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वर्ष 2025 की वैश्विक राजनीति की प्रमुख घटनाएं एवं विश्लेषण

भाग-1

वर्ष 2025 वैश्विक राजनीति के लिए एक निर्णायक वर्ष साबित हुआ, जिसने पुरानी और नई, दोनों तरह की भू-राजनीतिक चुनौतियों से दुनिया को अवगत कराया। इस वर्ष प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं, चुनावी बदलावों, सुरक्षा संकटों और आर्थिक ध्रुवीकरण ने वैश्विक एजेंडे को पुन: आकार दिया। इन तीव्र परिवर्तनों के बीच, भारतीय विदेश नीति को अत्यंत रणनीतिक, सक्रिय और बहु-आयामी प्रतिक्रिया देनी पड़ी। भारत ने जहां एक ओर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को केंद्र में रखा, वहीं दूसरी ओर ‘ग्लोबल साउथ’ के नेतृत्वकर्ता के रूप में बहुपक्षीय मंचों पर अपनी उपस्थिति को मजबूत किया और वैश्विक स्थिरता के लिए एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य किया।

1. अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक बदलाव और शक्ति संतुलन में अस्थिरता:

वर्ष 2025 की शुरुआत बड़े शक्ति केंद्रों में हुए महत्त्वपूर्ण राजनीतिक बदलावों से हुई, जिसने वैश्विक शक्ति संतुलन को अस्थिर कर दिया।

1.1. अमेरिका में सत्ता परिवर्तन और ‘ट्रंप 2.0’: 

डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2025 की शुरुआत में अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। यह बदलाव अमेरिकी विदेश नीति में एक मौलिक बदलाव का संकेत था, जिसका प्रभाव तत्काल बहुपक्षीय मंचों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर पड़ा। ट्रंप प्रशासन का आगमन ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति की वापसी का प्रतीक था, जिससे नाटो (NATO), विश्व व्यापार संगठन (WTO) और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छा गए।

घटना का विश्लेषण: ट्रंप 2.0 प्रशासन ने तुरंत कई अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों की समीक्षा शुरू की, जिससे वैश्विक व्यापार नियमों पर दबाव बढ़ा। उन्होंने सुरक्षा गठबंधनों के साझेदारों पर रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए और अधिक दबाव डाला। इस नीति ने यूरोपीय संघ (EU) और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के पारंपरिक सहयोगियों के बीच रणनीतिक स्वायत्तता की मांग को मजबूत किया। अमेरिका द्वारा बहुपक्षीय संस्थानों से और अधिक दूरी बनाने की प्रवृत्ति ने विश्व व्यवस्था में ध्रुवीकरण और एकांगीवाद (Unilateralism) की प्रवृत्ति को मजबूत किया, जिससे वैश्विक समस्याओं, विशेषकर जलवायु परिवर्तन और महामारी की तैयारी, से निपटने की सामूहिक क्षमता कमजोर हुई।

भारतीय विदेश नीति पर असर: भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों में एक सतर्क संतुलन और रणनीतिक लचीलापन अपनाना पड़ा। एक ओर, भारत ने अमेरिका के साथ रक्षा और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी सहयोग (जैसे इंडिया कॉम्पैक्ट) को जारी रखते हुए द्विपक्षीय संबंधों को प्राथमिकता दी। वहीं, दूसरी ओर, भारत को व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों पर अमेरिका के साथ नए सिरे से बातचीत करनी पड़ी, क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने भारत को अपनी व्यापारिक नीतियों पर रियायतें देने के लिए दबाव डाला। भारत ने QUAD (क्वाड) और I2U2 (आई2यू2) जैसे अनौपचारिक समूहों में अपनी भागीदारी को मजबूत किया, ताकि अमेरिकी नीतियों में अनिश्चितता के बावजूद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।

1.2. यूरोप में दक्षिणपंथी लहर और आंतरिक विखंडन: 

वर्ष 2025 के दौरान, प्रमुख यूरोपीय देशों में हुए चुनावों में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दलों का उदय देखा गया। इन दलों ने आव्रजन पर सख्त नियंत्रण, यूरोपीय संघ के केंद्रीयकरण का विरोध और घरेलू आर्थिक संरक्षणवाद की वकालत की। इस आंतरिक ध्रुवीकरण ने यूरोपीय संघ (EU) को अपनी विदेश नीति और यूक्रेन युद्ध पर अपनी एकजुटता बनाए रखने के लिए संघर्ष करने पर मजबूर किया।

