- A.K. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950)
स्वतंत्र भारत का पहला संवैधानिक मामला, जिसमें ए.के. गोपालन को “निवारक निरोध अधिनियम” के अंतर्गत हिरासत में लिया गया था। उन्होंने दावा किया कि यह उनके मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19, 21 और 22) का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का पालन किया गया है तो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। इस निर्णय ने अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या की बाद में मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने इसे व्यापक बनाया।
- शंकारी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)
यह मामला पहले संविधान संशोधन (1951) की वैधता से जुड़ा था। प्रश्न था क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है? न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368 संसद को ऐसा करने का अधिकार देता है और “संविधान संशोधन” एक “कानून” नहीं है, अतः यह अनुच्छेद 13 के अंतर्गत नहीं आता। इस निर्णय ने संसद की शक्ति को सर्वोच्च ठहराया, पर बाद में यह सिद्धांत गोलकनाथ केस (1967) में चुनौती दी गई।
- बेरुबारी यूनियन मामला (1960)
भारत और पाकिस्तान के बीच क्षेत्रीय सीमा विवाद में, भारत सरकार ने बेरुबारी क्षेत्र का कुछ भाग पाकिस्तान को सौंपने का प्रस्ताव रखा। प्रश्न उठा कि क्या संसद अनुच्छेद 3 के तहत ऐसा कर सकती है? न्यायालय ने कहा नहीं, इसके लिए संविधान संशोधन आवश्यक है। इस निर्णय के बाद 9वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1960) पारित हुआ, जिससे इस समझौते को संवैधानिक वैधता मिली।
- गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)
गोलकनाथ परिवार ने भूमि सीमा अधिनियम को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि यह उनके संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती; इसके लिए एक नई संविधान सभा चाहिए। इसने संसद की शक्ति पर पहली बार संवैधानिक अंकुश लगाया।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
यह भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे प्रसिद्ध मामला है। केरल के एक मठ के प्रमुख ने भूमि अधिग्रहण कानून को चुनौती दी। प्रश्न था क्या संसद संविधान के किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है? 13 जजों की बेंच ने 7:6 के बहुमत से निर्णय दिया कि संसद संविधान को संशोधित कर सकती है, लेकिन “संविधान के मूल ढाँचे” (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती। यही सिद्धांत आज भारतीय संविधान की रीढ़ है।
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975)
1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध ठहराया। संसद ने तत्काल 39वाँ संशोधन पारित कर अनुच्छेद 329-A जोड़ा जिससे प्रधानमंत्री के चुनाव पर न्यायालय की समीक्षा वर्जित की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया। इसने “न्यायिक समीक्षा” को संविधान के मूल अंग के रूप में पुनः स्थापित किया।
- हैबियस कॉर्पस केस (ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला, 1976)
आपातकाल (1975–77) के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता निलंबित कर दी गई थी। न्यायालय के बहुमत ने कहा कि आपातकाल के समय मौलिक अधिकार स्थगित हो सकते हैं। केवल न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने असहमति व्यक्त की और कहा कि जीवन का अधिकार निरस्त नहीं किया जा सकता। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सबसे विवादास्पद रहा।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978)
सरकार ने मेनका गांधी का पासपोर्ट बिना कारण जब्त किया। उन्होंने अनुच्छेद 21 का हवाला देकर चुनौती दी। न्यायालय ने कहा “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” में विदेश यात्रा का अधिकार भी शामिल है और ऐसा कोई भी कानून “न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत” होना चाहिए। इस निर्णय ने मौलिक अधिकारों की आपसी परस्परता को स्थापित किया।
- मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
यह मामला 42वें संविधान संशोधन की सीमाओं पर आधारित था। अदालत ने कहा कि संसद संविधान को नष्ट करने वाली शक्ति नहीं रखती। “मूल ढाँचा सिद्धांत” को दोहराया गया और स्पष्ट किया गया कि संविधान सर्वोच्च है, न कि संसद।
- वामनराव बनाम भारत संघ (1981)
इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती केस (24 अप्रैल 1973) को एक “सीमा तिथि” माना और कहा कि इस तिथि से पहले 9वीं अनुसूची में जोड़े गए कानूनों की वैधता नहीं बदली जाएगी, लेकिन इसके बाद के कानून “मूल ढाँचे” की कसौटी पर जांचे जा सकते हैं।
- शाह बानो बेगम बनाम भारत संघ (1985)
तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाह बानो ने भरण-पोषण की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने CrPC की धारा 125 लागू करते हुए कहा कि हर महिला को भरण-पोषण का अधिकार है, चाहे धर्म कोई भी हो। यह निर्णय मुस्लिम महिला अधिकारों की दिशा में मील का पत्थर बना, लेकिन राजनीतिक दबाव में 1986 में “मुस्लिम महिला (तलाक पर संरक्षण) अधिनियम” पारित कर इसे पलट दिया गया।
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1986)
