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संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन (UN Peacekeeping Missions)

शांति स्थापना के मूलभूत सिद्धांत एवं पहले

संयुक्त राष्ट्र के समकालीन शांति अभियानों का उद्देश्य केवल शांति और सुरक्षा बनाए रखना नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक व्यापक है। इन अभियानों का लक्ष्य राजनीतिक प्रक्रिया को सुगम बनाना, नागरिकों की रक्षा करना, पूर्व लड़ाकों के निरस्त्रीकरण, विमुद्रीकरण और पुनः एकीकरण में सहायता करना, चुनावों के आयोजन का समर्थन करना, मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन करना तथा कानून के शासन को पुनः स्थापित करना भी है।

संयुक्त राष्ट्र शांति सेना संघर्षग्रस्त देशों को स्थायी शांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करने में सहयोग प्रदान करती है। शांति स्थापना, मेजबान देशों को संघर्ष से शांति की ओर कठिन मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के पास उपलब्ध सबसे प्रभावी साधनों में से एक सिद्ध हुई है।

शांति स्थापना के मूलभूत सिद्धांत

संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना तीन बुनियादी सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होती है:

  1. पक्षों की सहमति – शांति अभियानों की सफलता के लिए संघर्षरत पक्षों की सहमति आवश्यक है।
  2. निष्पक्षता – संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करते, बल्कि निष्पक्ष रहते हैं।
  3. बल का प्रयोग करना – आत्मरक्षा और अधिदेश की रक्षा के अतिरिक्त बल प्रयोग की अनुमति नहीं है।

शांति अभियानों की सफलता की कोई निश्चित गारंटी नहीं होती, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र शांति सेना लगभग हमेशा ही शारीरिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य करती है। इसके बावजूद, अपने 60 वर्षों के अस्तित्व में संयुक्त राष्ट्र ने सफलता का एक ठोस रिकॉर्ड स्थापित किया है। इस उपलब्धि में नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करना भी शामिल है, जो इसकी वैश्विक भूमिका और योगदान का प्रमाण है।

शांति स्थापना सदैव अत्यधिक गतिशील रही है और समय के साथ नई चुनौतियों के अनुरूप विकसित होती रही है। पूर्व महासचिव बान की मून ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों की वर्तमान स्थिति और भविष्य की आवश्यकताओं का व्यापक मूल्यांकन करने हेतु 17-सदस्यीय उच्च-स्तरीय स्वतंत्र पैनल का गठन किया था।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा चलाये गये शांति स्थापना मिशन

UNTSO (United Nations Truce Supervision Organization) – 1948 से वर्तमान

यह संयुक्त राष्ट्र का पहला शांति स्थापना मिशन था। इसे अरब-इज़राइल युद्ध के बाद मध्य पूर्व में युद्धविराम की निगरानी हेतु स्थापित किया गया। इसका मुख्य कार्य युद्धविराम समझौतों की पुष्टि करना, संघर्षरत पक्षों के बीच संवाद बनाए रखना और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना था। UNTSO ने दशकों तक इज़राइल, फिलिस्तीन, लेबनान और सीरिया में शांति प्रयासों को समर्थन दिया। यद्यपि यह केवल पर्यवेक्षक मिशन है और इसके पास सैन्य हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है, फिर भी यह मध्य पूर्व में संयुक्त राष्ट्र की उपस्थिति का प्रतीक है।

UNMOGIP (United Nations Military Observer Group in India and Pakistan) – 1949 से वर्तमान

भारत-पाकिस्तान युद्ध (1947–48) के बाद यह मिशन जम्मू-कश्मीर में युद्धविराम की निगरानी हेतु स्थापित किया गया। इसका कार्य नियंत्रण रेखा (LoC) पर संघर्ष विराम उल्लंघनों की रिपोर्ट करना और दोनों देशों के बीच शांति बनाए रखने में सहयोग करना है। समय के साथ इसकी भूमिका सीमित हो गई है, क्योंकि भारत इसे अप्रासंगिक मानता है, जबकि पाकिस्तान इसकी उपस्थिति को महत्व देता है। यह मिशन दक्षिण एशिया में संयुक्त राष्ट्र की शांति स्थापना की जटिलताओं को दर्शाता है।

UNEF I (First United Nations Emergency Force) – 1956–1967

यह मिशन स्वेज संकट के बाद तैनात किया गया था। जब इज़राइल, ब्रिटेन और फ्रांस ने मिस्र पर आक्रमण किया, तब UNEF I ने सेनाओं की वापसी सुनिश्चित की और इज़राइल-मिस्र सीमा पर शांति बनाए रखी। यह मिशन संयुक्त राष्ट्र की पहली बड़ी सैन्य तैनाती थी, जिसने यह दिखाया कि UN केवल पर्यवेक्षक ही नहीं बल्कि सक्रिय शांति रक्षक भी हो सकता है।

UNDOF (United Nations Disengagement Observer Force) – 1974 से वर्तमान

योम किप्पुर युद्ध (1973) के बाद इज़राइल और सीरिया के बीच युद्धविराम की निगरानी हेतु UNDOF स्थापित किया गया। इसका कार्य गोलन हाइट्स क्षेत्र में दोनों पक्षों द्वारा समझौते के उल्लंघन को रोकना है। यह मिशन आज भी सक्रिय है और मध्य पूर्व में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

UNIFIL (United Nations Interim Force in Lebanon) – 1978 से वर्तमान

इज़राइल द्वारा लेबनान पर आक्रमण के बाद UNIFIL को तैनात किया गया। इसका उद्देश्य इज़राइल की वापसी सुनिश्चित करना, लेबनान सरकार को अपनी संप्रभुता बढ़ाने में सहायता करना और क्षेत्र में शांति बहाल करना था। समय के साथ इस मिशन ने मानवीय सहायता और नागरिक सुरक्षा में भी योगदान दिया।