घटना का विश्लेषण: यूरोप में राष्ट्रवादी भावना के बढ़ने से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और व्यापार समझौतों पर प्रभाव पड़ा। यूरोपीय संघ अपनी आंतरिक समस्याओं (जैसे सीमा नियंत्रण और सदस्य देशों के बीच आर्थिक असमानता) में अधिक उलझ गया। इससे वैश्विक मंच पर EU की कार्रवाई की गति धीमी हुई और वह एक कमजोर वैश्विक खिलाड़ी के रूप में उभरा। यह उथल-पुथल वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर पश्चिमी एकता को भी कमज़ोर करने लगी।

भारतीय विदेश नीति पर असर: भारत ने यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया, बजाय कि केवल ब्रुसेल्स (EU मुख्यालय) पर निर्भर रहने के। भारत ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वार्ता को तेज़ी से आगे llबढ़ाया, लेकिन संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के कारण समझौते पर हस्ताक्षर मुश्किल बने रहे। भारत ने यूरोपीय देशों को रणनीतिक स्वायत्तता के महत्त्व को समझाते हुए उन्हें रूस और चीन जैसे देशों के साथ भारत के संतुलित दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया।

 

2- एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय तनाव

एशिया, विशेष रूप से हिंद-प्रशांत, वर्ष 2025 में वैश्विक भू-राजनीतिक हॉटस्पॉट बना रहा, जहाँ चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं ने प्रमुखता हासिल की।

2.1. भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव: ‘ऑपरेशन सिंदूर’

अप्रैल 2025 में, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए एक बड़े आतंकी हमले में कई विदेशी पर्यटकों सहित बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो गई। इस घटना के जवाब में, भारत ने मई 2025 को पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर मिसाइल हमले करने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च किया। इस ऑपरेशन ने दोनों देशों के बीच तनाव को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया, और दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सेनाएं तैनात कर दीं।

घटना का विश्लेषण: इस सैन्य कार्रवाई ने भारत की ‘शून्य सहिष्णुता’ की नीति को और अधिक दृढ़ता से स्थापित किया। यह घटना एक बार फिर दर्शाती है कि सीमा पार आतंकवाद भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। दोनों देशों के बीच ड्रोन युद्ध देखा गया, और भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने जैसे सख्त कदम उठाने की धमकी दी, जिससे कूटनीतिक संकट पैदा हुआ। यह घटना संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी चर्चा का विषय बनी।

भारतीय विदेश नीति पर असर: भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी आत्मरक्षा के अधिकार को मजबूती से स्थापित किया। भारत ने तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप का मजबूती से खंडन किया, खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्ष विराम करवाने का दावा किया। भारत ने इस दावे को खारिज करते हुए अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता और संप्रभुता को बनाए रखा। हालांकि, इस घटना ने घरेलू राजनीति में सरकार को विपक्ष से आलोचना झेलने पर मजबूर किया कि उसने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश की कूटनीतिक स्वतंत्रता पर समझौता किया है।

2.2. चीन के साथ सीमा पर गतिरोध और आर्थिक अलगाव

पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर तनाव बना रहा, और डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया धीमी रही। वहीं, चीन ने अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए औद्योगिक नीतियों और गैर-टैरिफ बाधाओं को बढ़ाया, जिससे वैश्विक व्यापार में अलगाव की प्रवृत्ति मजबूत हुई।

घटना का विश्लेषण: चीन की आक्रामक विस्तारवादी विदेश नीति ने आसियान (ASEAN) देशों और भारत को अपनी सुरक्षा साझेदारी को मजबूत करने के लिए प्रेरित किया। भू-राजनीतिक आर्थिक नीति अनिश्चितता सूचकांक का उच्च बना रहना दर्शाता है कि वैश्विक व्यापार अब राजनीतिक जोखिमों से अत्यधिक प्रभावित हो रहा है। चीन की नीतियाँ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में और अधिक विखंडन ला रही हैं।

भारतीय विदेश नीति पर असर:

भारत ने चीन के साथ सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए कूटनीतिक और सैन्य वार्ता जारी रखी, लेकिन साथ ही, उसने QUAD (क्वाड) और फ्रांस/जर्मनी जैसे प्रमुख देशों के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपने संबंधों को मजबूत किया। भारत ने आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण (Supply Chain Diversification) पर ज़ोर दिया और चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करने के लिए घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाओं को आक्रामक रूप से लागू किया।

2.3 थाईलैंड-कंबोडिया संघर्ष और क्षेत्रीय भू-राजनीति

जुलाई 2025 में, थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद पर सीधा सशस्त्र संघर्ष भड़क उठा, जो 2008 के बाद सबसे तीव्र था। यह संघर्ष मुख्य रूप से सदियों पुराने प्रेह विहार मंदिर और विवादित सीमावर्ती भूमि के कारण था। संघर्ष में दोनों ओर के सैनिक और नागरिक हताहत हुए और लगभग 1.5 लाख नागरिक विस्थापित हुए। दिसंबर 2025 में भी इस क्षेत्र में हवाई हमले और जमीनी संघर्ष जारी रहा।

