in , ,

सब्सटैंटिव मोशन

राहुल गांधी की सदस्यता पर प्रश्न चिन्ह 

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा हाल ही में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया वह सब्सटैंटिव मोशन जिसका उद्देश्य कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने और उन पर लंबे समय तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग करना है, भारतीय संसदीय परम्परा और संवैधानिक सीमाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना बनकर उभरा है। समाचार कवरेज के अनुसार यह एक पारंपरिक विधेयक नहीं बल्कि संसदीय कार्रवाई के रूप में एक प्रस्तावित कदम है जिसे सदन में चर्चा और सम्भवत: मतदान के लिए रखा जा सकता है; इस कदम ने विपक्ष और सरकार के बीच तीखी राजनीतिक बहस को जन्म दिया है और यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता परिदृश्य में कई संवैधानिक और नीतिगत प्रश्न खड़े करता है।

सब्सटैंटिव मोशन:परिभाषा और संसदीय अर्थ

सब्सटैंटिव मोशन संसद में पेश किया जाने वाला एक सशक्त और निर्णायक प्रस्ताव होता है, जिसका उद्देश्य सदन की आधिकारिक राय प्रदर्शित करना, किसी सदस्य के व्यवहार की निंदा करना, या किसी विशेष कार्रवाई की सिफारिश कराना होता है। यह बिल (law-making) की श्रेणी में नहीं आता; इसके पास सीधे कानून बनाने की शक्ति नहीं होती, परन्तु यदि सदन में बहुमत से पारित हो जाए तो वह राजनीतिक और पारंपरिक रूप में अत्यधिक पवित्र माना जाता है और उसके परिणाम स्वरूप सदन संबंधित कारवाई (जैसे निंदा, निलंबन, अथवा विशेष मामलों में निष्कासन) अपना सकता है। सब्सटैंटिव मोशन का इस्तेमाल संसद ने इतिहास में कई बार किया है—अविश्वास प्रस्ताव, विशेषाधिकार से जुड़ी कार्रवाइयाँ और किसी सदस्य के खिलाफ अनुशासनात्मक कदम इसी विधा के उदाहरण हैं। इन पहलुओं का व्याख्यान और प्रक्रिया संबंधी विवरण मीडिया तथा संसदीय विशेषज्ञों ने विस्तार से समझाया है।

संवैधानिक और वैधानिक आधार

किसी सांसद की सदस्यता रद्द करना या निष्कासन संविधान और विधान के रूप में स्पष्ट नियमों के अनुरूप होना चाहिए। भारतीय संवैधानिक ढांचे में प्रमुख प्रावधानों में अनुच्छेद 101 और 102 आते हैं जो सदस्यता की शर्तें और अयोग्यता के आधार निर्दिष्ट करते हैं। इसके अतिरिक्त जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और सदन के अपने नियम — विशेषकर संसदीय विशेषाधिकारों और अनुशासन से संबन्धित प्रावधान — निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि संसद का अपने सदस्यों पर अनुशासनात्मक अधिकार मौजूद है, परन्तु वह अधिकार भी संवैधानिक दायरे में बँधा हुआ है और न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह दूर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़े मामलों में संसदीय कार्रवाइयों की संवैधानिक वैधता की सीमा स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि संसदीय कार्यवाही से किसी के मौलिक अधिकारों का अनुचित आक्रमण होता है या प्रक्रियात्मक अनियमितता सिद्ध होती है तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।

ऐतिहासिक उदाहरण

भारतीय संसदीय इतिहास में सदस्यों के निष्कासन या सदस्यता समाप्ति के कुछ प्रसिद्ध उदाहरण मौजूद हैं, जिनका सर्वाधिक प्रासंगिक संदर्भ 2005 के “कैश-फॉर-क्वेरी” स्कैंडल में 11 सांसदों के निष्कासन का है। उस घटना में स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर आरोप लगे और पार्लियामेंट ने सदन के विशेषाधिकारों के आधार पर कठोर कार्रवाई की; बाद में इस मामले ने न्यायालयों में भी मुकदमों और बहसों को जन्म दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बाद के आरंभिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया कि संसद के विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए लिए गए कारवाई पर न्यायपालिका की समीक्षा संभव है यदि प्रक्रियात्मक या संवैधानिक उल्लंघन का आरोप ठोस हो। रजा राम पाल बनाम स्पीकर (raja ram pal v. hon’ble speaker, lok sabha & ors., 2007) जैसा सुप्रीम कोर्ट का निर्णय संसदीय कार्यवाही और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने वाला उदाहरण है, जिसमें न्यायालय ने संसद की स्वतन्त्रता की सराहना करते हुए यह भी कहा कि संसद की कार्रवाइयाँ पूर्णरूपेण बहिष्करण से बाहर नहीं हैं और यदि विधिकारों/प्रक्रियाओं का अपव्यवहार हुआ तो उनके खिलाफ न्यायिक चेक-एंड-बैलेंस काम करेगा। इन ऐतिहासिक प्रसंगों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सदन के पास कठोर कदम उठाने का अधिकार है, परन्तु उसके लिए संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है।

