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लॉर्ड एक्टन: स्वतंत्रता एवम समानता पर विचार

प्रस्तावना

मानव इतिहास का सबसे बड़ा प्रश्न यही रहा है मनुष्य को कितनी स्वतंत्रता मिले और राज्य की शक्ति कितनी हो।
लॉर्ड एक्टन (Lord Acton, 1834–1902) उन महान चिंतकों में थे जिन्होंने स्वतंत्रता को इतिहास और राजनीति का केंद्र माना।
उन्होंने 1877 में History of Freedom शीर्षक से व्याख्यान दिया और कहा “स्वतंत्रता, धर्म के बाद, अच्छे कार्यों की प्रेरणा और अपराधों का बहाना रही है। एथेंस से लेकर आधुनिक युग तक यही विचार मानव इतिहास की धुरी है।”
उनके अनुसार, राज्य बदलते रहते हैं, संविधान कमजोर हो जाते हैं, संसदें असफल हो सकती हैं, लेकिन स्वतंत्रता का विचार कभी मरता नहीं। यही विचार इतिहास की आत्मा है।

स्वतंत्रता का सही अर्थ

लॉर्ड एक्टन स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक अधिकार नहीं मानते थे। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था

अंतरात्मा की स्वतंत्रता – हर व्यक्ति को अपने विवेक और विश्वास के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।
अल्पसंख्यकों की सुरक्षा – बहुमत का शासन भी तभी उचित है जब वह कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करे।
धर्म और स्वतंत्रता का संबंध – धार्मिक विश्वास व्यक्ति को नैतिक शक्ति देता है, और स्वतंत्रता उस विश्वास की रक्षा करती है।

यहूदियों से मिली प्रेरणा

स्वतंत्रता का पहला ऐतिहासिक उदाहरण यहूदियों की शासन प्रणाली में मिलता है।

उनका शासन कबीलों और परिवारों का संघ (federation) था।
राजशाही स्थापित करने में भी जनता ने विरोध किया।
पैगंबरों ने हमेशा कहा कि सभी लोग कानून के सामने समान हैं और ईश्वर से ऊपर कोई सत्ता नहीं है।

इससे तीन बातें स्पष्ट हुईं:

संविधान परंपरा से धीरे-धीरे बनता है, अचानक थोपे नहीं जाते।
राजनीतिक सत्ता की जाँच ऊँचे नैतिक नियम से होनी चाहिए।
कोई भी शासक ईश्वर से बड़ा नहीं हो सकता।

एथेंस (यूनान) की भूमिका

यहूदियों के बाद स्वतंत्रता को नया जीवन एथेंस ने दिया।

सोलोन का सुधार

सोलोन ने पहली बार यह विचार रखा कि जनता को अपने शासक चुनने का अधिकार होना चाहिए।
इससे बल के स्थान पर सहमति से शासन का विचार आया।

पेरिक्लीज का लोकतंत्र

पेरिक्लीज ने लोकतंत्र को और मजबूत किया।
हर नागरिक को राजनीति में भाग लेना उसका अधिकार और कर्तव्य बना।
शासन बहस, तर्क और वक्तृत्व (rhetoric) पर आधारित हुआ।

एथेंस की कमजोरी

लेकिन एथेंस की सबसे बड़ी कमी यह रही कि वहाँ अल्पसंख्यकों और असहमति रखने वालों की रक्षा का कोई प्रावधान नहीं था।

बहुमत ने युद्धों में गलत निर्णय लिए।
अमीर वर्ग को लूटा।
और अंततः सुकरात को मौत की सज़ा दी।

शिक्षा: लोकतंत्र यदि केवल बहुमत की इच्छा पर आधारित हो तो वह भी उतना ही खतरनाक है जितना किसी राजा का अत्याचार। लोकतंत्र को भी नियंत्रण और नैतिक सीमाओं की आवश्यकता है।

