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सोमालिलैंड पर इज़राइल-चीन टकराव: अफ्रीका के हॉर्न में भू-राजनीतिक दबाव

अफ्रीका का हॉर्न (HoA), लाल सागर

दिसंबर 2025 में इज़राइल द्वारा सोमालिलैंड को एक संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता देने का निर्णय अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ है। यह कदम क्षेत्रीय प्रॉक्सी प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा सकता है, राजनीतिक और आर्थिक दबाव उत्पन्न कर सकता है, और रणनीतिक रूप से संवेदनशील लाल सागर (Red Sea) क्षेत्र में सैन्यीकरण को गहरा कर सकता है।
1991 में सोमालिया से अलग होकर बने सोमालीलैंड को 34 वर्षों बाद किसी देश की औपचारिक मान्यता मिली है, वह भी ऐसे देश से जो रणनीतिक दृष्टि से दूरदर्शी और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब लाल सागर से अरब सागर तक समुद्री मार्ग हूती हमलों, वैश्विक शिपिंग अवरोध और चीन–तुर्की–ईरान की बढ़ती गतिविधियों के कारण अस्थिर हैं।

इज़राइल की इस मान्यता ने एक लंबे समय से हाशिए पर पड़े क्षेत्र सोमालिलैंड को वैश्विक शक्ति-संघर्ष के केंद्र में ला दिया है, और चीन को एक जटिल रणनीतिक दुविधा में डाल दिया है, जहाँ उसे संप्रभुता सिद्धांत, क्षेत्रीय सुरक्षा, और अफ्रीका में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

अफ्रीका का हॉर्न (HoA)

  • अफ्रीका का हॉर्न (HoA), जिसे सोमाली प्रायद्वीप के नाम से भी जाना जाता है, पूर्वी अफ्रीका का एक प्रमुख प्रायद्वीप और अत्यंत महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र है। भौगोलिक दृष्टि से यह अफ्रीकी महाद्वीप का सबसे पूर्वी विस्तार है और विश्व का चौथा सबसे बड़ा प्रायद्वीप माना जाता है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से सोमालीलैंड, सोमालिया, जिबूती, इथियोपिया और इरिट्रिया शामिल हैं, हालांकि कुछ व्यापक परिभाषाओं में केन्या और सूडान के कुछ हिस्सों या पूरे क्षेत्र को भी सम्मिलित किया जाता है।

  • अफ्रीका के हॉर्न का भूराजनीतिक महत्व इसके रणनीतिक समुद्री स्थान से उत्पन्न होता है यह लाल सागर की दक्षिणी सीमा से लगा हुआ है और अदन की खाड़ी, गार्डाफुई चैनल तथा पश्चिमी हिंद महासागर तक फैला हुआ है। इसके अलावा, यह अरब प्रायद्वीप के साथ समुद्री सीमाएँ साझा करता है, जिससे यह अफ्रीका और मध्य पूर्व के बीच पारस्परिक संबंधों का सेतु बनता है।
  • ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र समुद्री व्यापार, औपनिवेशिक विस्तार और वैश्विक सुरक्षा रणनीतियों का केंद्र रहा है। यही कारण है कि आज भी अफ्रीका का हॉर्न अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अंतरमहाद्वीपीय व्यापार मार्गों के संदर्भ में अपनी निरंतर प्रासंगिकता बनाए हुए है।

चीन की रणनीतिक दुविधा: सोमालिलैंड पर

चीन के लिए सोमालिलैंड तीन प्रमुख कारणों से महत्वपूर्ण है:

  1. “वन चाइना” सिद्धांत की रक्षा,
  2. लाल सागर व्यापार गलियारे की सुरक्षा,
  3. अफ्रीका में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का प्रबंधन।

