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लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट और लुक वेस्ट तक : भारत की विदेश नीति का विकास

लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट और लुक वेस्ट नीतियाँ

भारत की विदेश नीति समय, परिस्थितियों और वैश्विक शक्ति-संतुलन के अनुसार निरंतर विकसित होती रही है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) भारत की विदेश नीति का आधार रही, किंतु शीतयुद्ध की समाप्ति, वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत को अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना पड़ा। इसी पृष्ठभूमि में 1990 के दशक की शुरुआत में ‘लुक ईस्ट नीति’ (Look East Policy) सामने आई।

आगे चलकर यह नीति ‘एक्ट ईस्ट नीति’ (Act East Policy) में परिवर्तित हुई और समानांतर रूप से भारत ने पश्चिम एशिया तथा उससे आगे के क्षेत्रों के प्रति ‘लुक वेस्ट नीति’ (Look West Policy) को भी विकसित किया। यह लेख भारत की विदेश नीति के इसी परिवर्तनशील सफर का थीम आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भारत की विदेश नीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नेहरू युग और आदर्शवादी कूटनीति

स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति का आधार नैतिक आदर्शवाद, उपनिवेशवाद-विरोध और गुटनिरपेक्षता रहा। नेहरू का मानना था कि नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को महाशक्ति राजनीति से दूर रहकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनानी चाहिए। यह दृष्टिकोण यद्यपि नैतिक रूप से सशक्त था, किंतु आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से सीमित सिद्ध हुआ।

शीतयुद्धोत्तर परिवर्तन

1990 के दशक में शीतयुद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन ने भारत को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार के लिए बाध्य किया। वैश्वीकरण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और आर्थिक कूटनीति के उभार ने भारत की प्राथमिकताओं को बदला।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाया। इसका उद्देश्य था। शीतयुद्ध के दो ध्रुवों (अमेरिका और सोवियत संघ) से समान दूरी बनाए रखना। एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के साथ सहयोग, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति के मूल तत्व थे।

किन्तु 1980 के दशक के अंत तक वैश्विक परिस्थितियाँ बदलने लगीं। सोवियत संघ के विघटन, समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं के संकट और वैश्वीकरण की लहर ने भारत को भी प्रभावित किया। 1991 का आर्थिक संकट भारत के लिए एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। यहीं से भारत ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति अपनाई तथा अपनी विदेश नीति को भी आर्थिक हितों के अनुरूप ढालना शुरू किया।

  1. लुक ईस्ट नीति : अवधारणा और आवश्यकता

‘लुक ईस्ट नीति’ की औपचारिक शुरुआत 1991–92 के दौरान मानी जाती है, जब प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया। इस नीति का मूल उद्देश्य था भारत को पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ना।

लुक ईस्ट नीति के प्रमुख उद्देश्य

लुक ईस्ट नीति के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य सामने आते हैं:

  • भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए नए बाजारों की तलाश
  • ASEAN देशों के साथ व्यापार और निवेश को बढ़ावा
  • एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को मजबूत करना
  • शीतयुद्ध के बाद बदले वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की भूमिका सुनिश्चित करना

ASEAN के साथ संबंध

लुक ईस्ट नीति के तहत भारत ने ASEAN को प्राथमिकता दी। 1992 में भारत ASEAN का सेक्टोरल पार्टनर बना, 1996 में पूर्ण संवाद साझेदार और 2002 में ASEAN शिखर सम्मेलन में भाग लेने लगा। यह भारत की पूर्वी दिशा में कूटनीतिक सक्रियता का महत्वपूर्ण संकेत था।

लुक ईस्ट नीति की सीमाएँ

यद्यपि लुक ईस्ट नीति ने भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, फिर भी इसमें कुछ सीमाएँ स्पष्ट थीं:

  • नीति का अत्यधिक आर्थिक केंद्रित होना
  • सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर अपेक्षाकृत कम ध्यान
  • परियोजनाओं के क्रियान्वयन में धीमी गति
  • पूर्वोत्तर भारत को ASEAN से जोड़ने में व्यावहारिक कठिनाइयाँ

इन सीमाओं के कारण यह महसूस किया गया कि केवल ‘देखना’ पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस ‘कार्रवाई’ की आवश्यकता है।

  1. एक्ट ईस्ट नीति: लुक ईस्ट से आगे

नीति का रूपांतरण

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने ‘लुक ईस्ट नीति’ को औपचारिक रूप से ‘एक्ट ईस्ट नीति’ में परिवर्तित कर दिया। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं था, बल्कि नीति की आत्मा में भी बदलाव था।

एक्ट ईस्ट नीति की प्रमुख विशेषताएँ

एक्ट ईस्ट नीति के अंतर्गत भारत की पूर्वी दिशा की कूटनीति अधिक सक्रिय, व्यापक और रणनीतिक हो गई। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं:

  • आर्थिक सहयोग के साथ-साथ सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी
  • ASEAN के अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत द्वीप देशों पर ध्यान
  • इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करना
  • पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ना

पूर्वोत्तर भारत और एक्ट ईस्ट

एक्ट ईस्ट नीति में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को ‘ब्रिज’ की भूमिका में देखा गया। सड़क, रेल, बंदरगाह और डिजिटल कनेक्टिविटी के माध्यम से पूर्वोत्तर को म्यांमार, थाईलैंड और अन्य ASEAN देशों से जोड़ने का प्रयास किया गया।

भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टी-मोडल परियोजना इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

