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राजनीतिक सिद्धांत: शक्ति, प्राधिकार एवं वैधता

राजनीति विज्ञान के मूल तत्वों में शक्ति, प्राधिकार और वैधता सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। समकालीन राजनीति विज्ञान, जो कि विधिक-संस्थागत अध्ययन से हटकर व्यवहारवादी और उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण की ओर बढ़ा है, इन तीनों के इर्द-गिर्द ही घूमता है। जहाँ शक्ति ‘प्रभाव’ डालने की क्षमता है, वहीं प्राधिकार उस शक्ति का ‘संस्थागत’ रूप है, और वैधता वह ‘सहमति’ है जो शासन को स्थायित्व प्रदान करती है।

1. शक्ति की अवधारणा (The Concept of Power)

शक्ति राजनीति विज्ञान की वह धुरी है जिसके चारों ओर संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था चक्कर लगाती है। कैटलिन ने तो राजनीति विज्ञान को “शक्ति का विज्ञान” तक कह दिया है। साधारण अर्थों में, शक्ति एक व्यक्ति या समूह की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह दूसरों के व्यवहार को अपनी इच्छा के अनुसार परिवर्तित कर सकता है।

शक्ति के विभिन्न आयाम और परिप्रेक्ष्य

शक्ति के स्वरूप को समझने के लिए विद्वानों ने इसे अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा है। हब्स के लिए शक्ति एक साधन है जिससे भविष्य में कोई स्पष्ट लाभ प्राप्त किया जा सके। वहीं, मैक्स वेबर शक्ति को एक ऐसी संभावना के रूप में देखते हैं जिसमें एक कर्ता सामाजिक संबंधों के भीतर अपनी इच्छा को दूसरे की इच्छा के विरुद्ध लागू करने की स्थिति में होता है।

समकालीन विमर्श में शक्ति के तीन प्रमुख आयाम (Three Dimensions of Power)

ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, इनका प्रतिपादन स्टीवन ल्यूक्स ने किया है।

  1. प्रथम आयाम निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है,
  2. द्वितीय आयाम कार्यसूची (Agenda) तय करने की क्षमता से,
  3. तृतीय आयाम वैचारिक नियंत्रण से संबंधित है, जहाँ शक्ति का प्रयोग लोगों की इच्छाओं और धारणाओं को ही बदल देने के लिए किया जाता है ताकि वे अपनी अधीनता को ही अपनी नियति मान लें।

शक्ति के सिद्धांत: विभिन्न दृष्टिकोण

शक्ति के वितरण को लेकर राजनीतिक चिंतकों में मतभेद हैं। अभिजनवादी (Elitist) जैसे पेरेटो, मोस्का और सी. राइट मिल्स का मानना है कि शक्ति समाज के एक छोटे से अल्पसंख्यक समूह के हाथों में केंद्रित होती है। इसके विपरीत, बहुलवादी (Pluralist) जैसे रॉबर्ट डाहल (अपनी पुस्तक ‘Who Governs?’) में तर्क देते हैं कि शक्ति किसी एक केंद्र में नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न समूहों और संस्थाओं में विभाजित होती है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण शक्ति को आर्थिक संरचना (Base) का परिणाम मानता है, जहाँ उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखने वाला वर्ग ही राजनीतिक शक्ति का वास्तविक स्वामी होता है।

2-प्राधिकार: शक्ति का वैधानिक स्वरूप (Authority)

प्राधिकार वह ‘कानूनी’ या ‘नैतिक’ शक्ति है जिसे समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है। जब शक्ति को वैधता (Legitimacy) मिल जाती है, तो वह प्राधिकार बन जाती है। यदि शक्ति केवल बल प्रयोग पर आधारित है, तो प्राधिकार कर्तव्य पालन की भावना पर आधारित है। आर. एस. पीटर्स के अनुसार, प्राधिकार का अर्थ है “आदेश देने का अधिकार और उसका पालन कराने की शक्ति।”

मैक्स वेबर का प्राधिकार का वर्गीकरण

जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने प्राधिकार के तीन आदर्श प्रारूपों (Ideal Types) की व्याख्या की है, जो परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक प्रासंगिक हैं:

(a) परंपरागत प्राधिकार (Traditional Authority): यह प्राधिकार प्राचीन काल से चली आ रही परंपराओं, रीति-रिवाजों और विश्वासों पर आधारित होता है। इसमें आज्ञा का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि “ऐसा हमेशा से होता आया है।” उदाहरण के तौर पर, पितृसत्तात्मक समाज में परिवार के मुखिया की शक्ति या राजतंत्र में राजा की शक्ति इसी श्रेणी में आती है। यहाँ शासक की स्थिति व्यक्तिगत होती है और उसके आदेशों की वैधता का स्रोत इतिहास और मर्यादाएँ होती हैं।

