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राजनीति का अपराधीकरण और भारतीय परिदृश्य

भारतीय लोकतंत्र की नींव संविधान में निहित उन मूल्यों पर टिकी है जो स्वतंत्रता, समानता, न्याय और उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करते हैं। राजनीति को इन मूल्यों को व्यवहार में उतारने का प्रमुख माध्यम माना जाता है। किंतु समकालीन भारत में राजनीति का अपराधीकरण लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। यह केवल अपराधियों के राजनीति में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रक्रिया को दर्शाता है जिसमें सत्ता, धन और हिंसा का गठजोड़ लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है और जनविश्वास को क्षीण करता है।

राजनीति के अपराधीकरण का तात्पर्य उन व्यक्तियों की राजनीति में भागीदारी से है जिनके विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं, तथा सत्ता में आने के बाद उसी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कानून से बचने और आपराधिक हितों को संरक्षित करने में किया जाता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्टों के अनुसार, हाल के वर्षों में संसद और राज्य विधानसभाओं के लगभग एक-तिहाई सदस्यों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारतीय लोकतंत्र में अपराध अपवाद नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या बनता जा रहा है।

स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक दशकों में भारतीय राजनीति अपेक्षाकृत नैतिक और मूल्य-आधारित थी। किंतु 1967 के बाद गठबंधन राजनीति, चुनावी प्रतिस्पर्धा और सत्ता की अस्थिरता ने राजनीति की प्रकृति को बदल दिया। चुनावी खर्च में अत्यधिक वृद्धि ने धनबल की भूमिका को बढ़ाया, जबकि कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कमजोरी और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति ने अपराधी तत्वों को निर्भीक बना दिया। 1970 और 1980 के दशकों में कई राज्यों में बाहुबलियों का राजनीतिक उदय इस प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ अपराधी नेता “क्षेत्रीय रक्षक” के रूप में उभरे।

भारतीय समाज की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ भी राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देती हैं। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असुरक्षा के कारण मतदाता कई बार ऐसे नेताओं का समर्थन करने को विवश होते हैं जो त्वरित समाधान और व्यक्तिगत संरक्षण का आश्वासन देते हैं। राज्य की कमजोर उपस्थिति वाले क्षेत्रों में अपराधी नेता अनौपचारिक सत्ता केंद्र बन जाते हैं। जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति ने भी ऐसे नेताओं को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान की है। यह स्थिति लोकतंत्र की उस विडंबना को दर्शाती है जहाँ मतदाता “कम बुरे विकल्प” को चुनने के लिए मजबूर हो जाता है।

राजनीतिक दल राजनीति के अपराधीकरण के प्रमुख वाहक बन चुके हैं। चुनाव जीतने की व्यावहारिकता ने नैतिकता को पीछे छोड़ दिया है। दल अक्सर “विनर” छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट देते हैं, भले ही उनके विरुद्ध गंभीर आपराधिक आरोप हों। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राजनीतिक दलों की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव अपराधीकरण को बढ़ावा देता है। साथ ही, राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता की कमी और चुनावी खर्च पर प्रभावी नियंत्रण का अभाव भी इस समस्या को गहरा करता है।

भारत की चुनावी प्रणाली और न्यायिक ढांचा भी अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। पहले-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में अल्पमत प्राप्त उम्मीदवार भी विजयी हो सकता है, जिससे ध्रुवीकरण और बाहुबल की राजनीति को बढ़ावा मिलता है। इसके अतिरिक्त, जब तक किसी व्यक्ति को दोषसिद्ध नहीं ठहराया जाता, तब तक वह चुनाव लड़ सकता है। न्यायिक प्रक्रिया की अत्यधिक धीमी गति के कारण आपराधिक मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसी संदर्भ में 170वीं विधि आयोग रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि गंभीर अपराधों में आरोपित व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने पर विचार किया जाना चाहिए।

न्यायपालिका, सुधार और आगे की राह

भारतीय न्यायपालिका ने राजनीति के अपराधीकरण को लोकतंत्र के लिए खतरा मानते हुए समय-समय पर महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए हैं। Association for Democratic Reforms बनाम भारत संघ (2002) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उम्मीदवारों के लिए अपने आपराधिक, वित्तीय और शैक्षणिक विवरणों की घोषणा अनिवार्य की। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ (2003) में मतदाताओं के “जानने के अधिकार” को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई। लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) के निर्णय में दोषसिद्ध सांसदों और विधायकों की तत्काल अयोग्यता का प्रावधान किया गया, जिसे राजनीति के अपराधीकरण पर एक बड़ा प्रहार माना जाता है।

हाल के वर्षों में Public Interest Foundation बनाम भारत संघ (2019) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के चयन का सार्वजनिक रूप से औचित्य स्पष्ट करें। साथ ही, जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध मामलों के शीघ्र निपटारे हेतु विशेष अदालतों की स्थापना का भी निर्देश दिया गया। ये निर्णय न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाते हैं, किंतु यह भी स्पष्ट करते हैं कि न्यायिक उपायों की अपनी सीमाएँ हैं।

विभिन्न समितियों ने भी इस समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। वोहरा समिति (1993) ने अपराध, राजनीति और नौकरशाही के गठजोड़ को उजागर किया था। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने राजनीति के अपराधीकरण को सुशासन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बताया। विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट (2014) ने गंभीर अपराधों में आरोपित व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की। इन सिफारिशों का आंशिक क्रियान्वयन ही अब तक हो पाया है।

राजनीति का अपराधीकरण शासन की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। जब कानून बनाने वाले स्वयं कानून तोड़ने वाले हों, तब कानून का शासन कमजोर हो जाता है। नीतियाँ जनहित के बजाय निजी और समूह हितों से प्रेरित होने लगती हैं। इससे भ्रष्टाचार, हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात को बढ़ावा मिलता है तथा लोकतंत्र में नागरिकों का विश्वास कम होता है। यह स्थिति लोकतंत्र के भीतर ही उसके क्षरण का कारण बनती है।

इस समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी सुधार अनिवार्य हैं। गंभीर अपराधों में आरोपित व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने हेतु संवैधानिक और कानूनी संशोधन, जनप्रतिनिधियों के मामलों का समयबद्ध निपटारा, चुनावी वित्तपोषण में पारदर्शिता, और राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना आवश्यक है। इसके साथ ही मतदाता जागरूकता, नैतिक शिक्षा और नागरिक समाज की सक्रिय भूमिका लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में निर्णायक सिद्ध हो सकती है।

अंततः राजनीति का अपराधीकरण भारतीय लोकतंत्र के सामने केवल एक कानूनी या प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि एक गहन नैतिक संकट है। इसका समाधान तभी संभव है जब राजनीति को सत्ता और अपराध के साधन के बजाय सेवा, नैतिकता और उत्तरदायित्व का माध्यम बनाया जाए। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, “राजनीति बिना सिद्धांतों के समाज को विनाश की ओर ले जाती है।” भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेता है।


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