हर राष्ट्र की यात्रा में एक ऐसा क्षण आता है जब उसकी संस्थाएँ इस बात के लिए खड़ी होती हैं कि राष्ट्र-राज्य के मूलभूत मूल्यों और सिद्धांतों को संरक्षित रखा जाए। यदि ये बुनियादी मूल्य नष्ट हो जाएँ, तो फिर संस्थाएँ भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं, और उनके साथ-साथ राष्ट्र की आत्मा भी क्षीण होती जाती है।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में 16वें राष्ट्रपति संदर्भ (Presidential Reference) का उत्तर देते हुए राज्यपालों की भूमिका और राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर निर्णय दिया।
अनुच्छेद 143 भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे कानूनी या संवैधानिक प्रश्नों पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श (advice or opinion) प्राप्त कर सकते हैं।
यह न्यायिक परामर्श बाध्यकारी (binding) नहीं होता, अर्थात राष्ट्रपति को इसे मानने की अनिवार्यता नहीं है, परंतु व्यवहार में सर्वोच्च न्यायालय की राय का बहुत महत्व होता है।- संविधान के मूल दर्शन में निहित संघीय सिद्धांत धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। भारत के संघीय ढाँचे में यह व्यवस्था की गई थी कि राज्यों के अपने विधानमंडल होंगे जो केंद्र सरकार के निर्देशों पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से शासन करेंगे। संघवाद (Federalism) संविधान की बुनियादी संरचना का एक आवश्यक तत्व है। यदि संघवाद कमजोर होता है, तो केंद्र सरकार का पूर्ण नियंत्रण और राज्यों की स्वायत्तता का क्षय, संविधान के आत्मा पर आघात होगा।
समान भागीदार के रूप में राज्य
- संविधान के तहत, केंद्र और राज्य ‘समान भागीदार’ हैं। भारत का शासन ‘राज्यों का संघ’ है, जहाँ केंद्र सरकार और राज्य सरकारें समान संवैधानिक साझेदार हैं। राज्य केंद्र सरकार के अधीन नहीं हैं; वे केवल उसके सहायक अंग नहीं हैं। प्रत्येक राज्य के अपने विषय (जैसे भूमि, कानून और व्यवस्था) पर संपूर्ण अधिकार हैं।
- यदि राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक महीनों तक राज्यपाल के पास रुके रहें, और बाद में ‘पुनर्विचार’ हेतु वापस भेजे जाएँ, तथा पुनः विधानसभा द्वारा पारित होने पर राष्ट्रपति के पास भेजे जाएँ तो वस्तुतः यह स्थिति ‘निर्वाचित राज्यपाल’ के ऊपर ‘अनिर्वाचित राज्यपाल’ की सर्वोच्चता स्थापित करती है। यह लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
- राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है, जो आमतौर पर सत्ताधारी दल से होते हैं। वे अपनी राजनीतिक वफादारी और केंद्र की नीतियों के अनुसार कार्य करते हैं। यह वास्तविकता हमारे संवैधानिक ढाँचे के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
जनमत की अवहेलना
- भारत की शासन-व्यवस्था में राष्ट्रपति और राज्यपाल, दोनों ही निर्वाचित सरकारों की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। लेकिन जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपनी संवैधानिक सीमाएँ लांघते हैं और निर्वाचित सरकार के निर्णयों को रोकते हैं, तो यह ‘जन-इच्छा’ के साथ अन्याय है।
- विधानमंडल की सीमित अवधि होती है; यदि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग न कर सके, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ह्रास है। संघवाद, तर्कसंगतता और गैर-मनमानी निर्णय का सिद्धांत हमारे संविधान की आत्मा है।
न्यायिक समीक्षा और संतुलन
- ‘न्यायिक समीक्षा’ संविधान की रक्षा का मूल आधार है। कोई भी संस्था चाहे संसद हो, राष्ट्रपति हो, या राज्यपाल, न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है। यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल न्यायिक समीक्षा से बचने की कोशिश करें, तो यह संविधान की आत्मा के विपरीत है।
- न्यायालय ने कहा है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल की ‘विवेकाधीन शक्तियाँ’ असीमित नहीं हैं। उन्हें संविधान की भावना, न्याय और तर्क की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
संघीय ढाँचे का ह्रास