(b) करिश्माई प्राधिकार (Charismatic Authority): जब किसी व्यक्ति के असाधारण व्यक्तित्व, वीरता, जादुई आकर्षण या आध्यात्मिक गुणों के कारण लोग उसके अनुयायी बन जाते हैं, तो इसे करिश्माई प्राधिकार कहा जाता है। इसमें अनुयायी नेता के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते हैं। महात्मा गांधी, नेपोलियन या मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं का प्रभाव इसी श्रेणी में आता है। वेबर का मानना है कि करिश्माई प्राधिकार अस्थिर होता है; नेता की मृत्यु या उसके ‘चमत्कार’ दिखाने में विफल होने पर यह समाप्त हो जाता है। अतः इसे ‘करिश्मा का रूढ़िवादीकरण’ (Routinization of Charisma) की प्रक्रिया के माध्यम से कानूनी या पारंपरिक रूप में बदलना पड़ता है।

(c) विधिक-तर्कसंगत या वैधानिक प्राधिकार (Legal-Rational Authority):आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों की मुख्य विशेषता वैधानिक प्राधिकार है। यहाँ प्राधिकार किसी व्यक्ति में नहीं, बल्कि ‘पद’ (Office) और ‘नियमों’ (Rules) में निहित होता है। लोग आदेश का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि वे उन नियमों को सही मानते हैं जिनके तहत वह आदेश दिया गया है। नौकरशाही (Bureaucracy) इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ शक्ति का प्रयोग संविधान और विधि की सीमाओं के भीतर ही किया जा सकता है।

3- वैधता: शासन का नैतिक आधार (Legitimacy)

वैधता राजनीतिक व्यवस्था का वह गुण है जिसके कारण नागरिक उसे स्वीकार करते हैं और उसके आदेशों का पालन स्वतः स्फूर्त भाव से करते हैं। ‘वैधता’ शब्द लैटिन शब्द ‘Legitimus’ से बना है जिसका अर्थ है ‘विधि सम्मत’। राजनीतिक संदर्भ में इसका अर्थ केवल कानूनी होना नहीं, बल्कि ‘उचित’ होना भी है। एस. एम. लिपसेट ने अपनी पुस्तक ‘Political Man’ में लिखा है कि वैधता वह क्षमता है जिसके द्वारा राजनीतिक व्यवस्था यह विश्वास पैदा करती है कि वर्तमान राजनीतिक संस्थाएँ समाज के लिए सबसे उपयुक्त हैं।

 

वैधता का संकट (Legitimation Crisis)

समकालीन राजनीतिक चिंतन में युर्गेन हैबरमास ने ‘वैधता के संकट’ की अवधारणा दी है। उनका तर्क है कि उत्तर-पूंजीवादी समाजों में जब सरकार आर्थिक अपेक्षाओं और सामाजिक कल्याण के वादों को पूरा करने में विफल रहती है, तो जनता का उस व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है। इसे ही ‘वैधता का संकट’ कहा जाता है। राजनीतिक स्थिरता के लिए केवल शक्ति पर्याप्त नहीं है; यदि व्यवस्था अपनी वैधता खो देती है, तो उसे अंततः पतन का सामना करना पड़ता है।

4. शक्ति, प्राधिकार और वैधता का अंतर्संबंध

इन तीनों अवधारणाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। इनके बीच एक चक्रीय संबंध विद्यमान है। शक्ति वह कच्चा माल है जिसे प्राधिकार के सांचे में ढालकर शासन योग्य बनाया जाता है।

जहाँ शक्ति ‘बल’ (Force) का पर्याय हो सकती है, वहीं प्राधिकार ‘शक्ति + वैधता’ का योग है। बिना वैधता के शक्ति दमनकारी होती है और बिना शक्ति के प्राधिकार प्रभावहीन। उदाहरण के लिए, यदि एक डकैत बंदूक की नोक पर आपसे धन माँगता है, तो वह ‘शक्ति’ का प्रयोग कर रहा है। लेकिन जब एक कर अधिकारी (Tax Officer) आपसे कर माँगता है, तो वह ‘प्राधिकार’ का प्रयोग कर रहा है। यहाँ अंतर केवल वैधता का है। कर अधिकारी के पास समाज और कानून की स्वीकृति है, जिसे हम वैधता कहते हैं।

राजनीतिक व्यवस्था की प्रभावशीलता दो कारकों पर निर्भर करती है: उसकी कार्यकुशलता (Effectiveness) और उसकी वैधता। कार्यकुशलता एक भौतिक पक्ष है (जैसे जीडीपी विकास, सुरक्षा), जबकि वैधता एक मनोवैज्ञानिक पक्ष है। एक स्थिर लोकतंत्र में ये दोनों तत्व परस्पर पूरक के रूप में कार्य करते हैं।

निष्कर्ष

अंततः, राजनीति का मूल उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस शक्ति को प्राधिकार में बदलकर सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करना है। आधुनिक राज्य व्यवस्था में शक्ति का विकेंद्रीकरण, प्राधिकार की विधिक सीमाएँ और निरंतर नवीकृत होती वैधता ही लोकतंत्र की सफलता की गारंटी हैं। जहाँ वेबर का त्रिकोणीय वर्गीकरण हमें प्राधिकार के ऐतिहासिक विकास को समझने में मदद करता है, वहीं ल्यूक्स और हैबरमास जैसे विचारक हमें शक्ति के सूक्ष्म और अदृश्य रूपों के प्रति सचेत करते हैं।

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