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संयुक्त राष्ट्र संघ को खत्म कर देना चाहिए?

इतिहास में कुछ संस्थाएँ ऐसी होती हैं जो मानवता के सर्वोत्तम स्वप्नों की उपज होती हैं — वे आदर्शों की धरातल पर खड़ी होती हैं, परन्तु यथार्थ की कठोर चट्टानों से टकराकर अपनी चमक खोने लगती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसी ही एक संस्था है। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की राख से उपजी यह संस्था आज अपने अस्तित्व के सात दशकों से अधिक समय बाद भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ी है। जब रूस यूक्रेन पर बम बरसाता है, जब गाजा की गलियों में बच्चे दम तोड़ते हैं, जब ईरान और इज़रायल के बीच मिसाइलें आकाश को चीरती हैं तब संयुक्त राष्ट्र की भूमिका महज़ एक मूक दर्शक की-सी प्रतीत होती है। तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या इस संस्था की उपयोगिता समाप्त हो गई है? क्या यह केवल एक भव्य भवन, कुछ प्रस्तावों और नपुंसक भाषणों का संग्रह मात्र रह गया है?

राष्ट्र संघ से संयुक्त राष्ट्र तक: 

संयुक्त राष्ट्र संघ की कहानी समझने के लिए हमें उसके पूर्वज राष्ट्र संघ (League of Nations) के पास जाना होगा। प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) की भीषण विभीषिका ने विश्व को झकझोर दिया था। करोड़ों जीवन नष्ट हो गए थे, सभ्यताएँ धूल में मिल गई थीं। इसी पीड़ा से उपजा था अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन का वह स्वप्न एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था जो युद्ध को सदा के लिए असंभव बना दे। 1920 में राष्ट्र संघ की स्थापना हुई, परन्तु विडंबना यह थी कि जिस अमेरिका के राष्ट्रपति ने इसकी नींव रखी, उसकी सीनेट ने इसमें सदस्यता लेने से ही इनकार कर दिया।

राष्ट्र संघ का पतन उसकी संरचनागत दुर्बलताओं का प्रमाण था। जब 1931 में जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण किया, जब 1935 में इटली ने इथियोपिया को रौंदा, जब हिटलर का जर्मनी एक-एक देश को निगलता चला गया तब राष्ट्र संघ की असहायता स्पष्ट हो गई। वह निंदा प्रस्ताव तो पारित कर सकता था, परन्तु आक्रांता को रोकने की न इच्छाशक्ति थी, न सामर्थ्य। 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ होते ही राष्ट्र संघ का औपचारिक अवसान हो गया।

इस भयावह इतिहास से सीख लेते हुए 1945 में सैन फ्रांसिस्को में 51 देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किए। उद्देश्य था भावी पीढ़ियों को युद्ध के अभिशाप से मुक्त करना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, और अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाए रखना। परन्तु क्या इतिहास ने स्वयं को दोहराया नहीं?

शीतयुद्ध का दौर:

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के साथ ही विश्व दो शक्ति-गुटों में बँट गया अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गुट और सोवियत संघ के नेतृत्व में पूर्वी गुट। सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार जो पाँच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, सोवियत संघ/रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन) को प्राप्त था,यही संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी संरचनागत कमज़ोरी बन गया। जब भी कोई महत्त्वपूर्ण विषय आया, दोनों महाशक्तियों ने अपने हितों की रक्षा में वीटो का खुलकर उपयोग किया।

1950 का कोरिया युद्ध इसका पहला बड़ा परीक्षण था। उस समय सोवियत संघ सुरक्षा परिषद की बैठकों का बहिष्कार कर रहा था, जिसके कारण अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य हस्तक्षेप संभव हो पाया, परन्तु यह संयुक्त राष्ट्र की सफलता कम, एक संयोग अधिक था। 1956 में सुएज़ संकट, 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट, 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध आदि इन सभी में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका सीमित और प्रभावहीन रही। वियतनाम में लाखों लोग मारे गए, अफगानिस्तान में सोवियत टैंक घुसे और संयुक्त राष्ट्र केवल प्रस्ताव पारित करता रहा।

