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संघीय ढाँचे में एकात्मक झुकाव और संघवाद में संरचनात्मक पुनर्संतुलन की आवश्यकता

भारत में संघवाद का स्वरुप

  • स्वतंत्रता के समय संविधान ने सत्ता के विकेंद्रीकरण से अधिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी।
  • इसलिए भारतीय संविधान ने एक संघीय व्यवस्था (Federal System) स्थापित की, जिसमें स्पष्ट रूप से एकात्मक (Unitary) झुकाव था।
  • आज भारत एक राजनीतिक रूप से परिपक्व, प्रशासनिक रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से संगठित राष्ट्र बन चुका है, इसलिए पुनर्संतुलन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
  • केंद्र में शक्ति का निरंतर केंद्रीकरण अब राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के बजाय शासन को कमजोर कर सकता है।
  • अतः संघ–राज्य संबंधों का पुनर्संतुलन किसी राजनीतिक मांग के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: केंद्रीकरण क्यों उभरा?

  • 1947 के बाद की परिस्थितियाँ जैसे विभाजन, रियासतों का एकीकरण और क्षेत्रीय विघटन का भय ने एक मजबूत केंद्र की आवश्यकता पैदा की।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 से संस्थागत ढांचा लिया गया, जिससे सत्ता नई दिल्ली में केंद्रित हुई।
  • केंद्रीकरण राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु एक रक्षात्मक तंत्र के रूप में कार्य करता था। किंतु आपातकालीन परिस्थितियों में बने संस्थागत ढाँचे अक्सर संकट के बाद भी बने रहते हैं। जो व्यवस्था अस्थायी सुरक्षा उपाय के रूप में शुरू हुई, वह स्थायी प्रशासनिक प्रवृत्ति बन गई।
क्रमांककारणविस्तृत व्याख्याप्रभाव
1विभाजन (1947)सांप्रदायिक हिंसा, बड़े पैमाने पर विस्थापन और सीमाई अस्थिरता ने राष्ट्रीय एकता को चुनौती दीमजबूत केंद्र की आवश्यकता महसूस हुई
2रियासतों का एकीकरण565 रियासतों को भारतीय संघ में मिलाना था; हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर जैसे जटिल मामलेरक्षा, विदेश नीति आदि विषयों पर केंद्र को अधिक शक्ति दी गई
3भारत सरकार अधिनियम, 1935 का प्रभावऔपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे से प्रेरित प्रावधान अपनाए गएसत्ता संरचना नई दिल्ली में केंद्रित हुई
4राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताप्रारंभिक युद्ध, सीमाई विवाद और आंतरिक विद्रोहत्वरित निर्णय और समन्वय हेतु केंद्रीकरण को प्राथमिकता
5अस्थायी से स्थायी व्यवस्थाआपातकालीन परिस्थितियों में बना ढाँचा समय के साथ बना रहाकेंद्रीकरण प्रशासनिक प्रवृत्ति बन गया

सैद्धांतिक आधार: संघवाद का अर्थ

  • संघवाद सत्ता के वितरण और सीमांकन दोनों पर आधारित है। शासन की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि निर्णय प्रक्रिया जनता के कितने निकट है। नागरिकों के निकट निर्णय लेने से उत्तरदायित्व और प्रशासनिक सटीकता बढ़ती है।
  • अत्यधिक केंद्रीकरण शासन को कमजोर बनाता है क्योंकि एक ही प्राधिकरण विविध जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से नहीं संभाल सकता। संघ की शक्ति कार्यों के संचय में नहीं, बल्कि संतुलित सीमांकन में निहित है।

संघवाद के प्रकार

  • होल्डिंग टूगेदर फ़ेडरेशन’ (Holding Together Federation): इस प्रकार के संघ में संपूर्ण इकाई में विविधता को समायोजित करने के लिये विभिन्न घटक भागों के बीच शक्तियों को साझा किया जाता है। यहाँ शक्तियाँ आम तौर पर केंद्रीय सत्ता की ओर झुकी होती हैं।

उदाहरण: भारत, स्पेन, बेल्जियम।

  • कमिंग टूगेदर फ़ेडरेशन’ (Coming Together Federation):इस प्रकार के संघ में स्वतंत्र राज्य एक बड़ी इकाई बनाने के लिये एक साथ आते हैं। यहाँ राज्यों को ‘होल्डिंग टूगेदर फ़ेडरेशन’ के रूप में गठित संघ की तुलना में अधिक स्वायत्तता प्राप्त होती है।

उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड।

  • असममित संघ (Asymmetrical Federation):इस प्रकार के संघ में कुछ घटक इकाइयों के पास ऐतिहासिक या सांस्कृतिक कारणों से अन्य की तुलना में अधिक शक्तियाँ या विशेष स्थिति होती है।

उदाहरण: कनाडा, रूस, इथियोपिया।

भारतीय संघवाद की प्रकृति

भारतीय संविधान एक प्रबल संघ (strong Union) के साथ संघीय प्रणाली की स्थापना करता है। इस कारण, भारतीय संघवाद को कभी-कभी अलग-अलग शब्दों से संदर्भित किया जाता है:

  • के.सी. व्हीयर (KC Wheare) ने इसे ‘अर्द्ध-संघीय’ (Quasi-federal) कहा।
  • ग्रैनविल ऑस्टिन (Granville Austin) ने इसे ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative federalism) कहा, जहाँ राष्ट्रीय अखंडता एवं एकता की आवश्यकता रहती है।
  • मॉरिस जोन्स (Morris Jones) ने इसे सौदेबाज़ी शक्ति युक्त संघवाद’ (Bargaining Federalism) के रूप में परिभाषित किया।
  • आइवर जेनिंग (Ivor Jenning) ने इसे ‘केंद्रीकरण की प्रवृत्ति युक्त संघवाद’ (Federalism with Centralizing tendency) कहा।

संविधान में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच विधायी, प्रशासनिक एवं कार्यकारी शक्तियों का वितरण निर्दिष्ट किया गया है।

राजनीतिक व्यवहार: आवश्यकता से आदत तक

  • कई दशकों तक एक ही राष्ट्रीय दल के प्रभुत्व ने केंद्रीय सत्ता को मजबूत किया।
  • कानूनी शक्तियाँ होने के बावजूद राज्यों की व्यावहारिक स्वायत्तता सीमित रही।
  • बाद में गठबंधन सरकारों और क्षेत्रीय दलों के उभार से संतुलन बढ़ा, बिना राष्ट्रीय एकता को खतरे में डाले।
  • वर्तमान केंद्रीकरण प्रारंभिक आशंकाओं की निरंतरता को दर्शाता है, न कि वर्तमान वास्तविकताओं को।
  • राष्ट्र अपनी प्रारंभिक असुरक्षाओं से आगे बढ़ चुका है, पर संस्थागत प्रवृत्तियाँ बनी हुई हैं।

केंद्रीकरण के संस्थागत तंत्र

केंद्र ने अपनी शक्ति विभिन्न माध्यमों से बढ़ाई:

  • संवैधानिक संशोधन
  • समवर्ती सूची में विधायन
  • सशर्त वित्तीय हस्तांतरण
  • केंद्र प्रायोजित योजनाएँ
  • प्रशासनिक निगरानी
  • वित्तीय निर्भरता प्रभाव का प्रमुख साधन बन गई है।
  • नई दिल्ली के मंत्रालय कई बार राज्यों के कार्यों की पुनरावृत्ति करते हैं।
  • कुछ क्षेत्रों में कार्यपालिका के नियम राज्यों के कानूनों को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर देते हैं।

न्यायिक सिद्धांत और संवैधानिक तनाव

  • एस.आर. बोम्मई मामला (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने संघवाद को संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा माना।
  • राज्यों को उनके अधिकार क्षेत्र में संवैधानिक स्वायत्तता प्राप्त है।
  • संघवाद प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि भारत की विविधता और ऐतिहासिक बहुलता से उत्पन्न है।
  • सिद्धांत और व्यवहार में अंतर है, न्यायालय समानता को स्वीकार करता है, पर प्रशासनिक प्रवृत्ति नियंत्रण केंद्रित करती है।

कार्यात्मक तर्क: विकेंद्रीकरण क्यों आवश्यक है?

  • भारत का आकार और विविधता समान नीति को सीमित बनाते हैं।
  • भाषा, पारिस्थितिकी, श्रम बाजार और विकास स्तर में क्षेत्रीय भिन्नताएँ लचीले समाधान की मांग करती हैं।
  • विकेंद्रीकरण से नीति-प्रयोग, विफलता का सीमांकन और सफलता की पुनरावृत्ति संभव होती है।
  • कई सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम राज्य-स्तरीय पहल से शुरू हुए।
  • पोषण, साक्षरता और रोजगार गारंटी योजनाओं में क्षेत्रीय नवाचार ने व्यापक नीति को दिशा दी।
  • अति-केंद्रीकरण इस अनुकूलनशील सीखने को दबा देता है।

आगे की राह: पुनर्संतुलन, विघटन नहीं

  • संघ और राज्यों का संबंध शून्य-योग (Zero-Sum) प्रतियोगिता नहीं है।
  • राज्यों को मजबूत करने से संघ कमजोर नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्रीय कार्यों पर अधिक केंद्रित हो सकता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रित अधिकार और क्षेत्रीय स्वायत्तता का संयोजन प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक वैधता दोनों को बढ़ाता है।

निष्कर्ष

  • भारत उस चरण में पहुँच चुका है जहाँ केंद्रीकरण अपने मूल उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता।
  • शक्तियों का संतुलित पुनर्वितरण उत्तरदायित्व और जवाबदेही को सुदृढ़ करेगा।
  • एक सशक्त केंद्र और विश्वसनीय राज्य मिलकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हैं।
  • स्थायी एकता नियंत्रण से नहीं, बल्कि भागीदारी, सहयोग और संतुलित संवैधानिक अभ्यास से उत्पन्न होती है।

 


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