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संविधान में मूल संरचना सिद्धांत: संशोधन शक्ति और संविधान निर्माता शक्ति

‘Today’s Promise, Tomorrow’s Constitution’ – सत्य प्रतीक, 2008

भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो समय और परिस्थितियों के अनुसार विकसित होता रहा है। इस विकास की प्रक्रिया में संविधान संशोधन की शक्ति एक केंद्रीय भूमिका निभाती है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह शक्ति असीम है? क्या संसद संविधान में संशोधन करते हुए उसकी आत्मा को भी समाप्त कर सकती है?
इन्हीं मूलभूत प्रश्नों का उत्तर मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)’ देता है, जिसे भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने केसवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में प्रतिपादित किया।

यह लेख सत्य प्रतीक (2008) द्वारा लिखित शोध लेख ‘Today’s Promise, Tomorrow’s Constitution’ के आधार पर मूल संरचना सिद्धांत के दार्शनिक, संवैधानिक और संस्थागत पहलुओं का विश्लेषण करता है ।

मूल संरचना सिद्धांत की उत्पत्ति

  • केसवानंद भारती वाद से पूर्व यह विवाद बना हुआ था कि संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान में संशोधन की कितनी व्यापक शक्ति प्राप्त है।
  • गोलकनाथ वाद (1967) में सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को संशोधन से परे बताया था, परंतु यह दृष्टिकोण अत्यधिक कठोर माना गया।
  • केसवानंद भारती निर्णय में न्यायालय ने एक मध्य मार्ग अपनाया और यह सिद्धांत स्थापित किया कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। यहीं से मूल संरचना सिद्धांत का जन्म हुआ ।

मूल संरचनाका आशय

‘मूल संरचना’ कोई निश्चित सूची नहीं है, बल्कि यह संविधान की पहचान (identity) को दर्शाने वाले मूल तत्वों का समूह है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • संविधान की सर्वोच्चता
  • लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था
  • विधि का शासन
  • शक्तियों का पृथक्करण
  • न्यायिक समीक्षा
  • मौलिक अधिकारों का सार

ये तत्व संविधान की आत्मा हैं और इन्हें समाप्त करना संविधान को ही निष्प्रभावी बना देगा ।

संशोधन शक्ति बनाम संविधान निर्माता शक्ति

सत्य प्रतीक इस लेख में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करते हैं:

  • संशोधन शक्ति (Amending Power)
  • संविधान निर्माता शक्ति (Constituent Power)

संशोधन शक्ति बनाम संविधान निर्माता शक्ति के संदर्भ में सत्य प्रतीक यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय संविधान में संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत जो शक्ति प्रदान की गई है, वह केवल संशोधन शक्ति (Amending Power) है, न कि संविधान निर्माता शक्ति (Constituent Power)

संशोधन शक्ति का अर्थ है संविधान के प्रावधानों में सुधार, परिवर्तन या समायोजन करना, ताकि संविधान समय और परिस्थितियों के अनुरूप कार्यशील बना रहे; जबकि संविधान निर्माता शक्ति वह सर्वोच्च शक्ति है जिसके माध्यम से नया संविधान बनाया जाता है या संपूर्ण संवैधानिक ढाँचे को समाप्त कर नई व्यवस्था स्थापित की जाती है।

भारतीय संसद ने कई बार अनुच्छेद 368 की संशोधन शक्ति को असीम मानते हुए उसे संविधान निर्माता शक्ति की तरह प्रयोग करने का प्रयास किया है, जो लोकतांत्रिक वैधता के सिद्धांत के विपरीत है, क्योंकि संसद स्वयं संविधान की उपज है और वह अपने ही स्रोत से ऊपर नहीं हो सकती। ऐसे में यदि संसद को असीम शक्ति मान ली जाए, तो संविधान की पहचान, लोकतांत्रिक स्वरूप और नागरिक स्वतंत्रताएँ खतरे में पड़ सकती हैं। मूल संरचना सिद्धांत इसी भ्रम को तोड़ता है और यह सुनिश्चित करता है कि संविधान में परिवर्तन की प्रक्रिया स्वयं संविधान के अधीन रहे, अर्थात् संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन उसकी मूल संरचना या आत्मा को नष्ट नहीं कर सकती।

Nagaraj और Coelho: सिद्धांत का विकास

  1. Nagaraj (2006) और I.R. Coelho (2007) के निर्णयों को मूल संरचना सिद्धांत के विकास में एक नई दिशा बताया गया है।

इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि:

  • केवल संशोधन का रूप नहीं, बल्कि उसका प्रभाव देखा जाएगा
  • संशोधन संविधान की पहचान को नुकसान पहुँचाता है या नहीं, यह निर्णायक होगा

इससे मूल संरचना समीक्षा अधिक तर्कसंगत, संतुलित और उत्तरदायी बनी ।

न्यायपालिका, संसद और संवैधानिक लोकतंत्र

लेखक का निष्कर्ष है कि मूल संरचना सिद्धांत:

  • न्यायपालिका को निरंकुश नहीं बनाता
  • संसद की लोकतांत्रिक भूमिका को नकारता नहीं
  • बल्कि दोनों संस्थाओं के बीच संवैधानिक संतुलन (constitutional balance) स्थापित करता है

यह सिद्धांत तभी वैध बना रह सकता है जब न्यायपालिका संयम बरते और संसद संवैधानिक नैतिकता का सम्मान करे ।

निष्कर्ष

मूल संरचना सिद्धांत भारतीय संविधान का सबसे स्थायी और महत्वपूर्ण योगदान है। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि संविधान में परिवर्तन लोकतंत्र को सुदृढ़ करे, न कि उसे नष्ट करे।
सत्य प्रतीक के अनुसार, यह सिद्धांत भविष्य में भी भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा करता रहेगा यदि इसे दार्शनिक स्पष्टता और संस्थागत उत्तरदायित्व के साथ लागू किया जाए ।

 


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