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राज्यों के नाम में परिवर्तन: केंद्र और राज्य के मध्य सहयोग

हाल ही में केरल सरकार द्वारा राज्य का नाम आधिकारिक रूप से बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा दी गई स्वीकृति ने इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। यह कदम केवल एक भाषाई संशोधन नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मलयालम भाषा की व्याकरणिक शुद्धता की ओर लौटने का एक गंभीर प्रयास है। भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में राज्यों के नाम बदलना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह उस क्षेत्र की जनता की पहचान, इतिहास और औपनिवेशिक छाया से मुक्ति का प्रतीक भी होती है। इस लेख में हम भारत में राज्यों के नाम परिवर्तन की संवैधानिक व्यवस्था, जटिल प्रक्रियाओं और वैश्विक तुलना का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

नाम परिवर्तन का संवैधानिक आधार:

भारतीय संविधान के भाग-1 के अंतर्गत अनुच्छेद 3 संसद को यह असाधारण शक्ति प्रदान करता है कि वह किसी भी राज्य का नाम बदल सके, उसकी सीमाओं में परिवर्तन कर सके या नए राज्यों का गठन कर सके। भारतीय संविधान की एक अनूठी विशेषता यह है कि भारत को ‘विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ’ कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि केंद्र सरकार के पास राज्यों के भूगोल और उनकी पहचान को पुनर्गठित करने की व्यापक शक्ति है। इस अनुच्छेद के पीछे निर्माताओं का तर्क यह था कि भविष्य में प्रशासनिक सुगमता और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के आधार पर मानचित्र में बदलाव की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसके लिए एक लचीली प्रक्रिया अनिवार्य है।

नाम बदलने की वैधानिक प्रक्रिया और केंद्रीय कैबिनेट की भूमिका

  • राज्यों के नाम बदलने की प्रक्रिया एक बहु-चरणीय मार्ग का अनुसरण करती है जिसमें राज्य और केंद्र दोनों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।
  • सबसे पहले संबंधित राज्य की विधानसभा एक संकल्प पारित करती है, जो राज्य की जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। केरल के मामले में विधानसभा ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास किया था।
  • राज्य सरकार द्वारा भेजा गया यह प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास पहुँचता है।
  • गृह मंत्रालय इस पर अंतिम निर्णय लेने से पहले रेल मंत्रालय, डाक विभाग और सर्वे ऑफ इंडिया जैसे विभिन्न विभागों से ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) मांगता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नाम परिवर्तन से किसी भी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड में भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
  • इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी होती है। जब कैबिनेट इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि केंद्र सरकार राज्य की मांग से सहमत है और अब इसे विधायी रूप देने के लिए तैयार है।
  • कैबिनेट की स्वीकृति के पश्चात ही अनुच्छेद 3 के तहत एक विधेयक तैयार किया जाता है जिसे संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश के लिए भेजा जाता है।
  • राष्ट्रपति इस विधेयक को संबंधित राज्य की विधायिका के पास उनके विचार जानने के लिए भेजते हैं और इसके लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित की जाती है।
  • अंततः, संसद के किसी भी सदन में विधेयक पेश किया जाता है और इसे साधारण बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक होता है।
  • राष्ट्रपति की अंतिम सहमति मिलते ही नाम परिवर्तन आधिकारिक रूप से प्रभावी हो जाता है।

संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों की भूमिका का संतुलन

भारत के संघीय ढांचे में राज्यों के नाम परिवर्तन के मामले में केंद्र का पलड़ा भारी रहता है। राज्य की भूमिका मुख्य रूप से एक प्रस्तावक या सलाहकार की होती है। केंद्र सरकार के पास यह शक्ति इसलिए सुरक्षित रखी गई है ताकि देश की अखंडता और प्रशासनिक सुगमता बनी रहे। यदि प्रत्येक राज्य को अपनी सीमाओं या नाम पर पूर्ण संप्रभुता दे दी जाती, तो भविष्य में अलगाववाद या राज्यों के बीच भाषाई संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती थी। हालांकि, एक स्वस्थ लोकतंत्र में केंद्र प्रायः राज्य की भावनाओं का सम्मान करता है, जैसा कि केरलम के मामले में केंद्रीय कैबिनेट की हालिया सहमति से स्पष्ट होता है। यह कदम सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

पूर्ववर्ती उदाहरण: पहचान बदलने का ऐतिहासिक क्रम

स्वतंत्रता के बाद से भारत में राज्यों के नाम बदलने का एक लंबा और सार्थक इतिहास रहा है। 1950 में ‘यूनाइटेड प्रोविंस’ को बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ किया गया, जो हिंदी पट्टी की पहचान को मजबूत करने वाला पहला बड़ा बदलाव था। इसके बाद 1969 में ‘मद्रास राज्य’ का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ किया गया, जो तमिल भाषा और संस्कृति के प्रति गौरव का प्रतीक बना। 1973 में ‘मैसूर’ को ‘कर्नाटक’ और ‘लक्कादीव, मिनीकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह’ को ‘लक्षद्वीप’ का नाम दिया गया। हाल के वर्षों में 2007 में ‘उत्तरांचल’ को ‘उत्तराखंड’ और 2011 में ‘उड़ीसा’ को ‘ओडिशा’ किया जाना इस बात का प्रमाण है कि राज्य अपनी ऐतिहासिक और भाषाई जड़ों को सरकारी दस्तावेजों में भी प्राथमिकता दे रहे हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य: अन्य देशों में संवैधानिक प्रक्रियाएं

विश्व के अन्य संघीय देशों की तुलना में भारत में राज्यों का नाम बदलना अपेक्षाकृत सरल है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में “अविनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” का सिद्धांत लागू होता है। वहां किसी भी राज्य की सहमति के बिना उसकी सीमा या पहचान में परिवर्तन करना लगभग असंभव है, क्योंकि वहां राज्यों की संप्रभुता को अधिक महत्व दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया में प्रक्रिया और भी कठिन है, जहाँ नाम या सीमा परिवर्तन के लिए संबंधित राज्य में जनमत संग्रह (Referendum) कराना अनिवार्य होता है। इसका अर्थ है कि वहां की जनता सीधे मतदान के जरिए तय करती है कि उनका नाम बदलना चाहिए या नहीं। कनाडा में इस तरह के बदलाव के लिए एक जटिल संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होती है जिसमें केंद्र और प्रांतों के बीच उच्च स्तरीय सहमति तंत्र कार्य करता है। इन देशों की तुलना में भारत की प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत और संसद-प्रधान है।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

केरल का ‘केरलम’ बनने का सफर केवल अक्षरों का फेरबदल नहीं है, बल्कि यह उस राज्य की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई अस्मिता का सम्मान है। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा दी गई हालिया स्वीकृति इस बात की पुष्टि करती है कि भारत सरकार क्षेत्रीय पहचानों को स्वीकार करने के प्रति उदार है। यद्यपि इस प्रक्रिया में आर्थिक लागत और प्रशासनिक चुनौतियां आती हैं, जैसे कि करोड़ों दस्तावेजों, बोर्डों और डिजिटल डेटाबेस को अपडेट करना, फिर भी लोकतंत्र में जनभावनाओं का स्थान सर्वोच्च होता है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था ने लचीलेपन और नियंत्रण के बीच एक ऐसा संतुलन बनाया है जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राष्ट्रीय एकता के धागे में पिरोकर रखता है।


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