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विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक

शिक्षा के पुनर्संरचना की ओर एक महत्वाकांक्षी कदम

विकसित भारत @2047 के संकल्प को साकार करने की दिशा में, केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक’ (VBSAV) भारतीय उच्च शिक्षा के परिदृश्य को मौलिक रूप से बदलने की क्षमता रखता है। यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है; यह एक दार्शनिक घोषणा है जो इस बात को स्थापित करती है कि एक ‘विकसित राष्ट्र’ की नींव ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार पर टिकी होती है। यह विधेयक, यदि अपनी भावना और उद्देश्यों के अनुरूप कार्यान्वित होता है, तो भारतीय शिक्षा संस्थानों को विश्व पटल पर स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

1-केंद्रीयकरण और स्वायत्तता का द्वंद्व

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक का मूल उद्देश्य शिक्षा के मानकों में एकरूपता लाना, अत्यधिक विनियमन को समाप्त करना, और अनुसंधान को प्रोत्साहन देना है। इसके तहत एक शक्तिशाली केंद्रीय निकाय, संभवतः ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ (VBES), की स्थापना का प्रस्ताव है जो वर्तमान में कार्यरत अनेक नियामक निकायों (जैसे UGC, AICTE, आदि) के कार्यों को समेकित करेगा।यह केंद्रीकृत नियामक संरचना एक दोहरी धार वाली तलवार है।

  • सकारात्मक पक्ष: यह नियामक जंगल को साफ करेगा, जिससे संस्थानों को अनुपालन की जटिलताओं से मुक्ति मिलेगी और वे अपना ध्यान शिक्षण और अनुसंधान पर केंद्रित कर पाएंगे। यह ‘इंस्पेक्टर राज’ की संस्कृति को समाप्त कर सकता है।
  • चिंता का पक्ष: अत्यधिक केंद्रीकरण से क्षेत्रीय विशिष्टताओं और विविधता को खतरा हो सकता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में, जहाँ शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, एक ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ (एक आकार-सब पर फिट) दृष्टिकोण राज्यों की स्वायत्तता और स्थानीय आवश्यकताओं की अनदेखी कर सकता है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि केंद्रीय निकाय संस्थाओं को कठोर नियंत्रण के बजाय उत्प्रेरक के रूप में कार्य करे।

2-अनुसंधान और नवाचार पर विशेष ज़ोर

विधेयक का एक महत्वपूर्ण आयाम अनुसंधान और नवाचार को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। यह उच्च शिक्षा संस्थानों को अनुसंधान विश्वविद्यालयों और शिक्षण विश्वविद्यालयों में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव कर सकता है। इसका उद्देश्य संसाधनों और फंडिंग को रणनीतिक रूप से उन संस्थानों की ओर मोड़ना है जो विश्व-स्तरीय शोध आउटपुट देने में सक्षम हैं।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक संभवतः निजी क्षेत्र की भागीदारी और उद्योग-शिक्षा गठजोड़ों को मजबूत करने के लिए विशेष प्रावधान करेगा। ‘विकसित भारत अनुसंधान निधि’ (VBRF) जैसी पहलें, यदि प्रस्तावित हैं, तो यह सुनिश्चित करेंगी कि शोध परियोजनाओं को केवल सरकारी अनुदान पर निर्भर न रहना पड़े।

  • चुनौती: भारत में अनुसंधान संस्कृति अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में है, खासकर राज्य और निजी विश्वविद्यालयों में। पर्याप्त मानव संसाधन, उन्नत प्रयोगशालाएँ और शोध नैतिकता की कमी एक बड़ी बाधा है। केवल फंडिंग बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी; हमें मेन्टॉरशिप, सहयोगी अनुसंधान नेटवर्क और एक ऐसी मूल्यांकन प्रणाली की आवश्यकता है जो प्रकाशनों की संख्या के बजाय प्रभाव पर ज़ोर दे।

3-बहुविषयक शिक्षा और लचीला पाठ्यक्रम

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की भावना के अनुरूप, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक बहुविषयक शिक्षा और छात्रों को पाठ्यक्रम चुनने में अधिक लचीलापन प्रदान करने पर बल देगा। इसका अर्थ है कला, विज्ञान, वाणिज्य और व्यावसायिक विषयों के बीच की कठोर दीवारों को तोड़ना।

इस बदलाव का लक्ष्य ऐसे स्नातक तैयार करना है जो 21वीं सदी की जटिल समस्याओं को समग्र रूप से समझ सकें। उदाहरण के लिए, एक इंजीनियरिंग छात्र अब दर्शनशास्त्र का एक माइनर कोर्स या इतिहास का एक क्रेडिट भी ले सकता है।

