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वन अधिकार अधिनियम को लेकर आदिवासी विरोध प्रदर्शन

महाराष्ट्र में आदिवासी विरोध प्रदर्शन

हाल ही में महाराष्ट्र में आदिवासी किसानों ने Forest Rights Act, 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन, भूमि पट्टों, सिंचाई, रोजगार और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर लंबी पदयात्राएँ कीं।

महाराष्ट्र में आदिवासी किसान

  • महाराष्ट्र में आदिवासी विरोध प्रदर्शन वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में लगातार विफलताओं को उजागर करते हैं, जिसके कारण अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व असुरक्षित और आजीविका अनिश्चित बनी हुई है।
  • भूमि अभिलेखों की खंडित व्यवस्था, वन अधिकार दावों की उच्च अस्वीकृति दर, तथा ग्राम सभाओं के हाशियाकरण जैसी संरचनात्मक समस्याएँ सहभागी वन शासन को कमजोर करती हैं।
  • कृषि संकट, अपर्याप्त सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का सीमित दायरा, तथा रोजगार और शिक्षा में कमियाँ आदिवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
  • यह आंदोलन संरक्षण उद्देश्यों और सामुदायिक भागीदारी व संवैधानिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने वाले अधिकार-आधारित, आजीविका-केन्द्रित शासन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

उनकी मांगें क्या हैं?

  • आदिवासियों की प्रमुख मांगें भूमि अधिकार, रोजगार, सिंचाई और शिक्षा से संबंधित हैं। उनकी मांग है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के अनुसार, जिस वन भूमि पर वे पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं, उसे उनके नाम पर किया जाए।
  • अन्य मांगों में सिंचाई आवश्यकताओं के लिए छोटे बांधों और नदी-जोड़ परियोजनाओं का निर्माण शामिल है।
  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पीईएसए), 1996 के तहत लंबित भर्तियों को पूरा करने की भी मांग की है, जिससे शिक्षित आदिवासी युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।

चिंताएं क्या हैं?

सभी आंदोलनों के केंद्र में सबसे बड़ी मांग वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उचित कार्यान्वयन रही है। आदिवासियों का दावा है कि उनके व्यक्तिगत अधिकारों को नकारा जा रहा है; उन्हें उनकी वास्तविक खेती की ज़मीन का बहुत छोटा हिस्सा ही आवंटित किया जाता है, जिससे वे सरकारी योजनाओं के लिए अपात्र हो जाते हैं।

वनवासियों की समस्याएँ

  1. औपनिवेशिक काल से पूर्व
  • औपनिवेशिक शासन से पहले स्थानीय समुदायों के अपने क्षेत्र या व्यापक भूभाग के वनों पर पारंपरिक अधिकार थे। राजा या मुखिया भले ही शिकार का अधिकार रखते हों, लेकिन स्थानीय लोगों को वन उपज और संसाधनों का उपयोग करने की स्वतंत्रता थी।
  1. औपनिवेशिक काल

ब्रिटिश शासन ने Indian Forest Act, 1878 लागू किया, जो ‘एमिनेंट डोमेन’ (संपत्ति पर राज्य का सर्वोच्च स्वामित्व) की अवधारणा पर आधारित था।

इम्पीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना लकड़ी और राजस्व अधिकतम करने के लिए की गई। स्थानीय समुदायों को अतिक्रमणकारी माना गया।

औपनिवेशिक वन नीति के अन्याय:

  • झूम (स्थानांतरण) खेती पर प्रतिबंध
  • भूमि सर्वेक्षण और बंदोबस्त अधूरा और राज्य के पक्ष में
  • ‘फॉरेस्ट विलेज’ की स्थापना-आदिवासियों से बाध्य श्रम
  • वन उपज पर सीमित और शुल्क आधारित अधिकार
  • आजीविका को ‘विशेषाधिकार’ माना गया, जिसे कभी भी वापस लिया जा सकता था
  • समुदायों को वन प्रबंधन का अधिकार नहीं दिया गया
  1. स्वतंत्रता के बाद

स्वतंत्रता के बाद भी स्थिति में बहुत परिवर्तन नहीं हुआ।

  • रियासतों और जमींदारी क्षेत्रों को संघ में मिलाते समय वहाँ के वनों को राज्य संपत्ति घोषित कर दिया गया।
  • पीढ़ियों से रहने वाले लोग ‘अतिक्रमणकारी’ कहलाए।
  • ‘Grow More Food’ जैसे अभियानों के तहत वन भूमि पट्टे पर दी गई, परंतु नियमन नहीं हुआ।
  • बांधों से विस्थापित लोगों को वैकल्पिक भूमि नहीं मिली।

Wildlife (Protection) Act, 1972 और Forest (Conservation) Act, 1980 भी राज्य के सर्वोच्च स्वामित्व की अवधारणा पर आधारित थे।

कई समुदायों को अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान बनाने के लिए जबरन विस्थापित किया गया।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 क्या है?