  1. लुक वेस्ट नीति: पश्चिम की ओर भारत की दृष्टि

जहाँ एक ओर भारत पूर्व की ओर अपनी कूटनीति को सशक्त बना रहा था, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और यूरोप के प्रति भी उसकी रुचि बढ़ रही थी। इसे सामान्यतः ‘लुक वेस्ट नीति’ कहा जाता है।

पश्चिम एशिया का महत्व

पश्चिम एशिया भारत के लिए कई दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर
  • खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी
  • सामरिक और सुरक्षा हित, विशेषकर आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दे

इज़राइल, ईरान और खाड़ी देश

लुक वेस्ट नीति के तहत भारत ने इज़राइल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को गहराई दी, ईरान के साथ ऊर्जा और कनेक्टिविटी (चाबहार बंदरगाह) पर ध्यान दिया तथा खाड़ी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊँचाई दी।

इंडोपैसिफिक और भारत की उभरती भूमिका

  • एक्ट ईस्ट और लुक वेस्ट नीतियाँ मिलकर भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास करती हैं। इंडो-पैसिफिक की अवधारणा भारत के लिए केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है।
  • QUAD (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के माध्यम से भारत ने मुक्त, खुला और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है।

समकालीन चुनौतियाँ और आलोचनात्मक दृष्टि

यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखें तो भारत की एक्ट ईस्ट और लुक वेस्ट नीतियाँ शक्ति-संतुलन (Balance of Power) की रणनीति का हिस्सा हैं, विशेषकर चीन के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में। वहीं उदारवादी (Liberal) विद्वान इसे आर्थिक परस्पर-निर्भरता और संस्थागत सहयोग के रूप में देखते हैं।

व्यावहारिक चुनौतियाँ

  • नीति और क्रियान्वयन के बीच अंतर
  • बुनियादी ढाँचे की धीमी प्रगति
  • क्षेत्रीय राजनीतिक अस्थिरता
  • संसाधनों की सीमाएँ

इन चुनौतियों के बावजूद भारत की विदेश नीति निरंतर अनुकूलन की प्रक्रिया में है।

यद्यपि भारत की ये नीतियाँ महत्वाकांक्षी हैं, फिर भी इनके सामने कई चुनौतियाँ हैं:

  • चीन का बढ़ता प्रभाव
  • क्षेत्रीय अस्थिरता और संघर्ष
  • परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी
  • संसाधनों और संस्थागत क्षमता की सीमाएँ

इन चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी कूटनीतिक सक्रियता के माध्यम से संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है।

भारत की Look East, Act East और Look West नीतियों में अंतर

आधारलुक ईस्ट नीति (Look East Policy)एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy)लुक वेस्ट नीति (Look West Policy)
शुरुआत1991–9220142000 के बाद (स्पष्ट रूप से 2014 के बाद सक्रिय)
आरंभकर्ता / कालपी.वी. नरसिंह राव सरकारनरेंद्र मोदी सरकारविभिन्न सरकारें (मोदी काल में तीव्रता)
भौगोलिक फोकसदक्षिण-पूर्व एशियादक्षिण-पूर्व एशिया + इंडो-पैसिफिकपश्चिम एशिया, मध्य एशिया, यूरोप
मुख्य देश/क्षेत्रASEAN देशASEAN, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कोरियाखाड़ी देश, ईरान, इज़राइल
नीति का स्वरूपनिष्क्रिय/पर्यवेक्षणात्मकसक्रिय और क्रियात्मकरणनीतिक और हित-आधारित
मुख्य उद्देश्यआर्थिक सहयोग और व्यापारआर्थिक + रणनीतिक + सुरक्षा सहयोगऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी हित, रक्षा
आर्थिक आयामप्रमुख फोकसमहत्वपूर्ण लेकिन अकेला नहींऊर्जा और निवेश पर केंद्रित
रणनीतिक/सुरक्षा पहलूसीमितअत्यंत मजबूतक्षेत्रीय सुरक्षा पर बल
कनेक्टिविटी पर जोरकमबहुत अधिक (सड़क, बंदरगाह)बंदरगाह, ऊर्जा मार्ग
पूर्वोत्तर भारत की भूमिकासीमित“Gateway to ASEAN”प्रत्यक्ष भूमिका नहीं
प्रमुख परियोजनाएँASEAN संवादIMT हाईवे, कलादान प्रोजेक्टचाबहार पोर्ट, I2U2
चीन के संदर्भ मेंअप्रत्यक्षसंतुलन बनाने का प्रयाससामरिक संतुलन
कूटनीतिक दृष्टिकोणआर्थिक-केंद्रितबहु-आयामीयथार्थवादी (Realist)
नीति का सार“देखो और जुड़ो”“देखो + कार्रवाई करो”“रणनीतिक हित साधो”

निष्कर्ष

लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट और लुक वेस्ट तक का भारत का सफर उसकी विदेश नीति के परिपक्व होने का प्रमाण है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय और बहु-आयामी विदेश नीति अपनाने वाला देश बन चुका है। आर्थिक विकास, सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक नेतृत्व—इन सभी लक्ष्यों को साधने के लिए भारत की ये नीतियाँ भविष्य में और भी अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध होंगी।

इस प्रकार, भारत की विदेश नीति का यह विकासशील ढांचा न केवल उसकी राष्ट्रीय आवश्यकताओं को प्रतिबिंबित करता है, बल्कि उसे एक जिम्मेदार और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी अग्रसर करता है।


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