घटना का विश्लेषण: यह संघर्ष दर्शाता है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कैसे क्षेत्रीय शांति को अस्थिर कर सकता है। आसियान, जो क्षेत्रीय शांति बनाए रखने के लिए एक प्रमुख मंच है, इस संघर्ष को तुरंत नियंत्रित करने में संघर्षरत रहा, जिससे उसकी एकजुटता और प्रभावशीलता पर सवाल उठे। हालांकि, बाहरी राजनयिक दबाव (मलेशिया और अमेरिका के समर्थन से) के तहत दोनों देश एक अस्थायी संघर्ष विराम पर सहमत हुए, लेकिन मूल विवाद अनसुलझा रहा। यह घटना मुख्य भूमि दक्षिण पूर्व एशिया की सुरक्षा पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ने वाली थी।

भारत पर प्रभाव

  • ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की चुनौती: यह संघर्ष भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के भारत के प्रयासों के लिए एक गंभीर चुनौती थी। दक्षिण पूर्व एशिया में स्थिरता भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • कूटनीतिक प्रतिक्रिया: भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने तुरंत स्थिति पर कड़ी निगरानी रखने और शत्रुता की समाप्ति की आशा व्यक्त करते हुए एक बयान जारी किया। भारत ने दोनों देशों (जिनके साथ उसके घनिष्ठ संबंध हैं) को संयम बरतने की सलाह दी।
  • सुरक्षा और व्यापार: भारत ने अपने नागरिकों के लिए थाईलैंड और कंबोडिया की सीमावर्ती क्षेत्रों की यात्रा न करने की सलाह जारी की, जिससे पर्यटन और क्षेत्र के साथ व्यापार पर अस्थायी प्रभाव पड़ा। यह घटना भारत को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में आसियान को मजबूत करने की आवश्यकता को बल देती है।

2.4 जापान में प्रधानमंत्री ताकाची सनई का आगमन

अक्टूबर 2025 में, ताकाची सनई (Sanae Takaichi) ने जापान की प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, जो देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) का नेतृत्व संभाला और अपनी पूर्ववर्ती नीतियों को सुदृढ़ किया, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक संशोधन पर कठोर रुख शामिल था।

घटना का विश्लेषण: ताकाची का आगमन शिंज़ो आबे की वैचारिक विरासत की निरंतरता का प्रतीक था, जिसे “आबे 2.0” की राजनीति कहा गया। उनकी नीतियाँ मुख्य रूप से राष्ट्रवाद, रक्षा सामान्यीकरण और आर्थिक सुरक्षा के कठोर व्यावहारिकता पर केंद्रित थीं। पदभार संभालने के तुरंत बाद, उन्होंने GDP का 2% रक्षा खर्च करने की समय सीमा को तेज कर दिया और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में संशोधन का आदेश दिया।

इस कदम से चीन और उत्तर कोरिया के खिलाफ क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ गई। ताकाची ने ताइवान के साथ सहयोग को मजबूत करने और जापान के आत्म-रक्षा बलों को मजबूत करने का समर्थन किया। हालांकि, उनके अति-राष्ट्रवादी विचारों ने दक्षिण कोरिया के साथ संबंधों में तनाव बनाए रखा, खासकर विवादित द्वीपों पर उनके बयानों के कारण।

 

भारत पर क्षेत्रीय भू-राजनीति और प्रभाव

  • QUAD और हिंद-प्रशांत: ताकाची के नेतृत्व ने “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” की अवधारणा को और मजबूत किया। भारत के लिए यह QUAD और द्विपक्षीय रक्षा साझेदारी को मजबूत करने का एक अवसर था, खासकर चीन की बढ़ती मुखरता का मुकाबला करने के लिए।
  • प्रौद्योगिकी और आर्थिक साझेदारी: ताकाची ने आसियान और भारत के साथ प्रौद्योगिकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए पहलें शुरू कीं, जैसे जापान-आसियान एआई सह-निर्माण पहल। इससे भारत को उन्नत प्रौद्योगिकी (क्वांटम और सेमीकंडक्टर) में जापान के साथ जुड़ने का सीधा लाभ मिला।
  • व्यावहारिक जुड़ाव: भारत ने यह पहचानते हुए कि ताकाची की नीति अधिक घरेलू-केंद्रित और स्पष्ट रूप से “जापानी राष्ट्रीय हितों” को पहले रखने वाली होगी, उनके साथ एक व्यावहारिक संरेखण की नीति अपनाई, जिसने साझा हितों को आगे बढ़ाया।

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