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संविधानवाद : लोकतंत्र, सत्ता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन

लोकतंत्र केवल चुनावों और बहुमत के शासन तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सत्ता का प्रयोग कानून, नैतिकता और संस्थागत नियंत्रणों के अंतर्गत किया जाता है। इसी संदर्भ में संविधानवाद का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। संविधानवाद वह सिद्धांत है जो यह सुनिश्चित करता है कि राज्य की सत्ता संविधान द्वारा सीमित हो, विधि के शासन का पालन हो तथा नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें। इस प्रकार संविधानवाद लोकतंत्र को निरंकुशता में बदलने से रोकने वाला सबसे प्रभावी वैचारिक और संस्थागत साधन है।

संविधान और संविधानवाद में मूलभूत अंतर को समझना आवश्यक है। संविधान एक लिखित या अलिखित दस्तावेज हो सकता है, जबकि संविधानवाद एक जीवंत मूल्य-प्रणाली है। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ देशों के पास लिखित संविधान तो थे, किंतु सत्ता पर प्रभावी नियंत्रण न होने के कारण वहाँ तानाशाही शासन स्थापित हो गया। अतः यह स्पष्ट है कि संविधान का होना पर्याप्त नहीं है; उसका संवैधानिक आचरण में रूपांतरण ही संविधानवाद है।

संविधानवाद की ऐतिहासिक जड़ें सत्ता के निरंकुश प्रयोग के विरुद्ध संघर्ष में निहित हैं। 1215 की मैग्ना कार्टा को आधुनिक संविधानवाद की पहली अभिव्यक्ति माना जाता है, जिसने राजा की शक्तियों पर कानूनी सीमाएँ निर्धारित कीं। इसके बाद इंग्लैंड की गौरवशाली क्रांति, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम और फ्रांसीसी क्रांति ने यह स्थापित किया कि सत्ता का स्रोत जनता है और उसका प्रयोग जनता के अधिकारों के संरक्षण हेतु होना चाहिए। जॉन लॉक ने सीमित सरकार और प्राकृतिक अधिकारों की अवधारणा प्रस्तुत की, जबकि मॉन्टेस्क्यू ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को विकसित किया। इन विचारों ने संविधानवाद को एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया।

संविधानवाद का पहला और केंद्रीय तत्व सीमित सरकार है। इसके अनुसार सरकार की शक्तियाँ न तो असीमित होती हैं और न ही स्वेच्छाचारी। संविधान यह निर्धारित करता है कि सरकार क्या कर सकती है और किन सीमाओं के भीतर कर सकती है। लोकतंत्र में बहुमत को शासन का अधिकार होता है, परंतु संविधानवाद यह सुनिश्चित करता है कि बहुमत के नाम पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन न हो। इस प्रकार संविधानवाद लोकतंत्र को बहुमत के अत्याचार से बचाता है।

संविधानवाद का दूसरा महत्वपूर्ण आधार संविधान की सर्वोच्चता है। इसका अर्थ है कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है और सभी राज्य संस्थाएँ—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—इसके अधीन कार्य करती हैं। कोई भी कानून, नीति या कार्य यदि संविधान के विपरीत है, तो उसे अमान्य घोषित किया जा सकता है। यह सिद्धांत शासन को मनमाने निर्णयों से बचाता है और राजनीतिक सत्ता को नैतिक तथा कानूनी अनुशासन में बाँधता है।

विधि का शासन (Rule of Law) संविधानवाद का तीसरा स्तंभ है। ए. वी. डायसी के अनुसार विधि का शासन का अर्थ है कानून की सर्वोच्चता, कानून के समक्ष समानता और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा। संविधानवाद के अंतर्गत कानून शासकों और शासितों—दोनों पर समान रूप से लागू होता है। कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून से ऊपर नहीं होती। यह सिद्धांत लोकतांत्रिक शासन को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाता है।

संविधानवाद का चौथा प्रमुख पक्ष है मौलिक अधिकारों की सुरक्षा। संविधान नागरिकों को केवल राजनीतिक अधिकार ही नहीं, बल्कि जीवन, गरिमा और स्वतंत्रता से जुड़े मूल अधिकार भी प्रदान करता है। संविधानवाद यह सुनिश्चित करता है कि राज्य इन अधिकारों का सम्मान करे और यदि उनका उल्लंघन होता है, तो नागरिकों के पास न्याय पाने के प्रभावी साधन हों। इस संदर्भ में स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक समीक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

शक्तियों का पृथक्करण और संतुलन (Checks and Balances) संविधानवाद को व्यवहारिक रूप प्रदान करता है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है। यदि ये सभी शक्तियाँ एक ही संस्था या व्यक्ति में केंद्रित हो जाएँ, तो सत्ता का दुरुपयोग निश्चित है। संविधानवाद संस्थागत संतुलन के माध्यम से स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

भारतीय संविधान संविधानवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारत का संविधान केवल शासन की संरचना निर्धारित नहीं करता, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को साकार करने का प्रयास करता है। संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधानवाद की आत्मा है। मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य—तीनों मिलकर एक संतुलित और मानव-केंद्रित शासन व्यवस्था की नींव रखते हैं।

भारतीय न्यायपालिका ने संविधानवाद को सुदृढ़ करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। केशवानंद भारती वाद (1973) में प्रतिपादित मूल संरचना सिद्धांत ने यह स्पष्ट कर दिया कि संसद भी संविधान की मूल आत्मा को नष्ट नहीं कर सकती। न्यायिक समीक्षा के माध्यम से न्यायपालिका न केवल संविधान की व्याख्या करती है, बल्कि उसे संरक्षित भी करती है। इस प्रकार भारतीय संविधानवाद केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी सशक्त है।

फिर भी, व्यवहार में संविधानवाद को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कार्यपालिका की बढ़ती शक्तियाँ, अध्यादेशों का बार-बार प्रयोग, संस्थाओं की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न, तथा कभी-कभी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर मौलिक अधिकारों पर सीमाएँ—ये सभी संविधानवाद की परीक्षा लेते हैं। डिजिटल युग में निजता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की निगरानी शक्तियों के बीच संतुलन बनाना भी एक नई चुनौती के रूप में उभरा है।

संविधानवाद केवल राज्य की जिम्मेदारी नहीं है; यह नागरिकों की संवैधानिक चेतना पर भी निर्भर करता है। जागरूक नागरिक, स्वतंत्र मीडिया, सशक्त नागरिक समाज और नैतिक राजनीति संविधानवाद को जीवंत बनाए रखते हैं। जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग होते हैं, तब संविधानवाद एक सामाजिक संस्कृति का रूप ले लेता है।

निष्कर्षतः, संविधानवाद वह सिद्धांत है जो संविधान को एक जीवित दस्तावेज बनाता है। यह सत्ता को सीमित कर स्वतंत्रता की रक्षा करता है और शासन को नैतिक व कानूनी आधार प्रदान करता है। एक सुदृढ़ लोकतंत्र के लिए संविधान का होना आवश्यक है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है संविधानवाद का प्रभावी पालन। वास्तव में, संविधान राष्ट्र की संरचना है और संविधानवाद उसकी आत्मा। जब तक यह आत्मा जीवित है, तब तक लोकतंत्र न केवल सुरक्षित रहेगा, बल्कि निरंतर विकसित भी होता रहेगा।


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