद्यालय, मीडिया और राजनीतिक दल राजनीतिक समाजीकरण के प्रमुख अभिकर्ता होते हैं।
समकालीन युग में राजनीतिक संस्कृति और समाजीकरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलते हैं। आधुनिकीकरण के संदर्भ में आल्मंड और पॉवेल (1966) का मानना था कि जैसे-जैसे समाज आधुनिक होता है, वैसे-वैसे सहभागी राजनीतिक संस्कृति का विकास होता है।
- इसी प्रकार, वैश्वीकरण के संदर्भ में Berg-Schlosser (1993) ने यह तर्क दिया कि राजनीतिक संस्कृतियाँ एकरूप (homogeneous) नहीं होतीं, बल्कि उनमें विविधता पाई जाती है।
- अरेंड लिजफार्ट ने अपनी पुस्तक Thinking about Democracy (2007) में यह तर्क दिया कि राजनीतिक संस्कृति लोकतंत्र की स्थिरता और प्रभावशीलता को गहराई से प्रभावित करती है।
- वहीं ओफर इचिलोव ने Political Learning and Citizenship Education (2004) में यह बताया कि शिक्षा और जनसंचार माध्यम आधुनिक समाज में राजनीतिक समाजीकरण के अत्यंत प्रभावशाली साधन बन गए हैं।
राजनीतिक संस्थाओं और नीतियों पर राजनीतिक संस्कृति और समाजीकरण का प्रभाव
- राजनीतिक संस्कृति और समाजीकरण का राजनीतिक संस्थाओं और नीतियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जिन समाजों में मजबूत लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति और प्रभावी समाजीकरण प्रक्रियाएँ होती हैं, वहाँ नागरिक राजनीतिक प्रक्रिया में अधिक भाग लेते हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं का समर्थन करते हैं और अपनी सरकार से कुछ अपेक्षाएँ रखते हैं।
- इससे अधिक स्थिर लोकतांत्रिक संस्थाएँ, उच्च स्तर की नागरिक भागीदारी और महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों पर अधिक सहमति विकसित होती है।
- इसके विपरीत, जिन समाजों में राजनीतिक संस्कृति कमजोर या विभाजित होती है और समाजीकरण की प्रक्रियाएँ प्रभावी नहीं होतीं, वहाँ नागरिक राजनीतिक प्रक्रिया में कम भाग लेते हैं, सरकारी संस्थाओं पर कम विश्वास रखते हैं और राजनीतिक मुद्दों पर भिन्न-भिन्न विचार रखते हैं।
- इससे महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों पर सहमति बनाने में कठिनाई, समाज में ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- राजनीतिक संस्थाओं और नीतियों पर राजनीतिक संस्कृति और समाजीकरण के प्रभाव को समझना नीति-निर्माताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन कारकों के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है जो जनमत को आकार देते हैं और राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
- इस प्रभाव को पहचानकर, नीति-निर्माता लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने, नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देने और महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए रणनीतियाँ विकसित कर सकते हैं।
राजनीतिक संस्कृति क्या है?
गैब्रियल आल्मंड और सिडनी वर्बा
- गैब्रियल आल्मंड और सिडनी वर्बा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Civic Culture (1963) में राजनीतिक संस्कृति को नागरिकों के उन दृष्टिकोणों, विश्वासों और भावनाओं के रूप में परिभाषित किया जो वे राजनीतिक व्यवस्था के प्रति रखते हैं।
- उनका मुख्य तर्क यह था कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता केवल संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों की मानसिकता और सहभागिता पर भी निर्भर करती है।
- उन्होंने अपने अध्ययन में पाँच देशों अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी और मेक्सिको का तुलनात्मक विश्लेषण किया और निष्कर्ष निकाला कि एक स्थिर लोकतंत्र के लिए “Civic Culture” अर्थात मिश्रित राजनीतिक संस्कृति आवश्यक है।
लूसियन पाई
- इसी संदर्भ में लूसियन पाई ने अपनी पुस्तक Aspects of Political Development (1966) में राजनीतिक संस्कृति को “राजनीति के प्रति मनोवैज्ञानिक अभिविन्यास” (psychological orientation) बताया।