ब्रिटेन और अमेरिका में समकक्ष परिप्रेक्ष्य

ब्रिटिश संसदीय परम्परा में हाउस ऑफ कॉमन्स के पास किसी सदस्य को निलंबित या निष्कासित करने के ऐतिहासिक अधिकार हैं; यह अधिकार पार्लियामेंट के “house privileges” और अंदरुनी अनुशासन के सिद्धांतों पर आधारित है। परन्तु यहाँ भी निष्कासन दुर्लभ और असाधारण कदम माना जाता है और इसके प्रयोग पर परंपरागत संवेदनशीलता दिखाई देती है। इर्स्काइन मे (erskine may) जैसे संसदीय मार्गदर्शकों में इन शक्तियों का विवेचन मौजूद है, और आधुनिक संदर्भों में कई बार स्पीकर तथा स्टैंडिंग कमेटीज़ ने बाहरूनी मामलों और कोर्ट के फैसलों के बीच तालमेल बनाए रखने का रुझान लिया है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में संविधान के तहत सदस्य को निष्कासित करने का अधिकार स्पष्ट रूप से निहित है; ऐतिहासिक दृष्टि से सदन ने दीर्घकाल में अनेक अवसरों पर सदस्यों को दोषसिद्ध होने पर निष्कासित किया है। उदाहरण के लिए 2002 में ओहायो के प्रतिनिधि जेम्स ट्राफिकेंट को संघीय दोष सिद्धि के बाद हाउस से निष्कासित किया गया — यह दर्शाता है कि अमेरिका में न्यायिक अभियोग और संसदीय बनाम अलग-अलग प्रक्रियाएँ कैसे एक-दूसरे के साथ जुड़ती हैं। इन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से सिखने योग्य यह है कि लोकतंत्रों में सदस्यों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई पर परंपरा-निर्धारित संवैधानिकता, कार्रवाई की पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा का संतुलन जरूरी होता है।

भारतीय न्यायपालिका की टिप्पणी

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय विशेषाधिकारों और सदन की कार्रवाई के विषय में कई मौकों पर रेखा आरेख प्रस्तुत किए हैं। रजा राम पाल केस में, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संसद लोकतांत्रिक संस्था होने के बावजूद संविधान के दायरे में बँधी हुई है और यदि संसद की किसी कार्रवाई में संवैधानिक विसंगति पाई जाती है तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि सदन द्वारा उठाए गए निर्णयों की वैधता पर न्यायालयी समीक्षा तभी होगी जब वह निर्णय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या संवैधानिक प्रक्रियाओं के गंभीर अपव्यूह से जुड़ा हो। अतः किसी सब्सटैंटिव मोशन के आधार पर सदस्यता रद्दीकरण की माँग तब ही अंतिम और टिकाऊ मानी जाएगी जब वह संवैधानिक मानकों और प्रक्रियात्मक न्याय का पालन कर पाए।

इस प्रस्ताव के व्यापक आयाम

निसंदेह, किसी प्रभावशाली विपक्षी नेता की सदस्यता रद्द करने का प्रस्ताव लोकतांत्रिक बहस का महत्वपूर्ण मोड़ है। एक ओर यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि किसी सांसद ने जानबूझकर देशविरोधी गतिविधियों का समर्थन किया हो या संवैधानिक व्यवस्था को खोखला किया हो तो सदन को कार्रवाई करने का अधिकार है। दूसरी ओर यह भी सच है कि विपक्ष की भूमिका सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना है और उस भूमिका को शक्तिशाली भाषण-स्वतन्त्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार की आवश्यकता होती है। इसलिए ऐसे प्रस्तावों का असर केवल व्यक्तिगत राजनीतिक परिणामों पर नहीं, बल्कि संसद के मूलभूत कार्य-क्षेत्र, विपक्षी आवाजों की क्षमता और आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी पड़ता है। कार्रवाई की वैधता और न्यायिक समीक्षा का संतुलन, पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रक्रिया — यही ऐसे मामलों में निर्णायक मानदंड होने चाहिए।

निष्कर्ष

निशिकांत दुबे द्वारा पेश किया गया सब्सटैंटिव मोशन संसदीय राजनीति का एक कठोर उपकरण है; परन्तु इसका निर्णायक प्रभाव तभी साकार होगा जब संसदीय प्रक्रिया, कानून और संवैधानिक मानदंडों का पूरा पालन होगा। इतिहास और न्यायालयीन प्रथा से स्पष्ट है कि संसद के पास कठोर कदम उठाने का अधिकार है, पर वह अधिकार निरपेक्ष नहीं है; न्यायपालिका की समीक्षा तथा प्रक्रियागत निष्पक्षता अनिवार्य रूप से बनी रहती है। लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में बेहतर यह होगा कि ऐसी संवेदनशील कार्रवाइयाँ पारदर्शी जांच, स्वतंत्र तंत्रों और खुले बहस के माध्यम से हों — ताकि राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता के साथ-साथ संवैधानिक स्थिरता और नागरिक अधिकारों की रक्षा भी सुचारु रूप से सुनिश्चित रहे। यदि यह मामला सदन में आगे बढ़ता है, तो उसका निर्णय केवल एक व्यक्तिगत मुद्दा नहीं होगा, बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र की पराकाष्ठा और परिभाषा पर एक महत्वपूर्ण परीक्षण होगा।


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

अमेरिका–बांग्लादेश ‘कपास समझौता: भारत के वस्त्र एवं कपास क्षेत्र के लिए चुनौतियाँ

लोकसभा स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव: प्रक्रिया और निहितार्थ