UNIIMOG (United Nations Iran-Iraq Military Observer Group) – 1988–1991

ईरान-इराक युद्ध (1980–1988) के बाद युद्धविराम की निगरानी हेतु यह मिशन स्थापित किया गया। इसका कार्य सेनाओं की वापसी की पुष्टि करना और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना था। यह मिशन सफलतापूर्वक अपने उद्देश्य को पूरा कर समाप्त हुआ।

MINURSO (United Nations Mission for the Referendum in Western Sahara) – 1991 से वर्तमान

पश्चिमी सहारा में जनमत संग्रह कराने हेतु MINURSO की स्थापना हुई थी, ताकि यह तय किया जा सके कि क्षेत्र मोरक्को के साथ रहेगा या स्वतंत्र होगा। किंतु राजनीतिक विवादों के कारण जनमत संग्रह अब तक नहीं हो पाया। यह मिशन अफ्रीका में अधूरी शांति प्रक्रिया का उदाहरण है।

UNTAC (United Nations Transitional Authority in Cambodia) – 1992–1993

कंबोडिया में दशकों तक चले संघर्ष और नरसंहार के बाद UNTAC को स्थापित किया गया। इसका कार्य गुटों को निरस्त्र करना, लोकतांत्रिक चुनाव कराना और स्थिरता सुनिश्चित करना था। इसने 1993 में कंबोडिया के पहले स्वतंत्र चुनाव सफलतापूर्वक कराए।

UNPROFOR (United Nations Protection Force) – 1992–1995

यूगोस्लाविया के विघटन के बाद बोस्निया और क्रोएशिया में जातीय संघर्ष को नियंत्रित करने हेतु UNPROFOR तैनात किया गया। इसका उद्देश्य मानवीय सहायता प्रदान करना और नागरिक क्षेत्रों की रक्षा करना था। किंतु यह स्नेब्रेनिका नरसंहार (1995) को रोकने में विफल रहा, जो संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों की सबसे बड़ी असफलताओं में गिना जाता है।

UNOSOM I & II (United Nations Operation in Somalia) – 1992–1995

सोमालिया में गृहयुद्ध और अकाल के दौरान UNOSOM I को भोजन और चिकित्सा सहायता हेतु भेजा गया। बाद में UNOSOM II को सैन्य कार्रवाई के साथ तैनात किया गया, ताकि युद्ध सरदारों को निरस्त्र किया जा सके। किंतु “ब्लैक हॉक डाउन” घटना (1993) जैसी विफलताओं के कारण यह मिशन समाप्त हो गया।

UNAMIR (United Nations Assistance Mission for Rwanda) – 1993–1996

रवांडा में हुतु और तुत्सी समुदायों के बीच जातीय संघर्ष के दौरान UNAMIR तैनात किया गया। 1994 में हुए नरसंहार में लगभग 8 लाख लोग मारे गए। UNAMIR को नरसंहार रोकने में विफलता के लिए आलोचना झेलनी पड़ी, किंतु बाद में इसने शरणार्थियों की सहायता और नई सरकार को समर्थन दिया।

ONUMOZ (United Nations Operation in Mozambique) – 1992–1994

मोज़ाम्बिक में 16 वर्षों तक चले गृहयुद्ध के बाद शांति समझौते के तहत ONUMOZ तैनात किया गया। इसका कार्य लड़ाकों को निरस्त्र करना, चुनाव कराना और पुनर्निर्माण में सहायता करना था। यह मिशन सफल रहा और आज मोज़ाम्बिक अपेक्षाकृत स्थिर है।

UNOMIG (United Nations Observer Mission in Georgia) – 1993–2009

सोवियत संघ के विघटन के बाद जॉर्जिया और अबखाज़िया के बीच संघर्ष को नियंत्रित करने हेतु UNOMIG स्थापित किया गया। इसका कार्य युद्धविराम की निगरानी करना था। किंतु 2008 के रूस-जॉर्जिया युद्ध के बाद यह मिशन समाप्त कर दिया गया।

UNMIBH (United Nations Mission in Bosnia and Herzegovina) – 1995–2002

बोस्नियाई युद्ध के बाद UNMIBH को कानून-व्यवस्था स्थापित करने, पुलिस बलों को प्रशिक्षित करने और डेटन शांति समझौते को लागू करने हेतु तैनात किया गया। इसने बोस्निया की संस्थाओं के पुनर्निर्माण और स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

UNTAES (United Nations Transitional Administration for Eastern Slavonia, Baranja, and Western Sirmium) – 1996–1998

यह मिशन क्रोएशिया के पूर्वी क्षेत्रों में शांति बहाल करने और प्रशासनिक संक्रमण सुनिश्चित करने हेतु स्थापित किया गया। इसका कार्य स्थानीय प्रशासन को पुनर्गठित करना, शरणार्थियों की वापसी सुनिश्चित करना और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना था।

निष्कर्ष 

शांति स्थापना अभियानों की विशिष्ट शक्तियाँ इन्हें अद्वितीय बनाती हैं। इनमें वैधता, दायित्व का साझा वहन, विश्वभर से सैनिकों और पुलिस बलों की तैनाती और उन्हें बनाए रखने की क्षमता शामिल है। साथ ही, इन अभियानों में बहुआयामी जनादेश को आगे बढ़ाने के लिए सैन्य और पुलिस बलों को नागरिक शांति सैनिकों के साथ एकीकृत किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक न केवल सुरक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि राजनीतिक और शांति निर्माण सहायता भी उपलब्ध कराते हैं, जिससे संघर्षग्रस्त देशों को शांति की ओर तीव्र और कठिन संक्रमण में मदद मिलती है।

 


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