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‘राजनीतिक समानता, इसलिए, कभी भी वास्तविक नहीं हो सकती जब तक कि यह आभासी आर्थिक समानता के साथ न हो।‘

– हेरोल्ड जे. लास्की, A Grammar of Politics

 लास्की के बारे में

  • हेरोल्ड जे. लास्की (1893–1950) एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ राजनीतिक सिद्धांतकार और अर्थशास्त्री थे।
  • वे लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में प्रोफेसर थे और ब्रिटिश लेबर पार्टी के चेयरमैन भी रहे।
  • उन्होंने समाज में राज्य की भूमिका को विस्तारित करने और व्यापक आर्थिक समानता सुनिश्चित करने के लिए समाजवादी विचारों का समर्थन किया।

लास्की का कहना था कि राजनीतिक समानता तब तक वास्तविक नहीं हो सकती जब तक वह आर्थिक समानता के साथ न जुड़ी हो। यानी अगर समाज में केवल मतदान का अधिकार हो, परंतु आर्थिक विषमता बनी रहे, तो वह समानता केवल दिखावटी होगी।

राजनीतिक शक्ति क्या है?

  • लास्की के अनुसार, राजनीतिक शक्ति आर्थिक शक्ति से उत्पन्न होती है।
  • आर्थिक संसाधनों का स्वामित्व राजनीतिक भागीदारी और प्रभावशाली उपस्थिति की मजबूत नींव बनाता है।
  • यदि आर्थिक समानता नहीं है, तो राजनीतिक समानता केवल सतही बनकर रह जाती है, क्योंकि जिनके पास अधिक संसाधन हैं, वे राजनीतिक क्षेत्र में अधिक प्रभाव डाल सकते हैं।
  • इसलिए, लास्की का प्रस्ताव इस बात का आह्वान है कि राजनीति और अर्थशास्त्र के बीच के रिश्ते को समझा जाए, और सामाजिक-आर्थिक विषमताओं का सामना करते हुए राजनीतिक समानता की सच्ची प्राप्ति की जाए।
  • यह एक ऐसी सामाजिक संरचना की कल्पना करता है जहां आर्थिक न्याय और राजनीतिक समानता एक-दूसरे से जुड़े और एक-दूसरे को मजबूती देते हैं।
  • लास्की ने समाजवाद और न्यायसंगत समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई, और स्पष्ट किया कि राजनीतिक समानता की वास्तविकता के लिए आर्थिक समानता एक अनिवार्य शर्त है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty)

  • लास्की का पूरा राजनीतिक दर्शन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण और संवर्धन पर केंद्रित था।
    लास्की मानते थे कि व्यक्ति की आज़ादी सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह तर्क दिया कि राज्य की शक्ति का उद्देश्य व्यक्ति की भलाई होना चाहिए, न कि उस पर नियंत्रण करना।
  • उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति को विचार, अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।

राज्य का बहुलवादी दृष्टिकोण (Pluralistic View of the State)

  • लास्की ने एकात्मक राज्य सत्ता (Monistic Sovereignty) का विरोध किया और समाज को कई समूहों का संघ माना।
  • उन्होंने कहा कि समाज में अनेक संगठन (जैसे ट्रेड यूनियन, धार्मिक संस्थाएं आदि) हैं जो व्यक्ति के जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं।
  • इसलिए राज्य को भी एक संगठन मानना चाहिए, न कि सर्वोच्च सत्ता। सभी संगठनों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति मिलनी चाहिए।

संघीय राज्य सिद्धांत (Federal Authority of the State)

  • लास्की ने राज्य की शक्ति को सीमित और विकेंद्रित करने की बात की।
  • उन्होंने कहा कि राज्य की शक्ति सीमित होनी चाहिए और वह अन्य संगठनों के साथ मिलकर काम करे। निर्णय लेने में जनता और समूहों की भागीदारी होनी चाहिए। इससे राज्य की तानाशाही प्रवृत्तियों पर रोक लगेगी।

समाज और राज्य का संबंध (Society vs. State)

  • समाज को राज्य से अधिक प्राथमिकता दी।
  • लास्की के अनुसार, राज्य समाज का एक साधन मात्र है। समाज तय करता है कि राज्य का उद्देश्य और कार्य क्या होने चाहिए।
  • राज्य का कार्य सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करना है, न कि केवल सत्ता चलाना।

अधिनायकवाद का विरोध (Opposition to Dictatorship)

  • उन्होंने सोवियत संघ जैसे तानाशाही शासन का स्पष्ट विरोध किया।
  • वे मानते थे कि स्वतंत्रता की कुंजी विकेंद्रीकरण और जन-सहभागिता में है। राज्य को कभी समाज पर हावी नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज की विविधताओं को जगह देनी चाहिए।

पुस्तके

  1. Studies in the Problem of Sovereignty – 1917
  2. Authority in the Modern State – 1919
  3. The Foundations of Sovereignty and Other Essays – 1921
  4. Karl Marx – 1921
  5. A Grammar of Politics – 1925
  6. Democracy in Crisis – 1933
  7. The State in Theory and Practice – 1935
  8. The Rise of European Liberalism – 1936
  9. Parliamentary Government in England – 1938
  10. The American Presidency – 1940

 


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