दिल्ली के श्रीराम फर्टिलाइज़र प्लांट गैस लीक हादसे पर दायर याचिका में न्यायालय ने कहा कि खतरनाक उद्योग “पूर्ण दायित्व सिद्धांत” (Absolute Liability) के तहत उत्तरदायी हैं। मुआवजा उद्योग की क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। यह भारत में पर्यावरणीय कानून का आरंभिक स्तंभ बना।
- इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992)
मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत सरकारी नौकरियों में OBC के लिए 27% आरक्षण लागू किया गया, जिसे चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को वैध ठहराया लेकिन कुछ सीमाएँ तय कीं — कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होगा, “क्रीमी लेयर” बाहर रहेगी, और प्रमोशन में आरक्षण नहीं दिया जाएगा। यह निर्णय सामाजिक न्याय और मेरिट के बीच संतुलन का प्रतीक बना।
- एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
कई राज्यों में राजनीतिक कारणों से राष्ट्रपति शासन लगाए जाने पर यह मामला आया। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग केवल “संवैधानिक तर्क” पर आधारित होना चाहिए, राजनीतिक कारणों से नहीं। इससे संघीय ढाँचे की सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
- विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997)
एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता के यौन उत्पीड़न के बाद दायर याचिका में अदालत ने कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए “विशाखा दिशानिर्देश” जारी किए। ये दिशानिर्देश तब तक कानून माने गए जब तक संसद ने POSH Act, 2013 पारित नहीं किया।
- समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997)
आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में निजी खनन लीज़ देने पर यह मामला आया। अदालत ने निर्णय दिया कि ऐसी भूमि केवल सरकार या आदिवासी सहकारी समितियों को दी जा सकती है। इस निर्णय ने आदिवासी अधिकारों को मजबूती दी।
- एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ (1997)
यह मामला न्यायाधिकरणों के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 और 226 के तहत उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को दी गई न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति संविधान के “मूल ढाँचे” का हिस्सा है।
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000)
इस मामले में प्रश्न था क्या कोई हिंदू पुरुष धर्म परिवर्तन करके दूसरी शादी कर सकता है? न्यायालय ने कहा कि पहली शादी को खत्म किए बिना दूसरी शादी अवैध है, चाहे व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन ही क्यों न किया हो।
- आई.आर. कोहेलो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007)
यह निर्णय कहता है कि 9वीं अनुसूची में डाले गए कानून भी न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगे यदि वे संविधान के मूल ढाँचे का उल्लंघन करते हैं। इसने न्यायिक समीक्षा को सर्वोच्च बनाया।
- अरुणा शानबाग मामला (2011)
नर्स अरुणा शानबाग 42 वर्षों तक कोमा में रहीं। सुप्रीम कोर्ट ने “निष्क्रिय इच्छामृत्यु” (Passive Euthanasia) को सशर्त अनुमति दी। यह “सम्मानपूर्वक मृत्यु के अधिकार” की दिशा में पहला कदम था।
- NOTA निर्णय (2013)
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सुधार हेतु अदालत ने मतदाताओं को “None of the Above” (NOTA) का विकल्प देने का निर्देश दिया। इससे मतदाता को असंतोष प्रकट करने का संवैधानिक साधन मिला।
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013)
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी सांसद या विधायक को 2 वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाएगी। यह राजनीतिक शुचिता के लिए ऐतिहासिक फैसला था।
- निर्भया केस (2014)
2012 के दिल्ली गैंगरेप के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दोषियों को मृत्युदंड की पुष्टि की। इस केस के परिणामस्वरूप आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 पारित हुआ, जिसने बलात्कार की परिभाषा और दंड दोनों को कठोर बनाया।
- राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) बनाम भारत संघ (2014)
इस निर्णय में ट्रांसजेंडर समुदाय को “तीसरा लिंग” मान्यता दी गई और सरकार को शिक्षा, रोजगार और आरक्षण में समान अवसर देने का आदेश दिया गया। यह लैंगिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय था।
- के.एस. पुट्टुस्वामी बनाम भारत संघ (2017)
Aadhaar डेटा के संदर्भ में यह प्रश्न उठा कि क्या निजता एक मौलिक अधिकार है। नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि “निजता” अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। इसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की व्याख्या को नई ऊँचाई दी।
- धारा 377 मामला (2018)
समान लिंग के दो वयस्कों के सहमति से संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया। इसने LGBTQ समुदाय को समानता और गरिमा का संवैधानिक अधिकार दिया।
निष्कर्ष
इन सभी निर्णयों की कड़ी भारतीय लोकतंत्र, विधि-शासन और मानवाधिकारों के विकास की कहानी कहती है।
A.K. गोपालन से पुट्टुस्वामी तक, न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों के अर्थ को सीमाओं से निकालकर मानव गरिमा के केंद्र में स्थापित किया।
यह श्रृंखला दर्शाती है कि संविधान एक “जीवंत दस्तावेज़” है, जो हर न्यायिक व्याख्या के साथ विकसित होता है।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

