लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत (Democratic Peace Theory) एक ऐसा विचार है जो सरल भाषा में कहे तो बताता है कि लोकतांत्रिक देश, यानी वे देश जहां जनता वोट देकर नेता चुनती है, कानून सबके लिए बराबर है और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, वे आपस में बहुत कम युद्ध लड़ते हैं। । यह सिद्धांत कहता है कि लोकतंत्रों की संस्कृति बातचीत, समझौते और शांतिपूर्ण हल पर आधारित होती है, इसलिए वे एक-दूसरे से भिड़ने से बचते हैं। UPSC जैसी परीक्षाओं के छात्रों के लिए यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों (IR) का एक महत्वपूर्ण टॉपिक है, क्योंकि यह बताता है कि क्यों दुनिया में शांति लोकतंत्र से जुड़ी हुई लगती है। ऐतिहासिक तथ्य भी इसे समर्थन देते हैं—1945 के बाद कोई दो पूर्ण विकसित लोकतंत्रों के बीच बड़ा युद्ध नहीं हुआ है। । लेकिन यह सिद्धांत परफेक्ट नहीं है; इसकी आलोचनाएं भी हैं, जिन्हें हम आगे देखेंगे।
सिद्धांत की जड़ें और मुख्य विचारक
इस सिद्धांत की नींव 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने रखी। उनकी मशहूर किताब Perpetual Peace: A Philosophical Sketch (1795), जिसे हिंदी में “शाश्वत शांति: एक दार्शनिक स्केच” कहा जाता है, में कांट ने तीन मुख्य “निश्चित अनुच्छेद” दिए जो शांति ला सकते हैं। । पहला अनुच्छेद कहता है: “हर राज्य का नागरिक संविधान गणतांत्रिक (रिपब्लिकन) होना चाहिए।” कांट का तर्क था कि लोकतंत्र में नेता अकेले युद्ध का फैसला नहीं ले सकते—जनता को सार्वजनिक बहस और मंजूरी देनी पड़ती है। जनता युद्ध के डर, खर्च और मौतों से बचना चाहती है, इसलिए युद्ध दुर्लभ हो जाता है। कांट ने लिखा: “यदि नागरिकों को खुद युद्ध का निर्णय लेना पड़े, तो वे शायद ही कभी इसकी अनुमति दें, क्योंकि वे ही इसके सबसे बड़े पीड़ित होते हैं।”
कांट के विचारों को 20वीं सदी में माइकल डोयल ने आधुनिक रूप दिया। 1983 में उनकी किताब Kant, Liberal Legacies and Foreign Affairs (भाग 1 और 2) में डोयल ने “लिबरल सिपरेट पीस” (Liberal Separate Peace) का कॉन्सेप्ट पेश किया। उन्होंने कहा कि उदारवादी लोकतंत्र (liberal democracies) गैर-लोकतंत्रों से तो लड़ सकते हैं, लेकिन आपस में शांति रखते हैं। डोयल ने कांट को उद्धृत करते हुए लिखा: “इमैनुएल कांट लोकतांत्रिक शांति के लिए सबसे अच्छा मार्गदर्शन देते हैं।” । एक और महत्वपूर्ण विचारक ब्रूस रूसेट हैं, जिनकी 1999 की किताब The Kantian Peace में उन्होंने कांट के तीन तत्वों को विस्तार दिया: लोकतंत्र, आर्थिक परस्पर निर्भरता (जैसे व्यापार) और अंतरराष्ट्रीय संगठन (जैसे UN) मिलकर शांति लाते हैं। । इन विचारकों ने सिद्धांत को मजबूत आधार दिया, जो आज IR थ्योरी में केंद्रीय है।
कारण क्यों लोकतंत्र आपस में शांति रखते हैं?