सोमालीलैंड: अफ्रीका का डि फैक्टो लेकिन स्थिर राज्य

  • इज़राइल की सोमालीलैंड नीति केवल सुरक्षा चिंताओं तक सीमित नहीं है, यह पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में उसके प्रभाव विस्तार की रणनीति का हिस्सा है।
  • यमन के हूती ठिकानों, ईरान समर्थित तंत्रों और तुर्की की गतिविधियों पर निगरानी के लिए सोमालीलैंड एक आदर्श स्थान है।
  • Institute for National Security Studies (INSS) के विश्लेषण बताते हैं कि निकट भविष्य में इज़राइल वहां अपना खुफिया या सैन्य ढांचा विकसित कर सकता है जिससे लाल सागर और अदन की खाड़ी में उसका सामरिक दायरा और मज़बूत होगा।
  • जहाँ सोमालिया अब भी आतंकवाद और अल-शबाब की हिंसा से जूझ रहा है, वहीं सोमालीलैंड को पश्चिमी विश्लेषक “अफ्रीका का अनदेखा स्थिर द्वीप’ कह चुके हैं।

संप्रभुता पर आधिकारिक रुख

  • चीन ने इज़राइल की इस मान्यता की निंदा की है, इसे अलगाववाद को समर्थन करार देते हुए दोहराया है कि सोमालिलैंड सोमालिया का अविभाज्य हिस्सा है।
  • यह बीजिंग की उस परंपरागत नीति को दर्शाता है जो संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को सर्वोपरि रखती है।

हालाँकि सोमालिलैंड ने पिछले तीन दशकों में शांति, संस्थागत ढाँचा, और लोकतांत्रिक चुनाव कायम रखे हैं, जो सोमालिया की अस्थिरता से स्पष्ट रूप से विपरीत हैं।
यह स्थिति चीन की कठोर संप्रभुता आधारित राज्यत्व की नीति में अंतर्विरोध उजागर करती है।

  • 2020 में सोमालिलैंड ने ताइवान के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए, जिससे बीजिंग की “वन चाइना’ नीति को सीधा झटका लगा।
  • हर्गेसा (Hargeisa) में ताइवान का प्रतिनिधि कार्यालय और दोनों के बीच बढ़ता सहयोग सोमालिलैंड को अफ्रीका में एक दुर्लभ ताइपे समर्थक देश बना देता है, जिससे बीजिंग की चिंता बढ़ गई है।

चीन के लिए हॉर्न ऑफ अफ्रीका का रणनीतिक महत्व

महत्वपूर्ण समुद्री गला (Choke Point): बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (Bab el-Mandeb Strait) जो लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ता है। चीन की समुद्री रेशम मार्ग (Maritime Silk Road) परियोजना और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है। बीजिंग ने इसे “वैश्विक व्यापार की जीवन रेखा’ कहा है।

जिबूती में सुरक्षा उपस्थिति: 2017 में चीन ने जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित किया, जिससे इस रणनीतिक जलमार्ग के पास उसकी स्थायी सुरक्षा उपस्थिति बनी रही।

सोमालिलैंड की मान्यता से चुनौती: यदि सोमालिलैंड को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलती है, तो वह अदन की खाड़ी के किनारे एक वैकल्पिक लॉजिस्टिक और सुरक्षा केंद्र के रूप में उभर सकता है। जिसे यूएई और अमेरिका जैसे देश समर्थन दे सकते हैं। यह चीन के जिबूती केंद्रित प्रभाव को कमज़ोर कर सकता है।

असहज रणनीतिक संतुलन: चीन के लिए चुनौती यह है कि वह सोमालिलैंड की मान्यता का विरोध करे और ताइवान की कूटनीतिक पहुँच को सीमित रखे, लेकिन यदि उसने अत्यधिक दबाव डाला तो हर्गेसा और अधिक चीन-विरोधी गठजोड़ों की ओर झुक सकता है। ज़्यादा आक्रामकता चीन की गैर-हस्तक्षेपकारी साझेदार की छवि को भी नुकसान पहुँचा सकती है।

संभावित चीनी रणनीति

चीन संकर (Hybrid) दृष्टिकोण अपनाने की संभावना रखता है:

  • आर्थिक दबाव,
  • स्थानीय अभिजात वर्ग के साथ लॉबिंग, और
  • सूचना अभियान (जैसे StarTimes चैनल्स) के ज़रिए संप्रभुता की कथा को मज़बूत करना।

