वेनेजुएला में निकोलस मादुरो के सत्ताच्युत होने के साथ ही लैटिन अमेरिकी भू-राजनीति का फलक तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। यह घटनाक्रम न केवल क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव के पुनरुत्थान का संकेत है, बल्कि भारत जैसी उभरती वैश्विक शक्ति के लिए सामरिक और व्यावसायिक संभावनाओं का एक अप्रत्याशित द्वार भी है। प्रख्यात विश्लेषक सी. राजा मोहन ने उचित ही रेखांकित किया है कि नई दिल्ली के लिए यह समय लैटिन अमेरिका में अपनी सक्रियता को नई गति देने का है, ताकि चीन की शिथिल पड़ती क्षेत्रीय पकड़ से उत्पन्न शून्यता का रणनीतिक लाभ उठाया जा सके। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक विस्तार और वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की एकजुटता के इस नए युग में भारत की संतुलित विदेश नीति ही उसकी सफलता का मूलाधार बनेगी।
बदलता परिदृश्य और भारतीय तटस्थता:
मादुरो का शासनकाल वेनेजुएला के लिए आर्थिक संकुचन, अनियंत्रित मुद्रास्फीति और मानवीय त्रासदी का पर्याय बन चुका था। अमेरिकी हस्तक्षेप के उपरांत अब जो नवीन राजनीतिक संरचना उभर रही है, वह क्षेत्रीय शक्तियों के समक्ष चुनौतियां और अवसर दोनों प्रस्तुत करती है। भारत ने इस संकट के दौरान जिस संयमित और गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण का परिचय दिया, वह उसकी दूरदर्शिता का परिचायक है। वेनेजुएला विश्व के विशालतम तेल भंडार का स्वामी है। सत्ता परिवर्तन के पश्चात यदि वहां तेल उत्पादन में स्थिरता आती है, तो यह भारत के ऊर्जा बिल को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। अपनी तेल आवश्यकताओं के लिए 85 प्रतिशत आयात पर निर्भर भारत के लिए वेनेजुएला का विकल्प चालू खाता घाटे (कैड) को नियंत्रित करने में रामबाण सिद्ध हो सकता है।
दिल्ली की यह कूटनीतिक तटस्थता न केवल वाशिंगटन के साथ संबंधों को प्रगाढ़ करेगी, बल्कि ब्राजील, अर्जेंटीना, चिली और कोलंबिया जैसे महत्वपूर्ण देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों के नए क्षितिज भी खोलेगी।
ड्रैगन की चुनौती और भारत का उदय:
लैटिन अमेरिका लंबे समय से भारत और चीन की कूटनीतिक स्पर्धा का अखाड़ा रहा है। बीजिंग ने अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ (बीआरआई) के माध्यम से बंदरगाहों, ऊर्जा परियोजनाओं और अवसंरचना विकास में अरबों डॉलर का निवेश कर क्षेत्र को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया था। मादुरो शासन के लिए चीन एक आर्थिक ढाल बना रहा, किंतु अब अमेरिकी वर्चस्व की पुनर्वापसी से चीन की महत्वाकांक्षाएं डगमगा रही हैं। भारत को इसी ऐतिहासिक क्षण का लाभ उठाते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए। वर्तमान में लैटिन अमेरिका के साथ भारत का व्यापार 40-50 अरब डॉलर के आसपास है, जो चीन के 450 अरब डॉलर के मुकाबले अत्यंत न्यून है।हमें ब्राजील से खाद्य तेल के आयात से आगे बढ़कर खनन, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल ढांचे में निवेश करना होगा। विशेषकर चिली और अर्जेंटीना का ‘लिथियम त्रिकोण’ भारत के इलेक्ट्रिक वाहन मिशन और ‘मेक इन इंडिया’ संकल्प को नई ऊर्जा दे सकता है।
ऐतिहासिक उपेक्षा का त्याग और सक्रिय कूटनीति:
नेहरू युग की गुटनिरपेक्षता से लेकर वर्तमान तक, लैटिन अमेरिका भारतीय कूटनीति के मानचित्र पर प्रायः हाशिए पर रहा है। हालांकि मोदी काल में ब्रिक्स और जी-20 जैसे मंचों के माध्यम से संवाद बढ़ा है, किंतु ट्रंप प्रशासन की नई नीतियों ने इस संबंध को एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। यदि वाशिंगटन वेनेजुएला के तेल को वैश्विक बाजार में लाने की राह सुगम बनाता है, तो भारत को इसका सीधा लाभ मिलेगा। दिल्ली को अब अमेरिका के साथ सामंजस्य बिठाते हुए लैटिन अमेरिकी देशों से सीधे आर्थिक संवाद स्थापित करना होगा। मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और क्षेत्रीय व्यापार संगठनों में सक्रिय भागीदारी अब विकल्प नहीं, बल्कि अपरिहार्य आवश्यकता है। ब्राजील के लुला और अर्जेंटीना के माइली जैसे नेताओं के साथ भारत की कृषि तकनीक, औषधि विज्ञान (फार्मा) और सूचना प्रौद्योगिकी की क्षमताओं का सटीक मेल संभव है।
आर्थिक और सामरिक आयाम:
आर्थिक लाभ के साथ-साथ इस क्षेत्र का सामरिक महत्व भी अतुलनीय है। मादक पदार्थों की तस्करी और संगठित अपराध जैसी साझा चुनौतियों के विरुद्ध भारत को अपनी ‘सागर’ (SAGAR) पहल का विस्तार दक्षिण अमेरिका तक करना चाहिए। कोलंबिया और पेरू के साथ रक्षा सहयोग तथा चिली के साथ बंदरगाह विकास की संभावनाएं तलाशना समय की मांग है। साथ ही, वेनेजुएला पर बकाया ऋण की वसूली के लिए भी यह अनुकूल समय है। जैव ईंधन और हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में लैटिन अमेरिका का सहयोग भारत के ‘नेट जीरो’ लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा।
भारत की ‘सागर’ (SAGAR) पहल का अर्थ ‘Security and Growth for All in the Region’ है। इसे 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लॉन्च किया गया था।इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करना एवं समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग और आर्थिक सहयोग बढ़ाना है।
निष्कर्ष:
वेनेजुएला का संकट भारत की ‘बहु-संरेखण’ (मल्टी-अलाइनमेंट) नीति की अग्निपरीक्षा है। यह समय ऐतिहासिक जड़ता को त्यागकर लैटिन अमेरिका के साथ एक नवीन और प्रगाढ़ साझेदारी का अध्याय लिखने का है। सी. राजा मोहन द्वारा इंगित ‘क्षेत्रीय खिड़की’ अब पूरी तरह खुल चुकी है। यदि भारत कूटनीतिक तत्परता और आर्थिक दृढ़ता का परिचय देता है, तो लैटिन अमेरिका के साथ उसके संबंध वैश्विक पटल पर भारत के कद को नई ऊंचाई प्रदान करेंगे। अब यह केवल संभावनाओं का विषय नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का समय है।
स्रोत: Indian Express (C. Raja Mohan)
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