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वेनेज़ुएला का इतिहास : उपनिवेशवाद से समकालीन संकट तक

वेनेज़ुएला का इतिहास लैटिन अमेरिका के उन देशों का प्रतिनिधि उदाहरण है जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद राजनीतिक अस्थिरता, संस्थागत कमजोरी और वैचारिक अतिवाद ने राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को जटिल बना दिया। यह इतिहास उपनिवेशवाद, स्वतंत्रता संग्राम, सैन्य तानाशाही, लोकतांत्रिक प्रयोग और समाजवादी राजनीति के उतार–चढ़ाव से होकर गुज़रा है।

प्राचीन और पूर्व-उपनिवेशकालीन समाज

स्पेनिश आगमन से पहले वेनेज़ुएला में कैरिब, अरावक और चिबचा जैसी जनजातियाँ निवास करती थीं। इनकी सामाजिक संरचना जनजातीय थी और आजीविका के साधन शिकार, मत्स्य पालन तथा सीमित कृषि पर आधारित थे। यहाँ कोई संगठित राज्य व्यवस्था नहीं थी, किंतु सामाजिक जीवन प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण था।

स्पेनिश उपनिवेशवाद (1498–1810)

1498 में क्रिस्टोफर कोलंबस के आगमन के साथ वेनेज़ुएला स्पेनिश साम्राज्य का हिस्सा बना। अमेरिगो वेस्पूची ने झीलों के किनारे बसे लकड़ी के घरों को देखकर इसे ‘लिटिल वेनिस’ कहा, जिससे “Venezuela” नाम प्रचलित हुआ। उपनिवेशकाल में कोको, कॉफी और गन्ना जैसी फसलों पर आधारित अर्थव्यवस्था विकसित की गई। इस व्यवस्था का आधार अफ्रीकी दास प्रथा थी।

उपनिवेशकालीन समाज तीव्र असमानता से ग्रस्त था। शीर्ष पर स्पेन से आए शासक वर्ग, मध्य में क्रियोल (स्थानीय यूरोपीय मूल के लोग) और निचले पायदान पर दास तथा आदिवासी थे। आर्थिक शोषण और राजनीतिक बहिष्कार ने स्वतंत्रता की भावना को जन्म दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन और सिमोन बोलिवार की भूमिका

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम और फ्रांसीसी क्रांति के विचार वेनेज़ुएला पहुँचे। 1810 में स्पेन के विरुद्ध विद्रोह हुआ और 1811 में स्वतंत्रता की घोषणा की गई। इस आंदोलन के केंद्रीय नेता सिमोन बोलिवार थे, जिन्हें “लैटिन अमेरिका का मुक्तिदाता” कहा जाता है।

हालाँकि प्रारंभिक वर्षों में स्वतंत्रता संघर्ष को असफलताओं का सामना करना पड़ा, लेकिन 1821 में काराबोबो की निर्णायक लड़ाई के बाद स्पेनिश सत्ता का अंत हो गया। यह वेनेज़ुएला के इतिहास का निर्णायक मोड़ था।

ग्रैन कोलंबिया और उसका विघटन (1821–1830)

स्वतंत्रता के बाद वेनेज़ुएला कोलंबिया, इक्वाडोर और पनामा के साथ मिलकर ग्रैन कोलंबिया का हिस्सा बना। बोलिवार का उद्देश्य एक शक्तिशाली और एकीकृत लैटिन अमेरिकी राष्ट्र का निर्माण था। किंतु क्षेत्रीय असंतोष, प्रशासनिक कठिनाइयों और स्थानीय अभिजात वर्ग के विरोध के कारण यह प्रयोग विफल रहा। 1830 में वेनेज़ुएला एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।

19वीं शताब्दी : सैन्य शासक और अस्थिरता

स्वतंत्रता के बाद वेनेज़ुएला लंबे समय तक “कौडिलिस्मो” यानी सैन्य शासकों के प्रभुत्व में रहा। बार-बार सत्ता परिवर्तन, गृहयुद्ध और कमजोर संस्थाओं ने लोकतांत्रिक विकास को बाधित किया। अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर रही और आम जनता का जीवन स्तर निम्न बना रहा।

तेल की खोज और 20वीं शताब्दी की राजनीति

1914 में तेल की खोज ने वेनेज़ुएला के इतिहास को नया मोड़ दिया। शीघ्र ही यह विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल हो गया। तेल से प्राप्त राजस्व ने बुनियादी ढाँचे का विकास तो किया, लेकिन साथ ही “रिसोर्स कर्स” की समस्या भी उत्पन्न हुई। राज्य तेल आय पर अत्यधिक निर्भर हो गया और अन्य क्षेत्रों की उपेक्षा हुई।

इस काल में जुआन विसेंटे गोमेज़ जैसे तानाशाहों का शासन रहा। राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित थी, किंतु राज्य की आय बढ़ती गई।

लोकतांत्रिक प्रयोग (1958–1998)

1958 में सैन्य तानाशाही का अंत हुआ और लोकतांत्रिक शासन स्थापित हुआ। राजनीतिक दलों के बीच सत्ता-साझेदारी की व्यवस्था बनी, जिसे “पुंटो फिजो पैक्ट” कहा जाता है। प्रारंभिक दशकों में यह व्यवस्था स्थिर रही, लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार, असमानता और प्रशासनिक अक्षमता बढ़ती गई।

1980–90 के दशक में तेल की कीमतों में गिरावट ने आर्थिक संकट को जन्म दिया। इससे जनता में असंतोष फैला और पारंपरिक राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता कम हो गई।

ह्यूगो चावेज और बोलिवेरियन क्रांति

1999 में ह्यूगो चावेज सत्ता में आए और उन्होंने “बोलिवेरियन क्रांति” की शुरुआत की। उनका उद्देश्य समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित राज्य का निर्माण करना था। तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा गरीबी उन्मूलन के लिए व्यापक सामाजिक कार्यक्रम शुरू हुए।

प्रारंभिक वर्षों में इन नीतियों से गरीब वर्ग को लाभ हुआ, लेकिन दीर्घकाल में निजी निवेश में कमी, उत्पादन घटने और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ने से अर्थव्यवस्था कमजोर होने लगी। सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता गया।

निकोलस मादुरो और समकालीन संकट

2013 में चावेज की मृत्यु के बाद निकोलस मादुरो राष्ट्रपति बने। उनके शासन में वेनेज़ुएला गंभीर आर्थिक और मानवीय संकट से जूझने लगा। अत्यधिक मुद्रास्फीति, खाद्य एवं दवाइयों की कमी, बेरोज़गारी और बड़े पैमाने पर पलायन इस संकट की प्रमुख विशेषताएँ हैं। राजनीतिक दमन और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने स्थिति को और जटिल बना दिया।

निष्कर्ष

वेनेज़ुएला का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि केवल प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता किसी देश को समृद्ध नहीं बनाती। सुदृढ़ संस्थाएँ, विविधीकृत अर्थव्यवस्था और संतुलित राजनीतिक विचारधारा ही स्थायी विकास का आधार होती हैं। वेनेज़ुएला का अनुभव विकासशील देशों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है कि संसाधन-समृद्धि को कुशल शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जोड़ना अनिवार्य है।


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