शीतयुद्ध के बाद: नई आशाएँ और नई निराशाएँ

  • 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद एक क्षण ऐसा आया जब लगा कि संयुक्त राष्ट्र अपनी वास्तविक भूमिका निभा सकेगा। 1990-91 में खाड़ी युद्ध के दौरान सुरक्षा परिषद ने इराक के विरुद्ध बल प्रयोग को अधिकृत किया,यह पहली बार था जब महाशक्तियाँ किसी मुद्दे पर एकजुट हुईं। परन्तु यह एकता क्षणिक थी।
  • 1994 में रवांडा नरसंहार संयुक्त राष्ट्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बना। मात्र 100 दिनों में 8 लाख से अधिक तुत्सी जनजाति के लोगों का नृशंस हत्याकांड हुआ। संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षक वहाँ उपस्थित थे, परन्तु उन्हें हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी गई। बाद में महासचिव कोफी अन्नान ने स्वयं इसे संस्था की “सबसे बड़ी विफलता” स्वीकार किया।
  • इसी दौरान बोस्निया में स्रेब्रेनिका नरसंहार (1995) हुआ जहाँ संयुक्त राष्ट्र द्वारा “सुरक्षित क्षेत्र” घोषित स्थान पर 8,000 से अधिक बोस्नियाई मुसलमानों की हत्या कर दी गई वह भी शांतिरक्षकों की उपस्थिति में। यह न केवल एक मानवीय त्रासदी थी, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की साख पर एक ऐसा दाग था जो आज भी नहीं मिटा।

इक्कीसवीं सदी: एकध्रुवीयता और संस्थागत संकट

  • 2003 में इराक युद्ध संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व पर सबसे बड़ा प्रहार था। अमेरिका और ब्रिटेन ने सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना इराक पर आक्रमण कर दिया। तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान ने इसे “अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन” कहा, परन्तु इससे अधिक वे कुछ न कर सके। यह स्पष्ट हो गया कि शक्तिशाली देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र का चार्टर केवल सुविधानुसार उपयोग की जाने वाली वस्तु है।
  • 2011 में सीरिया में गृहयुद्ध आरंभ हुआ। पाँच लाख से अधिक लोग मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए। सुरक्षा परिषद में रूस और चीन ने बार-बार वीटो का उपयोग करते हुए किसी भी प्रभावी कार्रवाई को रोका। फिर से एक बार संयुक्त राष्ट्र की बैठकें होती रहीं, प्रस्ताव तैयार होते रहे, भाषण दिए जाते रहे और सीरिया जलता रहा।

यूक्रेन और गाजा: 

  • फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर पूर्णकालिक आक्रमण किया। सुरक्षा परिषद ने तत्काल बैठक बुलाई, परन्तु रूस के वीटो ने हर प्रस्ताव को धराशायी कर दिया। महासभा ने भारी बहुमत से रूस की निंदा करने वाला प्रस्ताव पारित किया परन्तु महासभा के प्रस्तावों में बाध्यकारी शक्ति नहीं होती। यूक्रेन में युद्ध आज भी जारी है और संयुक्त राष्ट्र एक बार फिर असहाय दर्शक की भूमिका में है।
  • गाजा संकट ने तो इस संस्था की सीमाओं को और भी उजागर कर दिया। अक्टूबर 2023 से आरंभ हुए इज़रायल-हमास युद्ध में हज़ारों नागरिकों की मृत्यु हुई। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने युद्धविराम की अपील की, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने मानवीय संकट की चेतावनी दी परन्तु अमेरिका ने इज़रायल के विरुद्ध प्रत्येक प्रस्ताव को वीटो कर दिया। इसके साथ ही ईरान-इज़रायल-अमेरिका के बीच का तनाव एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की आशंका उत्पन्न कर रहा है और संयुक्त राष्ट्र की स्थिति उस मूक साक्षी जैसी है जो घटनाओं को घटते देखता रहता है।आज अमेरिका जैसी प्रमुख शक्ति ने तो एक कदम आगे बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र से बाहर अलग “बोर्ड ऑफ पीस” तक बना डाला,जोकि इसके अंत की शुरुआत का प्रतीक बन सकता है।

संस्था की उपलब्धियाँ:

यहाँ रुककर हमें संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों का भी निष्पक्ष मूल्यांकन करना होगा, क्योंकि केवल विफलताओं की गणना न्यायसंगत नहीं होगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के माध्यम से चेचक का उन्मूलन, पोलियो के विरुद्ध वैश्विक अभियान, और कोविड-19 महामारी के दौरान अंतर्राष्ट्रीय समन्वय, ये उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। UNICEF ने करोड़ों बच्चों को कुपोषण और बीमारियों से बचाया है। UNHCR ने विश्वभर में शरणार्थियों की सहायता की है। परमाणु अप्रसार संधि, रासायनिक हथियार सम्मेलन, जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौता आदि ये सब उन वैश्विक ढाँचों का हिस्सा हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र की छत्रछाया में संभव बनाया गया। यह भी विचारणीय है कि 1945 के बाद से दो महाशक्तियों के बीच सीधा युद्ध नहीं हुआ, इसमें परमाणु निरोध के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक संस्थाओं का भी अप्रत्यक्ष योगदान है।

