भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का पद न केवल गरिमा का प्रतीक है, बल्कि यह सदन की निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं का मुख्य संरक्षक भी है। वर्तमान में, फरवरी 2026 के बजट सत्र के दौरान, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भारतीय राजनीति और संवैधानिक विमर्श के केंद्र में है। यह घटनाक्रम न केवल एक राजनीतिक चुनौती है, बल्कि यह हमारे संवैधानिक प्रावधानों और संसदीय परंपराओं की गहराई को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करता है।
वर्तमान घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ
10 फरवरी 2026 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ‘INDIA’ गठबंधन के अन्य प्रमुख दलों ने लोकसभा महासचिव को अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने का औपचारिक नोटिस सौंपा। भारतीय संसदीय इतिहास में इस तरह के प्रस्ताव का आना एक गंभीर संकेत माना जाता है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सदन के संचालन में निष्पक्षता की कमी रही है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के समय को लेकर भेदभाव किया गया है। विशेषकर, पूर्व सेना प्रमुख के संस्मरणों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर स्थगन प्रस्तावों को अस्वीकार करना इस विवाद का तात्कालिक कारण बना। लोकतांत्रिक शुचिता का परिचय देते हुए, ओम बिरला ने स्पष्ट किया कि जब तक इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, वे सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं करेंगे, जिससे यह मुद्दा और भी गंभीर हो गया है।
अध्यक्ष को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था: अनुच्छेद 94 और 96
- भारतीय संविधान में लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया को बहुत ही संतुलित रखा गया है ताकि उन पर कोई अनावश्यक दबाव न बनाया जा सके।
- संविधान का अनुच्छेद 94(c) यह प्रावधान करता है कि लोकसभा अध्यक्ष को सदन के ‘तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत’ (Effective Majority) द्वारा पारित संकल्प से हटाया जा सकता है।
- इसका अर्थ यह है कि सदन की कुल सदस्यता में से रिक्त पदों को हटाने के बाद जो प्रभावी संख्या बचती है, उसके 50% से अधिक मत इस प्रस्ताव के पक्ष में होने चाहिए। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि केवल एक छोटा समूह या साधारण बहुमत अध्यक्ष को पद से न हटा सके।
- इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 96 के तहत यह अनिवार्य है कि ऐसा कोई भी संकल्प पेश करने से कम से कम 14 दिन पूर्व लिखित सूचना दी जानी चाहिए।
- यह अवधि अध्यक्ष को अपना पक्ष तैयार करने और सदन को इस विषय पर आत्ममंथन करने का पर्याप्त समय देती है। जब यह प्रस्ताव विचाराधीन होता है, तो अध्यक्ष सदन में उपस्थित रह सकते हैं और चर्चा में भाग ले सकते हैं।
- उन्हें मतदान का भी अधिकार होता है, लेकिन वे केवल प्रथम बार में अपना मत (First Instance Vote) दे सकते हैं। वे सामान्य स्थिति की तरह ‘निर्णायक मत’ (Casting Vote) नहीं दे सकते, क्योंकि वे उस समय पीठासीन अधिकारी की भूमिका में नहीं होते।

हटाने की संसदीय प्रक्रिया का चरणबद्ध विश्लेषण
- संविधान के साथ-साथ ‘लोकसभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियम’ इस प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप देते हैं। 14 दिन की नोटिस अवधि पूरी होने के बाद, संबंधित सदस्य सदन में संकल्प पेश करने की अनुमति मांगता है।
- नियम के अनुसार, यदि कम से कम 50 सदस्य इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़े होते हैं, तभी इसे स्वीकार किया जाता है और चर्चा के लिए तिथि निर्धारित की जाती है।
- वर्तमान मामले में, तकनीकी त्रुटियों के सुधार के बाद चर्चा की तिथि 9 मार्च 2026 तय की गई है। चर्चा के दौरान विपक्षी दल अपने आरोपों को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, जबकि सत्ता पक्ष अध्यक्ष के बचाव में तर्क देता है।
