लोकतंत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका एक दोधारी तलवार की तरह है, जो शासन व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने की अपार संभावनाएं तो रखती है, लेकिन साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौतियां भी पेश करती है। हाल ही में भारत द्वारा आयोजित ‘AI इम्पैक्ट समिट 2026’ जैसे वैश्विक मंचों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि AI अब केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि हमारे आर्थिक, सामाजिक और विशेष रूप से राजनीतिक तंत्र का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
वैश्विक स्तर पर शासन प्रणालियों में AI का प्रयोग
- विश्व के विभिन्न देशों ने अपनी शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए AI का रचनात्मक उपयोग शुरू कर दिया है।
- एस्टोनिया इस क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी है, जिसने ‘Bürokratt’ (#KrattAI) नामक एक राष्ट्रीय वर्चुअल असिस्टेंट विकसित किया है, जो नागरिकों को एक ही इंटरफ़ेस के माध्यम से सभी सरकारी सेवाओं तक पहुँच प्रदान करता है। वहाँ छोटे मुकदमों के निपटारे के लिए ‘AI जजों’ का प्रयोग भी किया गया है।
- भारत में ‘भाषिणी’ (Bhashini) प्रोजेक्ट के माध्यम से रीयल-टाइम अनुवाद सेवा दी जा रही है, जिससे किसान अपनी क्षेत्रीय भाषा में सरकारी सेवाओं का लाभ ले पा रहे हैं। साथ ही, भारतीय उच्चतम न्यायालय ‘SUVAS’ टूल के जरिए कानूनी दस्तावेजों का अनुवाद कर न्याय को सुलभ बना रहा है।

- ताइवान ‘Polis’ एल्गोरिदम का उपयोग करके जनमत के बीच आम सहमति वाले बिंदुओं को खोजने में AI की मदद ले रहा है।
- जर्मनी के बर्लिन शहर ने अपने कर्मचारियों के लिए ‘BärGPT’ नामक सुरक्षित AI असिस्टेंट लॉन्च किया है।
लोकतंत्र के कामकाज में AI का सकारात्मक योगदान
लोकतंत्र की कार्यप्रणाली में AI कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकता है:
- पहुँच और समावेशिता: रीयल-टाइम अनुवाद और ट्रांसक्रिप्शन के माध्यम से राजनीतिक बहसों और सरकारी दस्तावेजों को दिव्यांगों और विभिन्न भाषा बोलने वाले नागरिकों के लिए सुलभ बनाकर समावेशी सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया जा सकता है।
- अनुमानित सेवा वितरण: डेटा विश्लेषण के आधार पर स्थानीय सरकारें स्वास्थ्य संकट या बुनियादी ढांचे की विफलता का पहले से अनुमान लगाकर संसाधनों का न्यायसंगत आवंटन कर सकती हैं।
- व्यक्तिगत सरकारी सेवाएँ: AI नागरिकों को उन सरकारी योजनाओं और सब्सिडी को खोजने में मदद करता है जिनके वे हकदार हैं, जो जटिल कागजी कार्रवाई के कारण अक्सर छूट जाती हैं।
- डेटा-संचालित नीति निर्माण: सार्वजनिक स्वास्थ्य, यातायात और आर्थिक गतिविधियों के विशाल डेटा का विश्लेषण कर नीति निर्माता अधिक सटीक और साक्ष्य-आधारित समाधान तैयार कर सकते हैं, जिससे शासन ‘प्रतिक्रियाशील’ के बजाय ‘सक्रिय’ (proactive) बनता है।
- सार्वजनिक सेवाओं में सुधार: AI-संचालित चैटबॉट्स 24/7 सहायता प्रदान कर नागरिकों और राज्य के बीच के संवाद को बेहतर बनाते हैं।
- सरकारी निगरानी: नागरिक समाज और पत्रकार AI का उपयोग करके सरकारी खर्च, विधायी परिवर्तनों और सार्वजनिक रिकॉर्ड की निगरानी कर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को रोक सकते हैं।