हाल के वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा कई कदम उठाए गए हैं, जिन्होंने संघीय ढाँचे को कमजोर किया है। कुछ उदाहरण:
- राज्यों को मुआवजा न देना: वस्तु एवं सेवा कर (GST) के तहत राज्यों को मिलने वाले मुआवजे में देरी या इनकार, जिससे राज्य वित्तीय संकट में फँसे।
- राजस्व का अनुचित बँटवारा: केंद्र द्वारा संचित करों को राज्यों के साथ साझा करने से इनकार करना।
- वित्त आयोग की सिफारिशों की अवहेलना: केंद्र ने राज्यों को कम हिस्सेदारी दी।
- केंद्र द्वारा ‘एक आकार सब पर लागू’ योजनाएँ थोपना: राज्यों को अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई।
- केंद्रीय कोष का राजनीतिक उपयोग: केंद्र सरकार ने निधियों का उपयोग अपने राजनीतिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए किया, जैसे आंध्र प्रदेश में विशेष वित्तीय पैकेज और गुजरात के चुनाव से पहले बजट में घोषणाएँ।
- केंद्र एजेंसियों का दुरुपयोग: प्रवर्तन निदेशालय (ED), आयकर विभाग, CBI जैसी एजेंसियों का उपयोग विपक्षी राज्यों पर दबाव डालने के लिए।
- केंद्रीय नियंत्रण की प्रवृत्ति: हर निर्णय केंद्र के हाथों में केंद्रित होना, जो संघवाद की भावना के खिलाफ है।
संविधान का संतुलन
- यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो केंद्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता और जनता की प्रतिनिधिक आवाज को कमजोर कर देगी। भारत का संविधान ‘संघीय सहयोग’ (cooperative federalism) पर आधारित है न कि केंद्र की सर्वोच्चता पर।
- संविधान के निर्माताओं ने स्पष्ट कहा था कि संघवाद लोकतंत्र की आत्मा है। अतः इसे कमजोर करना भारत की लोकतांत्रिक संरचना को अस्थिर करने के समान होगा।
भारत की संघीय व्यवस्था का इतिहास
भारत के संविधान निर्माताओं ने एक संघीय शासन प्रणाली को अपनाया। भारतीय संघवाद पारंपरिक संघीय ढाँचों (जैसे अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड, या ऑस्ट्रेलिया) से भिन्न है, क्योंकि इसमें संघीय तथा एकात्मक दोनों तत्वों का समावेश है। यही कारण है कि विद्वानों ने इसे ‘अर्ध-संघीय व्यवस्था’ (Quasi-Federal System) कहा है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था- ‘भारत की संघीय प्रणाली एक ऐसी अनूठी संरचना है जिसमें संघीय और एकात्मक दोनों तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं।’
भारत का संविधान संघीय ढाँचे का प्रावधान करता है, जिसमें शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच किया गया है। किंतु, यह विभाजन पूर्णतः समान नहीं है; संविधान ने केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ दी हैं। यह भारत की विशिष्ट परिस्थितियों का परिणाम है जैसे विभाजन की त्रासदी, राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता, सीमाओं की अस्थिरता, और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ।
संघवाद केवल संवैधानिक ढाँचा नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया भी है। भारतीय संघवाद का स्वरूप समय के साथ राजनीतिक घटनाओं, दल-व्यवस्था, न्यायिक व्याख्याओं, और आर्थिक नीतियों के प्रभाव में विकसित हुआ है। विशेषकर 1967 के बाद, जब क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ, तब संघवाद एक जीवंत राजनीतिक अवधारणा बन गया।
औपनिवेशिक काल से संघीयता की पृष्ठभूमि
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय प्रशासन धीरे-धीरे विकेंद्रीकरण की दिशा में आगे बढ़ा।
- 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम: पहली बार प्रांतीय सरकारों को सीमित विधायी अधिकार दिए गए।
- 1919 का मोंटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार: ‘द्वैध शासन प्रणाली’ (Dyarchy) की शुरुआत हुई, जिससे केंद्र और प्रांतों के बीच शक्तियों का प्रारंभिक विभाजन हुआ।
- 1935 का भारत शासन अधिनियम: यह भारत में संघीय शासन की नींव रखने वाला पहला विधिक दस्तावेज था। इसमें संघीय ढाँचा, द्विसदनीय विधानमंडल, और प्रांतीय स्वायत्तता के प्रावधान किए गए।
संविधान सभा ने इन अनुभवों से प्रेरणा लेकर एक ऐसा संविधान बनाया जो भारतीय संदर्भ में संघवाद को व्यावहारिक बना सके।