- यदि मतदान के बाद प्रभावी बहुमत प्राप्त हो जाता है, तो अध्यक्ष को तत्काल अपना पद छोड़ना होता है।
ऐतिहासिक उदाहरण और संसदीय परंपराएँ
- भारत के विधायी इतिहास में अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को इस प्रक्रिया द्वारा हटाया नहीं जा सका है।
- सबसे पहला प्रयास 1954 में प्रथम अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के विरुद्ध किया गया था, जिसे भारी बहुमत से अस्वीकार कर दिया गया।
- इसके बाद 1966 में हुकम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के विरुद्ध भी ऐसे प्रस्ताव लाए गए।
- ये ऐतिहासिक उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाना केवल एक व्यक्ति को हटाने की कोशिश नहीं होती, बल्कि यह सदन के भीतर असंतोष को व्यक्त करने का एक शक्तिशाली संसदीय हथियार भी है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत, ब्रिटेन और अमेरिका
अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया के मामले में विभिन्न लोकतंत्रों में अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए गए हैं। ब्रिटेन (UK) में, ‘एक बार अध्यक्ष, तो हमेशा के लिए अध्यक्ष’ की परंपरा है। वहाँ अध्यक्ष चुने जाने के बाद व्यक्ति अपनी राजनीतिक पार्टी से औपचारिक रूप से इस्तीफा दे देता है। ब्रिटेन में अध्यक्ष को हटाना अत्यंत दुर्लभ है और यह केवल घोर कदाचार की स्थिति में ही होता है। वहाँ की प्रक्रिया भारत की तुलना में अधिक परंपरा-आधारित और कम राजनीतिक है।
इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ का स्पीकर स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक पद है। अमेरिका में स्पीकर को ‘मोशन टू वेकेट द चेयर’ (Motion to Vacate the Chair) के माध्यम से हटाया जा सकता है। अमेरिकी प्रक्रिया भारतीय प्रक्रिया से इस मायने में भिन्न है कि वहाँ साधारण बहुमत से भी अध्यक्ष को हटाया जा सकता है, जो पद को भारत की तुलना में अधिक अस्थिर बनाता है। भारत ने बीच का मार्ग अपनाया है—जहाँ अध्यक्ष दल का सदस्य बना रहता है (औपचारिक रूप से इस्तीफा अनिवार्य नहीं है), लेकिन उसे हटाने के लिए ‘प्रभावी बहुमत’ और 14 दिन के नोटिस की सुरक्षा प्रदान की गई है।
न्यायिक दृष्टिकोण और संवैधानिक निहितार्थ
न्यायपालिका ने भी समय-समय पर अध्यक्ष की शक्तियों और उनकी जवाबदेही को स्पष्ट किया है।
- ‘किहोटो होलोहन’ (1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि यद्यपि अध्यक्ष के पास व्यापक शक्तियाँ हैं, लेकिन उनके निर्णय (विशेषकर दल-बदल कानून के तहत) न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं हैं।
- ‘नबाम रेबिया’ (2016) मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि अध्यक्ष को हटाने का नोटिस लंबित है, तो वे दल-बदल विरोधी कानून के तहत विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय नहीं ले सकते। यह निर्णय वर्तमान विवाद के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह अध्यक्ष की शक्तियों पर अंकुश लगाने का कार्य करता है जब वे स्वयं अविश्वास के दायरे में हों।
निष्कर्ष
लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध वर्तमान प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता और इसकी चुनौतियों दोनों को उजागर करता है। भले ही सत्ता पक्ष के पास बहुमत हो और इस प्रस्ताव के गिरने की पूरी संभावना हो, लेकिन यह प्रक्रिया सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद की कमी को दर्शाती है। अध्यक्ष का पद केवल सत्ता पक्ष के हितों का रक्षक नहीं, बल्कि अल्पमत (विपक्ष) की आवाज का संरक्षक भी है। 9 मार्च 2026 को होने वाली चर्चा भारतीय संसदीय गरिमा को पुनर्स्थापित करने या उसे एक नए विवाद में धकेलने का निर्णायक बिंदु होगी। अंततः, एक स्वस्थ लोकतंत्र में अध्यक्ष की निष्पक्षता केवल नियम पुस्तिकाओं से नहीं, बल्कि सदन के भीतर उनके आचरण और सभी दलों के विश्वास से सुदृढ़ होती है।
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