- चुनावी प्रक्रिया में उपयोग: AI चुनावी बुनियादी ढांचे को साइबर हमलों से सुरक्षित करने, मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाने, मतदाताओं को उम्मीदवारों की जानकारी देने और चुनावी खर्च में पारदर्शिता लाने (मार्केट रेट से मिलान कर) में सहायक सिद्ध होता है।

लोकतांत्रिक प्रणालियों के समक्ष चुनौतियाँ और जोखिम
AI की प्रगति के साथ इसके कुछ गंभीर खतरे भी उभरे हैं:
- डीपफेक और कृत्रिम अनुनय: जेनेरेटिव AI के माध्यम से बनाए गए हाइपर-रियलिस्टिक ऑडियो और वीडियो (जैसे स्लोवाकिया 2023 और भारत 2024 के चुनावों में देखे गए) मतदान से ठीक पहले जनता को भ्रमित कर सकते हैं।
- माइक्रो-टारगेटेड हेरफेर: मतदाता डेटा और सोशल मीडिया गतिविधियों का विश्लेषण कर AI लोगों के डर या पसंद के आधार पर अत्यधिक व्यक्तिगत विज्ञापन दिखाता है, जो उनके चुनावी विकल्पों को प्रभावित कर सकते हैं।
- एल्गोरिथम पक्षपात: AI मॉडल अक्सर पुराने डेटा से सीखते हैं जिसमें नस्ल, लिंग या सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रह हो सकते हैं, जिससे अदालतों या सार्वजनिक सेवाओं में भेदभाव बढ़ सकता है।
- नागरिक समाज का क्षरण: अच्छी तरह से वित्त पोषित AI मशीनों की गति का मुकाबला पारंपरिक एनजीओ या समुदाय नहीं कर सकते, जिससे एक ‘तकनीकी हथियारों की दौड़’ शुरू होने का खतरा है।
- डिजिटल विभाजन: इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की कमी वाले समुदाय AI के लाभों से वंचित रह सकते हैं, जबकि निगरानी जैसे इसके जोखिमों का सबसे अधिक शिकार भी वही होते हैं।
- जवाबदेही का अभाव: AI द्वारा लिए गए निर्णयों के लिए जिम्मेदारी तय करना कठिन हो जाता है—कि क्या वह प्रोग्रामर की गलती है, नेता की या स्वयं AI की?
- व्यापक निगरानी: फेसियल रिकग्निशन और सोशल मीडिया डेटा के माध्यम से सरकारें नागरिकों की गतिविधियों पर अभूतपूर्व नजर रख सकती हैं, जो बोलने और इकट्ठा होने की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
भविष्य की राह और रणनीतियाँ
इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक बहुपक्षीय दृष्टिकोण आवश्यक है। सरकारों को व्यापक और मौलिक अधिकारों पर आधारित ‘स्मार्ट’ नियामक कानून बनाने चाहिए और विदेशी तकनीकी दिग्गजों पर निर्भरता कम करने के लिए ‘संप्रभु AI बुनियादी ढांचा’ (Sovereign AI Infrastructure) विकसित करना चाहिए। तकनीकी कंपनियों को ‘रेस्पोंसिबल AI बाई डिज़ाइन’ को अपनाना चाहिए, अपने मॉडल्स को पारदर्शी बनाना चाहिए और डीपफेक का मुकाबला करने के लिए ‘कंटेंट प्रोवेनेंस’ (सामग्री के मूल स्रोत का प्रमाण) जैसे तकनीकी मानक लागू करने चाहिए।
नागरिक समाज और शिक्षाविदों को स्वतंत्र ऑडिट के माध्यम से इन प्रणालियों की निष्पक्षता की जांच करनी चाहिए और जनता को जागरूक करना चाहिए। अंततः, नागरिकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। समाज को ‘AI साक्षरता’ को एक बुनियादी कौशल के रूप में अपनाना होगा ताकि नागरिक असली और नकली सूचना के बीच अंतर कर सकें। लोकतंत्र में AI का एकीकरण सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, जहाँ पारदर्शिता, जवाबदेही और समावेशिता इसके मूल आधार हों, ताकि तकनीक का दुरुपयोग न हो और एक स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण बना रहे।
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