रोम का अनुभव

रोम का इतिहास भी यूनान जैसा रहा।

पहले गणराज्य (Republic) था, जहाँ अभिजात्य और लोकतंत्र में संघर्ष होता रहा।
अंततः जूलियस सीज़र ने सेना और जनता के सहारे गणराज्य को साम्राज्य (Empire) में बदल दिया।

यूनान और रोम की सीमाएँ

लॉर्ड एक्टन के अनुसार, यूनान और रोम ने स्वतंत्रता को पूरी तरह नहीं समझा।

उनके यहाँ राज्य और धर्म अलग नहीं थे।
नागरिक राज्य के अधीन दास समान थे।
उनका दर्शन (philosophy) गहरा था, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था स्वतंत्रता से रहित थी।

लॉर्ड एक्टन का संदेश

लॉर्ड एक्टन का निष्कर्ष स्पष्ट था:

स्वतंत्रता मानव इतिहास का सबसे पुराना और स्थायी मूल्य है।
स्वतंत्रता और धर्म का गहरा संबंध है।
बहुमत की तानाशाही भी उतनी ही बुरी है जितनी किसी राजा की तानाशाही।
सच्ची स्वतंत्रता वही है जिसमें व्यक्ति अपनी अंतरात्मा और विवेक के अनुसार जीवन जी सके।
लोकतंत्र तभी सफल है जब वह अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों की रक्षा करे।

समानता (Equality) का महत्व

एक्टन समानता को भी उतना ही आवश्यक मानते थे। उनका विचार था कि अगर स्वतंत्रता हो लेकिन समानता न हो, तो शक्तिशाली वर्ग कमजोर वर्ग का शोषण करने लगेगा।
समानता का अर्थ है कि हर व्यक्ति को समाज और राज्य में समान अवसर मिले।
इसका तात्पर्य केवल कानूनी समानता (Legal Equality) से नहीं है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक समानता से भी है।

उदाहरण:

अगर शिक्षा का अधिकार केवल अमीर लोगों को मिले और गरीबों को न मिले, तो यह असमानता होगी। ऐसी स्थिति में भले ही लोगों को बोलने की स्वतंत्रता दी गई हो, लेकिन कमजोर वर्ग अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर पाएगा।

स्वतंत्रता और समानता के बीच संबंध

एक्टन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने इन दोनों मूल्यों को परस्पर विरोधी न मानकर परस्पर पूरक (Complementary) माना।
अगर केवल स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जाए, तो अमीर और ताकतवर वर्ग अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों पर हावी होने में करेगा। इससे समानता नष्ट होगी।
अगर केवल समानता को प्राथमिकता दी जाए, तो राज्य लोगों की स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण करने लगेगा। इससे स्वतंत्रता नष्ट होगी।
इसलिए लोकतंत्र में इन दोनों के बीच संतुलन अनिवार्य है।

लोकतंत्र और संतुलन की आवश्यकता

लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्रता और समानता दोनों ही बुनियादी मूल्य हैं। एक्टन का मानना था कि लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब

1. व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो।
2. समाज में हर किसी को समान अवसर मिले।
3. कोई भी वर्ग अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके दूसरों को दबा न सके।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता और समानता का सामंजस्य ही लोकतंत्र को स्थिर और जीवंत बनाता है।

निष्कर्ष

इतिहास में कई बार राज्य बदले, साम्राज्य टूटे और समाज भटका। लेकिन स्वतंत्रता का विचार कभी समाप्त नहीं हुआ।
लॉर्ड एक्टन हमें यह शिक्षा देते हैं कि –
सत्ता पर हमेशा नैतिक और धार्मिक सीमाएँ होनी चाहिए।
स्वतंत्रता केवल शासन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का परम उद्देश्य है।
लोकतंत्र तभी सही है जब वह बहुमत और अल्पसंख्यक दोनों की रक्षा करे।
आज भी जब हम लोकतंत्र और मानवाधिकार की बात करते हैं, तो लॉर्ड एक्टन के विचार हमें मार्गदर्शन देते हैं।


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