सिद्धांत दो मुख्य कारणों पर टिका है: संरचनात्मक (structural) और मानदंडात्मक (normative)। संरचनात्मक कारण सरकारी सिस्टम से आते हैं। लोकतंत्रों में चेक एंड बैलेंस होते हैं—संसद, कोर्ट, मीडिया और विपक्ष नेता को रोकते हैं। युद्ध घोषित करने के लिए जनता की मंजूरी, बजट और चुनावी जोखिम जरूरी होता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में कांग्रेस को युद्ध की मंजूरी देनी पड़ती है। दूसरा, मानदंडात्मक कारण संस्कृति से जुड़ा है। लोकतंत्र नागरिकों को बातचीत, समझौते और कानून का पालन सिखाते हैं, जो विदेश नीति में भी दिखता है। एक लोकतंत्र दूसरे को “हमारी तरह” मानता है, इसलिए नरसंहार या आक्रमण कम होते हैं। ।
तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि 1816 से 2007 तक केवल 0.6% युद्ध लोकतंत्रों के बीच हुए, जबकि गैर-लोकतंत्रों के बीच 28%। । 1885-1992 तक कोई बड़ा युद्ध दो लोकतंत्रों के बीच नहीं लड़ा गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद NATO देशों (ज्यादातर लोकतंत्र) में कोई युद्ध नहीं हुआ। आर्थिक परस्पर निर्भरता भी जोड़ती है—EU जैसे लोकतंत्र व्यापार से जुड़े हैं, जो युद्ध को महंगा बनाता है। रूसेट के अनुसार, लोकतंत्रों में गृहयुद्ध, आतंकवाद और नरसंहार भी कम होते हैं, क्योंकि संस्थाएं मजबूत होती हैं। । UPSC नोट्स के लिए याद रखें: यह “dyadic” है, यानी दो लोकतंत्रों के बीच शांति, न कि “monadic” (सभी लोकतंत्र शांतिप्रिय)। ।
तथ्य और ऐतिहासिक उदाहरण
कई तथ्य सिद्धांत को मजबूत बनाते हैं। कोडे और वन डोव (Correlates of War प्रोजेक्ट) के डेटा से 1815-2001 तक केवल स्पेनिश-अमेरिकी युद्ध (1898) जैसे अपवाद मिले, लेकिन वे “पूर्ण लोकतंत्र” नहीं थे। । कोल्ड वॉर में अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतंत्र सहयोगी बने रहे। भारत और अमेरिका जैसे लोकतंत्रों के बीच कभी युद्ध नहीं हुआ। आंकड़े दिखाते हैं कि लोकतंत्र GDP प्रति व्यक्ति अधिक ($10,000+) वाले अमीर देशों में शांति ज्यादा रखते हैं। । रूसेट का “कांतियन ट्रायंगल” कहता है: लोकतंत्र + व्यापार + संगठन = शांति। उदाहरण: EU में जर्मनी-फ्रांस ने दो विश्व युद्धों के बाद शांति चुनी। ये तथ्य परीक्षा में उदाहरण के रूप में काम आते हैं।
आलोचनाएँ और कमजोरियाँ
सिद्धांत पर कई सवाल उठते हैं। पहली आलोचना: यह selective है। लोकतंत्र गैर-लोकतंत्रों से बहुत लड़ते हैं, जैसे अमेरिका-इराक या रूस-यूक्रेन (यूक्रेन लोकतंत्र बन रहा था)। । दूसरी, कांट की व्याख्या गलत—कांट पूरी दुनिया के लिए शाश्वत शांति चाहते थे, न कि सिर्फ लोकतंत्रों के बीच। डोयल ने इसे तोड़ा-मरोड़ा। । तीसरी, चयनात्मक पूर्वाग्रह (selection bias): शांति लोकतंत्र से पहले आती है, जैसे अमीर देश लोकतंत्र बनते हैं। पूंजीवाद या शक्ति संतुलन असली कारण हो सकते हैं। ।
उपनिवेशवादी पूर्वाग्रह भी है—सिद्धांत पश्चिमी लोकतंत्रों (US, Europe) को प्रमोट करता है, जबकि भारत जैसे गैर-पश्चिमी लोकतंत्रों को नजरअंदाज करता है। । लोकतंत्र की परिभाषा अस्पष्ट है—क्या तुर्की या पाकिस्तान लोकतंत्र हैं? छोटे झगड़े जैसे कोसोवो (1999) में NATO लोकतंत्र शामिल थे। । आलोचक जैसे जॉन मियरशाइमर (रियलिस्ट) कहते हैं कि शक्ति राजनीति ज्यादा मायने रखती है। फिर भी, सिद्धांत बहस को जीवंत रखता है।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.