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रूस से तेल आयात पर रोक: भारतीय कूटनीति के लिए कितना खतरनाक?

फरवरी 2026 में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा बाजार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की सबसे कठिन परीक्षा हो रही है। हाल ही में अमेरिका के साथ हुए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौते के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारत रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद करने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों और भारत के विदेश मंत्रालय की सधी हुई प्रतिक्रियाओं के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है—यदि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, तो यह भारतीय कूटनीति और अर्थव्यवस्था के लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है? यह लेख उन तमाम पहलुओं का गहराई से विश्लेषण करता है जो भारत-रूस संबंधों, भारत-अमेरिका व्यापार और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के अंतर्संबंधों को परिभाषित कर रहे हैं।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता और रूस का ‘पेंच’

हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा व्यापारिक ढांचा तैयार हुआ है, जिसके तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ को हटाकर इसे 50% से घटाकर 18% कर दिया है। यह भारतीय निर्यातकों, विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स, रत्न-आभूषण और विमानन पुर्जों के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी राहत है। लेकिन इस आर्थिक लाभ के पीछे एक गहरी कूटनीतिक शर्त छिपी हुई दिखती है। व्हाइट हाउस के कार्यकारी आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भारत ने रूसी तेल के आयात को ‘प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष’ रूप से बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है।

हालांकि, भारत सरकार ने अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी पूर्ण बंदी की पुष्टि नहीं की है। विदेश मंत्रालय का आधिकारिक रुख अब भी यही है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और वह अपने स्रोतों का चयन बाजार की स्थितियों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर करेगा। यह स्थिति भारतीय कूटनीति के लिए एक ‘दोधारी तलवार’ की तरह है, जहाँ एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक लाभ है, तो दूसरी तरफ रूस जैसा पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार।

रूसी तेल पर निर्भरता और आर्थिक वास्तविकताएं

2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में रियायती (Discounted) कच्चा तेल खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति के झटके से बचाया था। एक समय ऐसा था जब भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40% तक पहुँच गई थी। हालांकि जनवरी 2026 तक यह घटकर लगभग 22% से 27% के बीच आ गई है, लेकिन यह अभी भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यदि भारत अचानक रूसी तेल का आयात बंद कर देता है, तो इसके आर्थिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। रूसी तेल आमतौर पर ब्रेंट क्रूड की तुलना में 6 से 10 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिलता है। इसे छोड़ना मतलब देश के आयात बिल में अरबों डॉलर की वृद्धि और घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल, जो सीधे तौर पर महंगाई को प्रभावित करेगा। यद्यपि अमेरिका और वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने की बात कही जा रही है, लेकिन माल ढुलाई (Freight) की अधिक लागत और रिफाइनरियों की तकनीकी अनुकूलता एक बड़ी बाधा है। भारतीय रिफाइनरियां, जैसे कि नयरा एनर्जी (Nayara Energy), रूसी कच्चे तेल के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई हैं, और रातों-रात स्रोत बदलना तकनीकी और आर्थिक रूप से जोखिम भरा है।

रूस के साथ ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त’ संबंधों पर संकट

भारत और रूस के संबंध केवल तेल तक सीमित नहीं हैं। यह ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ (Special and Privileged Strategic Partnership) रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में गहराई तक फैली हुई है। रूस आज भी भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है। दिसंबर 2025 में ही प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच हुई वार्षिक शिखर बैठक में द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया था।

ऐसे में, रूस से तेल आयात पर पूर्ण रोक मास्को के लिए एक ‘सिस्टमैटिक शॉक’ की तरह होगा। रूस के लिए भारत उसका सबसे बड़ा वैकल्पिक बाजार रहा है। यदि भारत पीछे हटता है, तो रूस पूरी तरह से चीन पर निर्भर हो जाएगा, जो भारत के रणनीतिक हितों के लिए खतरनाक है। एक कमजोर रूस, जो पूरी तरह चीन के प्रभाव में हो, यूरेशिया क्षेत्र में भारत की स्थिति को कमजोर कर सकता है। रूसी विदेश मंत्रालय ने पहले ही संकेत दिया है कि उन्हें भारत से ऐसी किसी बंदी की आधिकारिक सूचना नहीं मिली है, लेकिन पर्दे के पीछे के तनाव को नकारा नहीं जा सकता।

रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा: अमेरिका बनाम रूस

भारतीय कूटनीति का मूल मंत्र ‘गुटनिरपेक्षता’ से विकसित होकर ‘बहु-पक्षीय संलग्नता’ (Multi-alignment) बन गया है। भारत ने पिछले दो वर्षों में पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीदकर यह साबित किया था कि वह अपनी विदेश नीति के फैसले खुद लेता है। लेकिन अब, जब अमेरिका ने टैरिफ कटौती को तेल आयात से जोड़ दिया है, तो भारत की इस ‘स्वायत्तता’ पर सवाल उठने लगे हैं।

अमेरिका चाहता है कि भारत रूस की युद्ध मशीनरी को मिलने वाले धन के प्रवाह को रोके। वहीं भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक और सुरक्षा संबंधों (विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने के लिए) को मजबूत रखते हुए रूस को पूरी तरह से नाराज न करे। यह संतुलन बनाना भारतीय विदेश नीति के लिए अब तक की सबसे कठिन कसरत है। यदि भारत इस दबाव में पूरी तरह झुकता दिखता है, तो ग्लोबल साउथ (Global South) के एक नेता के रूप में उसकी छवि प्रभावित हो सकती है, जो अपनी संप्रभुता के साथ समझौता नहीं करता।

वैकल्पिक स्रोतों की तलाश और व्यावहारिक चुनौतियां

अमेरिकी योजना के अनुसार, भारत को रूस की जगह अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीदना चाहिए। हालांकि वेनेजुएला के पास भारी कच्चे तेल का बड़ा भंडार है, लेकिन उसकी उत्पादन क्षमता और वहां के राजनीतिक हालात अभी भी अनिश्चित हैं। अमेरिका से तेल मंगाना महंगा पड़ता है। ऐसे में भारत ने धीरे-धीरे इराक और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक मध्य-पूर्वी देशों से अपनी आपूर्ति फिर से बढ़ानी शुरू कर दी है।

लेकिन असली खतरा यह है कि रूसी तेल के बिना वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कमी हो सकती है, जिससे कीमतें आसमान छू सकती हैं। यदि रूसी तेल बाजार से बाहर होता है या उसे बहुत सीमित कर दिया जाता है, तो आपूर्ति और मांग का संतुलन बिगड़ जाएगा, जिसका खामियाजा भारत जैसे बड़े आयातक देश को भुगतना पड़ेगा।

निष्कर्ष: जोखिम और कूटनीतिक मार्ग

रूस से तेल आयात पर पूर्ण रोक भारत के लिए केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील कूटनीतिक जुआ है। यह खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह भारत को एक ऐसी स्थिति में धकेल सकता है जहाँ उसे दो महाशक्तियों के बीच किसी एक को चुनना पड़े—एक ऐसी स्थिति जिससे भारत हमेशा बचता रहा है।

हालांकि, भारत की रणनीति ‘पूर्ण बंदी’ के बजाय ‘क्रमिक विविधीकरण’ (Gradual Diversification) की ओर बढ़ती दिख रही है। भारत शायद रूसी तेल के आयात को शून्य पर न ले जाए, लेकिन उसे इस स्तर तक कम कर सकता है जिसे अमेरिका अपनी जीत बता सके और भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी बनी रहे। अंततः, भारतीय कूटनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कैसे अमेरिकी व्यापारिक लाभों को भी सुरक्षित रखती है और रूस के साथ अपने दशकों पुराने सामरिक संबंधों की नींव को भी ढहने से बचाती है। आने वाले कुछ महीने यह तय करेंगे कि भारत इस ‘ग्लोबल पावर गेम’ में अपनी स्वायत्तता को कितना बचा पाता है।


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