कूटनीतिक रूप से, बीजिंग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने प्रभाव का उपयोग कर सोमालिलैंड की अंतरराष्ट्रीय वैधता की गति को रोक सकता है।

इज़राइलफ़िलिस्तीन समीकरण से जटिलता

  • चीन की फ़िलिस्तीन समर्थक स्थिति और ग़ाज़ा में इज़राइल की नीतियों की आलोचना उसकी नैतिक विरोध को और प्रबल करती है। हालाँकि यह रुख अरब जगत और ग्लोबल साउथ में लोकप्रिय है, लेकिन इससे चीन की मध्य पूर्व में तटस्थता की पारंपरिक नीति और कठिन हो जाती है।
  • 2024 में इथियोपिया-सोमालिलैंड समझौते (जहाँ इथियोपिया ने बंदरगाह पहुँच के बदले मान्यता देने का वादा किया), अमेरिकी कांग्रेस की बढ़ती रुचि, और यूएई के अप्रत्यक्ष समर्थन से संकेत मिलता है कि इज़राइल का निर्णय अन्य देशों को भी सोमालिलैंड की मान्यता की दिशा में प्रेरित कर सकता है।

पाकिस्तान का विरोध: सिद्धांत नहीं, चयनात्मक राजनीति

  • पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में इज़राइल के कदम की निंदा करते हुए इसे “सोमालिया की संप्रभुता के खिलाफ’ बताया, परंतु उसका यह रुख सिद्धांत से अधिक राजनीतिक सुविधा से प्रेरित प्रतीत होता है।
  • POJK पर उसका अवैध कब्ज़ा, बलूचिस्तान में दमन, और उत्तरी साइप्रस या फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर दोहरे मानदंड पाकिस्तान के चयनात्मक नैतिकता को उजागर करते हैं। दरअसल, इस्लामी धुरी तुर्की, क़तर और ईरान से तालमेल बनाए रखने के लिए पाकिस्तान ने यह रुख अपनाया है।

भारत के सामने प्रश्न

  • समुद्री सुरक्षा और व्यापार का केंद्र: भारत का 90% समुद्री व्यापार हिंद महासागर और अदन की खाड़ी से होकर गुजरता है। सोमालीलैंड में स्थिरता और साझेदारी भारत की ऊर्जा व व्यापारिक सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।
  • चीन के String of Pearls’ का रणनीतिक जवाब: जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा पहले से मौजूद है।
    सोमालीलैंड भारत के लिए उस प्रभाव को संतुलित करने का भौगोलिक और रणनीतिक अवसर प्रदान करता है।
  • ‘SAGAR’ और Global South’ दृष्टिकोण को बल: भारत स्वयं को नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में स्थापित करना चाहता है।
    सोमालीलैंड के साथ सहयोग इस नीति को वास्तविक रूप दे सकता है।
  • अफ्रीका में भारत की विश्वसनीयता: भारत की “साझेदारी आधारित’ नीति जो चीन की “शोषणकारी आर्थिक उपस्थिति’ से अलग है, सोमालीलैंड जैसे स्थिर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीय छवि को और मजबूत कर सकती है।

चीन की स्थिति को चुनौती

  • हर नई मान्यता के साथ बीजिंग की स्थिति और कठिन होती जाएगी। क्योंकि यह उसके लिए न केवल संप्रभुता का सवाल है, बल्कि ताइवान की उपस्थिति, इज़राइल और पश्चिमी देशों की पहुँच, और जिबूती के समीप सुरक्षा तंत्र के पुनर्गठन का भी प्रश्न है।

निष्कर्ष

इज़राइल के निर्णय ने चीन को सिद्धांत और व्यवहार के बीच कठिन संतुलन में डाल दिया है।
सोमालिलैंड अब कूटनीतिक हाशिये पर नहीं है, यह वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा के केंद्र में है, जहाँ चीन की संप्रभुता, सुरक्षा, और प्रभाव की सीमाएँ स्पष्ट रूप से सामने आ गई हैं।

 

 


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