  • कार्यान्वयन की कठिनाई: इस लचीलेपन को लागू करने के लिए संस्थानों को अपनी प्रशासनिक संरचनाओं, क्रेडिट ट्रांसफर प्रणालियों और संकाय की मानसिकता में बड़े बदलाव करने होंगे। बहुविषयक शिक्षण के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और पारंपरिक विभागों का विरोध इस राह में बड़ी बाधाएँ हैं।

4-वित्त पोषण का नया खाका और निजी भागीदारी

शिक्षा की गुणवत्ता को वैश्विक मानकों तक पहुँचाने के लिए भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक संभवतः सरकारी फंडिंग को प्रदर्शन-आधारित बनाने का प्रस्ताव करेगा, जहाँ फंडिंग का आवंटन संस्थान की रैंकिंग, अनुसंधान आउटपुट और छात्र परिणामों पर निर्भर करेगा।

इसके अतिरिक्त, विधेयक निजी और परोपकारी निवेश को आकर्षित करने के लिए नियामक वातावरण को सरल बना सकता है। गैर-लाभकारी शिक्षा मॉडल के बावजूद, निजी संस्थानों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण होगा।

  • संदेह और समाधान: यह डर हमेशा बना रहता है कि अधिक निजी भागीदारी से शिक्षा का व्यावसायीकरण हो सकता है और यह समाज के वंचित वर्गों के लिए अगम्य हो जाएगी। विधेयक में मजबूत फीस नियंत्रण तंत्र और सामाजिक समावेशन के लिए आरक्षण/छात्रवृत्ति प्रावधानों को अत्यंत स्पष्ट और अटल होना चाहिए ताकि आर्थिक असमानता न बढ़े।

5-मूल्यांकन और प्रत्यायन में पारदर्शिता

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान द्वारा प्रस्तावित मूल्यांकन और प्रत्यायन प्रणाली का उद्देश्य विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना होगा। यह संभवतः डेटा-चालित मूल्यांकन पर आधारित होगा, जिसमें संस्थानों को अपने प्रदर्शन डेटा को सार्वजनिक रूप से साझा करना होगा।

वैश्विक रैंकिंग फ्रेमवर्क के अनुरूप घरेलू रैंकिंग को मजबूत करना एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

  • आवश्यकता: वर्तमान में प्रत्यायन प्रक्रियाएं अक्सर समय लेने वाली और व्यक्तिपरक होती हैं। नई प्रणाली को प्रौद्योगिकी का उपयोग करके त्वरित, उद्देश्यपूर्ण और सतत होना चाहिए। इसे केवल इनपुट (जैसे भवन, शिक्षक) के बजाय आउटपुट (जैसे नवाचार, रोजगार, सामाजिक प्रभाव) पर ज़ोर देना चाहिए।

6-जोखिम और आगे की राह

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक निस्संदेह भारतीय शिक्षा को एक नए युग में ले जाने का ब्लूप्रिंट है, लेकिन इसकी सफलता इसके सूक्ष्म कार्यान्वयन में निहित है।

  • संकाय विकास (Faculty Development): सबसे बड़ी चुनौती शिक्षकों को तैयार करना है। नए बहुविषयक और अनुसंधान-केंद्रित शिक्षण के लिए वर्तमान संकाय का बड़े पैमाने पर पुन: प्रशिक्षण (Retraining) आवश्यक है।
  • राज्यों के साथ समन्वय: चूँकि शिक्षा समवर्ती सूची में है, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सार्थक और निरंतर संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्यों की चिंताओं को दूर किए बिना, विधेयक जमीन पर सफल नहीं हो पाएगा।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की निरंतरता: शिक्षा नीति में बदलाव के परिणाम तुरंत नहीं दिखते; उन्हें एक पीढ़ी या उससे अधिक का समय लगता है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को राजनीतिक परिवर्तन की परवाह किए बिना निरंतर समर्थन और वित्तीय पोषण की आवश्यकता होगी।

7-निष्कर्ष: भविष्य के भारत की कुंजी

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक केवल शिक्षा सुधार नहीं है; यह भारत के सामाजिक-आर्थिक भविष्य में निवेश है। यह हमारे युवाओं को न केवल नौकरी चाहने वाला, बल्कि नौकरी देने वाला और समस्या समाधानकर्ता बनने के लिए सशक्त बनाने का प्रयास है। इस विधेयक को सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए सरकार, शिक्षाविदों, उद्योग और सबसे बढ़कर, समाज के हर वर्ग को एक साथ आना होगा। केवल कागजी सुधारों से नहीं, बल्कि शिक्षकों और छात्रों के हृदय में ज्ञान के प्रति सच्चे अनुराग से ही ‘विकसित भारत’ का स्वप्न साकार होगा। यह विधेयक उस नींव का पत्थर बन सकता है जिस पर आने वाली पीढ़ियों के सपनों की इमारत खड़ी होगी।


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