Forest Rights Act, 2006 का उद्देश्य वन क्षेत्रों में पीढ़ियों से रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देना है।

प्रमुख प्रावधान

  1. मान्यता: वनवासियों के भूमि और संसाधन अधिकारों को वैधता
  2. पात्रता: 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम 3 पीढ़ियों (75 वर्ष) से निवास
  3. विकेंद्रीकरण: ग्राम सभा को अधिकारों की पहचान की शक्ति
  4. संरक्षण और आजीविका का संतुलन

अधिनियम के अंतर्गत चार प्रकार के अधिकार

  • शीर्षक अधिकार (Title Rights): अधिकतम 4 हेक्टेयर तक खेती की भूमि का स्वामित्व
  • उपयोग अधिकार (Use Rights): लघु वन उपज, चराई आदि
  • राहत व विकास अधिकार: अवैध बेदखली पर पुनर्वास
  • वन प्रबंधन अधिकार: सामुदायिक वन संसाधनों का संरक्षण व प्रबंधन

क्रियान्वयन में समस्याएँ

  1. व्यक्तिगत बनाम सामुदायिक अधिकार: अधिनियम को ‘अतिक्रमण नियमितीकरण’ तक सीमित करना
  2. IFR की कमजोर मान्यता: 45% से अधिक दावे खारिज करना
  3. डिजिटल प्रक्रियाओं की बाधाएँ: कम कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में कठिनाई
  4. CFR की धीमी प्रगति: वन विभाग का प्रतिरोध करना
  5. फॉरेस्ट विलेज मुद्दा अनसुलझा रह जाना
  6. ग्राम सभाओं की उपेक्षा, जबकि उन्हें वैधानिक अधिकार प्राप्त हैं

वन अधिकार बनाम संरक्षण: 2023 के संशोधनों का आदिवासी अधिकारों पर असर

  • सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) और हाल ही में संशोधित वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (FCA, 2023) के बीच उत्पन्न टकराव की समीक्षा कर रहा है।
  • 2006 का FRA कानून आदिवासी और वनवासी समुदायों को उनकी जमीन, जंगल और संसाधनों पर अधिकार प्रदान करता है और ग्राम सभा को जंगल प्रबंधन में निर्णय लेने का अधिकार देता है। इसके विपरीत, 2023 में संशोधित FCA केंद्रीकृत दृष्टिकोण अपनाता है और वन भूमि पर सरकारी नियंत्रण को बढ़ाता है।
  • उत्तर-पूर्वी भारत में इसका असर और अधिक गंभीर है, जहां कई जंगलों को आधिकारिक मान्यता नहीं दी गई थी, लेकिन वे स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए जीवनदायिनी हैं। नए कानून ने इस तरह के सामुदायिक जंगलों की सुरक्षा को कमजोर कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट और आदिवासी अधिकार

  • फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट के बेदखली आदेश ने पूरे देश में आदिवासी विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया। करीब एक करोड़ वनवासी और आदिवासी लोग अपनी जमीन और घरों से उजाड़े जाने की संभावना में थे। इसके जवाब में नागरिक समाज संगठनों और वकीलों ने हस्तक्षेप किया, जिसमें ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपल्स (AIUFWP) और सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) प्रमुख थे।
  • अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और राज्य सरकारों को वन अधिकार दावों की समीक्षा और पारदर्शिता की रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अदालत यह तय करेगी कि क्या आदिवासी समुदायों को उनके कानूनी अधिकार सही तरीके से मिले हैं या नहीं।

समाधान हेतु आवश्यक कदम

  • ग्राम सभा का सशक्तिकरण करना चाहिए
  • समावेशी निर्णय-निर्माण करना चाहिए
  • जवाबदेही तंत्र की स्थापना करनी चाहिए
  • विकास और संरक्षण का समन्वित नियोजन का निर्माण करना चाहिए
  • अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन को मजबूत करना
  • भूमि अधिकारों के साथ सिंचाई, MSP और अवसंरचना समर्थन करना चाहिए
  • कृषि, जल प्रबंधन और शिक्षा के साथ समेकित योजना का विकास करना चाहिए

निष्कर्ष

  • महाराष्ट्र में आदिवासी आंदोलन भूमि शासन, कल्याणकारी योजनाओं और अधिकार मान्यता की संरचनात्मक विफलताओं को उजागर करता है।
  • वन अधिकार अधिनियम का कमजोर क्रियान्वयन, आजीविका असुरक्षा और प्रशासनिक बाधाएँ आदिवासी संकट को बनाए रखती हैं।
  • समाधान के लिए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण, भूमि अभिलेख सुधार, संरक्षण-सह-भागीदारी संतुलन और स्थानीय स्वशासन की मजबूती आवश्यक है।

 


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