संरचनागत दोष: समस्या की जड़

  • संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या इसकी संरचना में निहित है। वीटो व्यवस्था मूलतः 1945 की शक्ति-राजनीति का प्रतिबिंब है। आज का विश्व उस विश्व से बिल्कुल भिन्न है, फिर भी वही पाँच देश जो द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता थे वही वैश्विक निर्णयों पर एकाधिकार रखते हैं। भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, जापान जैसी बड़ी शक्तियाँ स्थायी सदस्यता से वंचित हैं। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के डेढ़ अरब से अधिक लोगों का सुरक्षा परिषद में कोई स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं।
  • दूसरी बड़ी समस्या है वित्तीय निर्भरता। संयुक्त राष्ट्र का बजट मुख्यतः सदस्य देशों के अंशदान पर निर्भर है। अमेरिका, चीन और कुछ यूरोपीय देश सर्वाधिक योगदान करते हैं और वे इस वित्तीय शक्ति का उपयोग संस्था पर दबाव डालने के लिए करते हैं।
  • तीसरा दोष है सैन्य शक्ति का अभाव संयुक्त राष्ट्र के पास अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है। शांतिरक्षक बल पूर्णतः सदस्य देशों की इच्छा पर निर्भर है।

क्या संयुक्त राष्ट्र को भंग कर देना चाहिए?

यह प्रश्न जितना आकर्षक लगता है, उसका उत्तर उतना ही जटिल है। भंग करने के पक्षधर कहते हैं कि यह संस्था न केवल युद्धों को रोकने में विफल रही है, बल्कि कभी-कभी आक्रांताओं को वैधता प्रदान करने का मंच बन जाती है। इसकी नौकरशाही अत्यंत भारी-भरकम और व्ययसाध्य है। वीटो व्यवस्था के कारण यह संस्था उन्हीं देशों की बंधक है जिनके आचरण को नियंत्रित करने के लिए इसे बनाया गया था।

परन्तु इसके विरुद्ध तर्क और भी सशक्त हैं। यदि संयुक्त राष्ट्र न हो, तो क्या होगा? क्या राष्ट्र संघ की विफलता के बाद जो शून्य उत्पन्न हुआ था ,जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध को संभव बनाया वह दोहराया नहीं जाएगा? परमाणु हथियारों के इस युग में यदि संवाद का कोई माध्यम न हो, तो विकल्प केवल सीधा टकराव होगा।

सुधार की आवश्यकता: आगे का मार्ग

संयुक्त राष्ट्र को न तो भंग करना व्यावहारिक है, न उसे यथास्थिति में रखना उचित। आवश्यकता है आमूलचूल सुधार की। सुरक्षा परिषद का विस्तार और वीटो व्यवस्था में संशोधन अथवा वीटो के उपयोग पर प्रतिबंधात्मक शर्तें लगाना ही सबसे पहली आवश्यकता है। भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान और अफ्रीका के प्रतिनिधि देश को स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए। मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में “संरक्षण की ज़िम्मेदारी” (Responsibility to Protect) के सिद्धांत को वास्तविक रूप से लागू करने की व्यवस्था होनी चाहिए और संस्था को वित्तीय स्वायत्तता दी जानी चाहिए।

दंतहीन व्याघ्र या अपरिहार्य संस्था?

संयुक्त राष्ट्र एक दंतहीन व्याघ्र अवश्य है, परन्तु यह व्याघ्र पूर्णतः निरर्थक नहीं है। मानवता के इतिहास में पहली बार एक ऐसी संस्था अस्तित्व में है जो विश्व के सभी देशों को एक छत के नीचे लाती है, जहाँ कोई भी देश चाहे वह कितना भी छोटा हो अपनी बात रख सकता है। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

आलोचना उचित है, परन्तु यह स्मरण रखना होगा कि संयुक्त राष्ट्र अपने सदस्य देशों से अधिक शक्तिशाली नहीं हो सकता। यह संस्था उतनी ही प्रभावशाली होगी जितनी इच्छाशक्ति उसके सदस्य देश उसे प्रदान करेंगे। समस्या संस्था में नहीं, उसे संचालित करने वाले देशों की स्वार्थपूर्ण राजनीति में है।

इज़रायल-ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा की तबाही ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि विश्व को आज संयुक्त राष्ट्र की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है परन्तु एक सुधरे, पुनर्जीवित और सशक्त संयुक्त राष्ट्र की। इसे भंग करना उस जलते घर में पानी की जगह तेल डालने जैसा होगा।

मानव सभ्यता ने बड़ी कठिनाई से यह सीखा है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। इस ज्ञान को संस्थागत रूप देने का प्रयास चाहे वह कितना भी अपूर्ण हो सदा मूल्यवान रहेगा। संयुक्त राष्ट्र को समाप्त नहीं, रूपांतरित करने की आवश्यकता है एक ऐसी संस्था में जो 1945 के नहीं, 21वीं सदी के विश्व की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे।


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