संविधान में कहा गया कि ‘भारत अर्थात भारतवर्ष राज्यों का संघ होगा।’ यहाँ ‘संघ’ शब्द का प्रयोग हुआ, ‘संघराज्य’ (Federation) का नहीं। इसका अर्थ यह है कि भारत के राज्य संविधान द्वारा निर्मित इकाइयाँ हैं, न कि स्वतंत्र इकाइयों का संघ। इस प्रकार भारतीय संघवाद की उत्पत्ति नीचे से ऊपर (Bottom-up) नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे (Top-down) हुई है।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट किया था – ‘भारत का संघ न तो राज्यों के बीच समझौते से बना है, और न ही राज्यों को इससे अलग होने का कोई अधिकार है।’ इस प्रकार, भारत का संघ ‘अविनाशी संघ, विनाशी राज्य’ (Indestructible Union of Destructible States) है।
भारतीय संघवाद के उद्देश्यों की रूपरेखा
भारतीय संघीय ढाँचा निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बनाया गया:
- राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा।
- क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान और संरक्षण।
- शासन में सहभागिता और विकेंद्रीकरण।
- आर्थिक एवं सामाजिक समानता की दिशा में प्रयास।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती।
इस ढाँचे ने भारत को एक ऐसा प्रशासनिक रूप दिया जिसमें एकता और विविधता दोनों को स्थान मिला।
संघवाद और भारतीय लोकतंत्र का संबंध
संघवाद केवल शासन की संरचना नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी है। लोकतंत्र तब ही सशक्त होता है जब सत्ता का केंद्रीकरण सीमित हो और निर्णय लेने की प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी बढ़े।
भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर लोकतंत्र को नींव से ऊपर तक फैलाया गया।
इससे संघवाद का रूप केवल केंद्र–राज्य तक सीमित न रहकर त्रिस्तरीय (Three-Tier) हो गया —
- केंद्र,
- राज्य,
- स्थानीय निकाय।
भारतीय संघवाद की विशिष्टता
भारतीय संघवाद को अन्य संघीय प्रणालियों से अलग बनाता है इसका लचीलापन और अनुकूलनशीलता।
- अमेरिका में संघीय व्यवस्था कठोर और स्थिर है; राज्यों को समान अधिकार हैं।
- भारत में संविधान ने केंद्र को अधिक अधिकार दिए हैं, ताकि संकट की स्थिति में त्वरित निर्णय लिए जा सकें।
- परंतु, यही व्यवस्था सहकारी भावना पर आधारित है जिसमें केंद्र और राज्य परस्पर सहयोग से कार्य करते हैं।
इसलिए विद्वान ग्रानविल ऑस्टिन (Granville Austin) ने इसे ‘Cooperative Federalism’ कहा और डी.डी. बसु (D.D. Basu) ने इसे ‘Union with Federal Spirit’ के रूप में परिभाषित किया।
न्यायपालिका की भूमिका: संघीयता की संरक्षक
- भारतीय संघवाद के विकास और संतुलन में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत निर्णायक रही है।
संविधान की प्रस्तावना में ही ‘संघीय गणराज्य’ की भावना निहित है, परंतु संविधान की जटिलता के कारण कई बार केंद्र और राज्यों के बीच टकराव उत्पन्न हुआ। इन विवादों को सुलझाने का कार्य सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने किया। - भारतीय न्यायपालिका ने अपने निर्णयों के माध्यम से संघवाद की सीमाएँ, शक्तियाँ और संतुलन दोनों को स्पष्ट किया है।
- संविधान के अनुच्छेद 13, 32, और 131 न्यायपालिका को यह शक्ति देते हैं कि वह केंद्र या राज्य द्वारा पारित किसी कानून की संवैधानिकता की समीक्षा कर सके।
इससे यह सुनिश्चित होता है कि न तो केंद्र और न ही राज्य, संविधान की सीमाओं से बाहर जा सकते हैं।
निष्कर्ष
- संविधान के रक्षकों के रूप में सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति की भूमिका निष्पक्ष और तटस्थ रहनी चाहिए। यदि वे स्वयं राजनीतिक या पक्षपातपूर्ण रुख अपनाएँ, तो संघवाद की जड़ें हिल जाएँगी।
- इसलिए, यह आवश्यक है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करें और निर्वाचित सरकारों के निर्णयों में बाधा न डालें।
भारत की संघीय संरचना केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, यह लोकतंत्र का नैतिक और संवैधानिक स्तंभ है। - यदि इसे कमजोर किया गया, तो ‘राज्यों का संघ’ अपने वास्तविक अर्थ को खो देगा।
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