भारतीय लोकतंत्र में राज्यपाल का पद संवैधानिक गरिमा और राजनीतिक विवादों के बीच एक नाजुक संतुलन का प्रतीक रहा है। हाल के वर्षों में, केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते टकराव ने इस पद की नियुक्ति प्रक्रिया और राज्यपाल की भूमिका को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। विशेष रूप से, गैर-भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बढ़ते मतभेदों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या राज्यपाल की नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली हमारे संघीय ढांचे की भावना के अनुरूप है?
संवैधानिक प्रावधान:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। अनुच्छेद 155 स्पष्ट करता है कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। व्यावहारिक रूप से, इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार की कैबिनेट जिस नाम की सिफारिश करती है, राष्ट्रपति उस पर अपनी मुहर लगाते हैं। संविधान ने राज्यपाल के लिए केवल दो बुनियादी योग्यताएं निर्धारित की हैं—वह भारत का नागरिक हो और उसने 35 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो।
संविधान सभा में इस पद को लेकर लंबी बहस हुई थी। शुरुआती विचार यह था कि राज्यपाल का चुनाव सीधे जनता द्वारा हो, लेकिन अंततः ‘कनाडा मॉडल’ को अपनाया गया, जहाँ केंद्र को राज्य के प्रमुख की नियुक्ति का अधिकार दिया गया। इसके पीछे मुख्य तर्क यह था कि एक निर्वाचित राज्यपाल और एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के बीच सत्ता का संघर्ष हो सकता है, जो राज्य की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है। लेकिन आज की स्थिति यह है कि ‘नामांकन’ की इसी प्रक्रिया ने राज्यपाल को अक्सर केंद्र के एक ‘एजेंट’ के रूप में चित्रित कर दिया है।
राज्य सरकारों से परामर्श: एक लुप्त होती परंपरा
संविधान में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि राज्यपाल की नियुक्ति के समय केंद्र सरकार को संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करना चाहिए। हालांकि, भारत के शुरुआती दशकों में एक ‘संवैधानिक परंपरा’ विकसित हुई थी, जिसके तहत केंद्र द्वारा मुख्यमंत्री को विश्वास में लिया जाता था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि राज्यपाल राज्य प्रशासन के साथ सामंजस्य बिठाकर काम कर सके।
नेहरू युग से लेकर आज तक, यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर होती गई है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों का आरोप है कि केंद्र अक्सर ऐसे व्यक्तियों को राज्यपाल नियुक्त करता है जो सक्रिय राजनीति से जुड़े होते हैं या जिनका राज्य की सत्ताधारी पार्टी के साथ वैचारिक विरोध होता है। जब परामर्श की प्रक्रिया को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाता है, तो राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच का रिश्ता पहले दिन से ही संदेह और अविश्वास की नींव पर खड़ा होता है।
सरकारिया और पुंछी आयोग: अनसुनी सिफारिशें
- राज्यपाल के पद के दुरुपयोग को रोकने और संघीय ढांचे को मजबूत करने के लिए समय-समय पर कई आयोगों ने अपनी सिफारिशें दी हैं।
- 1983 में गठित ‘सरकारिया आयोग’ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राज्यपाल की नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श करना एक अनिवार्य प्रक्रिया होनी चाहिए। आयोग का मानना था कि राज्यपाल को राज्य की स्थानीय राजनीति से दूर रहना चाहिए और उसे कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसने हाल के वर्षों में सक्रिय राजनीति में हिस्सा न लिया हो।
- इसी तरह, 2007 के ‘पुंछी आयोग’ ने एक कदम आगे बढ़ते हुए सुझाव दिया कि राज्यपाल को हटाने की प्रक्रिया भी राष्ट्रपति के ‘प्रसादपर्यंत’ (Pleasure of the President) नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके लिए भी महाभियोग जैसी कोई ठोस व्यवस्था होनी चाहिए।
- आयोगों ने बार-बार जोर दिया कि राज्यपाल का कार्यकाल पांच साल का निश्चित होना चाहिए ताकि वह केंद्र के राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कार्य कर सके। दुर्भाग्यवश, इन महत्वपूर्ण सिफारिशों को अभी तक किसी भी सरकार ने कानूनी रूप नहीं दिया है।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप और सीमाएं
- सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यपाल के पद की निष्पक्षता को लेकर कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं।
- 1979 के ‘रघुकुल तिलक मामले’ में शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्यपाल का पद केंद्र सरकार के अधीन कोई रोजगार नहीं है, बल्कि यह एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है।
- इसके बाद 2010 के ‘बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ’ मामले में कोर्ट ने व्यवस्था दी कि राज्यपाल को केवल इसलिए नहीं हटाया जा सकता क्योंकि केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया है या राज्यपाल की विचारधारा केंद्र से मेल नहीं खाती।
- हालांकि, नियुक्ति की प्रक्रिया में कोर्ट ने हमेशा कार्यपालिका के विशेषाधिकार को बनाए रखा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं आएगी और एक ‘कॉलेजियम’ जैसी प्रणाली नहीं बनेगी, तब तक राजनीतिक नियुक्तियों का सिलसिला थमता नजर नहीं आता।
टकराव के नए मोर्चे: पश्चिम बंगाल से तमिलनाडु तक
वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच अभूतपूर्व टकराव देखा गया है। बिलों को अनिश्चित काल तक रोके रखना, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति में हस्तक्षेप और सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना करना—ये कुछ ऐसी घटनाएं हैं जिन्होंने राज्यपाल की भूमिका को विवादास्पद बना दिया है।
जब राज्यपाल केंद्र की राजनीति के मोहरे के रूप में कार्य करने लगते हैं, तो इससे न केवल संवैधानिक संकट पैदा होता है, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं से विश्वास भी उठने लगता है। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने तो विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर मांग की है कि राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य की राय को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए।

निष्कर्ष: सुधार की अनिवार्य राह
राज्यपाल का पद भारतीय संघवाद की रीढ़ है। उसे ‘केंद्र के प्रहरी’ के बजाय ‘संविधान के रक्षक’ के रूप में देखा जाना चाहिए।एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया को केवल ‘राजनीतिक पुरस्कार’ न बनाया जाए।
सुधार की दिशा में पहला कदम यह होना चाहिए कि राज्यपाल की नियुक्ति के लिए एक उच्चस्तरीय समिति (जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित मुख्यमंत्री शामिल हों) का गठन किया जाए। दूसरा, सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके तटस्थ और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को ही इस पद पर वरीयता दी जानी चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि भारत का संघीय ढांचा मजबूत रहे, तो हमें ‘सहकारी संघवाद’ के नारों को धरातल पर उतारना होगा, जिसकी शुरुआत राजभवनों की निष्पक्षता और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता से ही संभव है।
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