- उनका तर्क था कि राजनीतिक विकास को समझने के लिए केवल संस्थागत ढाँचे का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना आवश्यक है कि लोग राजनीति को किस प्रकार अनुभव और व्याख्यायित करते हैं।
- इस प्रकार, पाई ने राजनीतिक संस्कृति के मनोवैज्ञानिक आयाम को स्पष्ट किया।
आल्मंड और वर्बा
- आल्मंड और वर्बा (1963) ने राजनीतिक संस्कृति को तीन प्रकारों में विभाजित किया संकीर्ण (Parochial), अधीनस्थ (Subject) और सहभागी (Participant)।
- संकीर्ण संस्कृति में लोग राजनीति से लगभग अनभिज्ञ रहते हैं, अधीनस्थ संस्कृति में वे राजनीतिक व्यवस्था को जानते हैं परंतु उसमें सक्रिय भाग नहीं लेते, जबकि सहभागी संस्कृति में नागरिक सक्रिय रूप से राजनीति में भाग लेते हैं।
- उनका महत्वपूर्ण तर्क यह था कि इन तीनों का संतुलित मिश्रण ही “Civic Culture” बनाता है, जो लोकतंत्र की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
राजनीतिक संस्कृति के तीन स्तर (Almond & Verba, 1963)
| क्रमांक | प्रकार (Type) | विशेषताएँ (Features) | उदाहरण (Example) |
| 1 | Parochial Culture | राजनीति की जानकारी नहीं, जागरूकता का अभाव | जनजातीय / पारंपरिक समाज |
| 2 | Subject Culture | सरकार की जानकारी है, लेकिन भागीदारी नहीं | अधिनायकवादी शासन |
| 3 | Participant Culture | सक्रिय राजनीतिक भागीदारी | लोकतांत्रिक समाज |
राजनीतिक संस्कृति (Political Culture): विद्वान और उनके मत
| क्रमांक | विद्वान (Scholar) | वर्ष | पुस्तक (Book) | मुख्य अवधारणा (Concept) | प्रमुख तर्क (Argument) |
| 1 | Almond & Verba | 1963 | The Civic Culture | Political culture = attitudes towards political system | लोकतंत्र की सफलता के लिए Civic Culture (मिश्रित संस्कृति) आवश्यक है |
| 2 | Lucian Pye | 1966 | Aspects of Political Development | Psychological orientation towards politics | राजनीति को समझने के लिए लोगों की मानसिकता महत्वपूर्ण है |
| 3 | Sidney Verba | 1965 | Political Participation | Participation & political attitudes | नागरिक भागीदारी लोकतंत्र को मजबूत बनाती |
समकालीन राजनीतिक संस्कृति की प्रवृत्तियाँ (Trends)
| क्रमांक | प्रवृत्ति (Trend) | विद्वान (Scholar) | वर्ष | मुख्य तर्क (Argument) |
| 1 | Modernization Theory | Almond & Powell | 1966 | आधुनिकीकरण से सहभागी (Participant) राजनीतिक संस्कृति का विकास होता है |
| 2 | Globalization | Berg-Schlosser | 1993 | राजनीतिक संस्कृतियाँ एकरूप नहीं होतीं, बल्कि विविध (diverse) होती हैं |
| 3 | लोकतंत्रीकरण (Democratization) | Lijphart | 2007 | राजनीतिक संस्कृति लोकतंत्र की स्थिरता और प्रभावशीलता को प्रभावित करती है |
| 4 | Media Revolution | Ichilov | 2004 | शिक्षा और जनसंचार माध्यम political learning को shape करते हैं |
| 5 | परिवर्तनशीलता (Dynamic Nature) | Easton | 1965 | राजनीतिक प्रणाली dynamic है, इसलिए राजनीतिक संस्कृति भी समय के साथ बदलती है |
निष्कर्ष
- राजनीतिक संस्कृति और राजनीतिक समाजीकरण परस्पर जुड़े हुए और एक-दूसरे के पूरक हैं।
- जहाँ राजनीतिक संस्कृति नागरिकों के दृष्टिकोण और व्यवहार को दर्शाती है, वहीं राजनीतिक समाजीकरण उन दृष्टिकोणों के निर्माण की प्रक्रिया को समझाता है।
| क्रमांक | विद्वान (Scholar) | वर्ष | मुख्य विचार (Core Argument) |
| 1 | Almond & Verba | 1963 | लोकतंत्र के लिए Civic Culture आवश्यक है |
| 2 | Easton | 1965 | राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता political socialisation पर निर्भर करती है |
| 3 | Almond & Powell | 1966 | राजनीतिक संस्कृति और समाजीकरण मिलकर राजनीतिक विकास को निर्धारित करते हैं |
| 4 | Hyman | 1959 | बचपन राजनीतिक समाजीकरण का सबसे महत्वपूर्ण चरण है |
आल्मंड और वर्बा (1963), ईस्टन (1965) तथा आल्मंड और पॉवेल (1966) जैसे विद्वानों के कार्य यह स्पष्ट करते हैं कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की सफलता और स्थिरता उसके नागरिकों की राजनीतिक चेतना, सहभागिता और मूल्यों पर निर्भर करती है।
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