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स्वतंत्रता की अवधारणा और अर्थ

सिद्धांत,प्रकार और विचारकों का मत

स्वतंत्रता शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘Liber’ से हुई है, जिसका अर्थ है ‘बंधनों का अभाव’। प्रारंभिक उदारवादी विचारकों ने इसे इसी रूप में परिभाषित किया। हालांकि, आधुनिक युग में स्वतंत्रता को एक बहुआयामी अवधारणा के रूप में देखा जाता है। जहाँ एक ओर यह व्यक्ति की स्वायत्तता की रक्षा करती है, वहीं दूसरी ओर समाज में न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ तार्किक प्रतिबंधों की आवश्यकता पर भी बल देती है। स्वतंत्रता के दो मुख्य आयाम हैं—नकारात्मक और सकारात्मक। इन दोनों के बीच का अंतर राज्य की भूमिका और व्यक्ति की इच्छाशक्ति के आधार पर स्पष्ट होता है।

1- नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty)

नकारात्मक स्वतंत्रता का मूल विचार ‘अहस्तक्षेप’ (Non-interference) के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति के कार्यों के मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा का न होना। इस अवधारणा के समर्थकों का मानना है कि व्यक्ति अपनी भलाई का सबसे अच्छा निर्णायक स्वयं है, इसलिए राज्य या समाज को उसके निजी क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। नकारात्मक स्वतंत्रता उस क्षेत्र को परिभाषित करती है जहाँ व्यक्ति जो चाहे वह कर सके और कोई भी उसे रोक न सके।

1.1: नकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख आयाम

नकारात्मक स्वतंत्रता की धारणा में ‘क्षेत्र’ (Area) महत्वपूर्ण है। इसमें प्रश्न यह होता है कि “वह क्षेत्र क्या है जिसमें कर्ता बिना किसी हस्तक्षेप के कार्य कर सकता है?” शास्त्रीय उदारवादियों जैसे एडम स्मिथ और जेरेमी बेंथम ने तर्क दिया कि आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में राज्य का न्यूनतम हस्तक्षेप ही व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। उनके अनुसार, कानून स्वतंत्रता का विरोधी है क्योंकि प्रत्येक कानून व्यक्ति की पसंद को सीमित करता है।

1.2: प्रमुख विचारकों के दृष्टिकोण

  • जॉन स्टुअर्ट मिल (J.S. Mill): मिल को नकारात्मक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रतिपादक माना जाता है। अपनी पुस्तक ‘On Liberty’ (1859) में उन्होंने ‘स्व-विषयक’ (Self-regarding) और ‘पर-विषयक’ (Other-regarding) कार्यों के बीच अंतर स्पष्ट किया। मिल का तर्क है कि उन कार्यों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जिनका प्रभाव केवल व्यक्ति पर पड़ता है। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया और कहा कि यदि पूरी दुनिया एक तरफ हो और एक व्यक्ति एक तरफ, तो भी उस व्यक्ति को चुप कराने का अधिकार किसी को नहीं है।
  • फ्रेडरिक हायेक (F.A. Hayek): हायेक ने अपनी कृति ‘The Constitution of Liberty’ में स्वतंत्रता को ‘दूसरे की मनमानी इच्छा से मुक्ति’ के रूप में परिभाषित किया। वे मुक्त बाजार और कानून के शासन को स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त मानते हैं।
  • रॉबर्ट नोज़िक (Robert Nozick): समकालीन विचारकों में नोज़िक ने अपनी पुस्तक ‘Anarchy, State, and Utopia’ में स्वतंत्रता का बचाव करते हुए राज्य के ‘न्यूनतम’ (Minimal State) होने की वकालत की। उन्होंने व्यक्ति के आत्म-स्वामित्व (Self-ownership) के अधिकार को सर्वोपरि माना।
  • ईसा बर्लिन (Isaiah Berlin): बर्लिन ने अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘Two Concepts of Liberty’ (1958) में नकारात्मक स्वतंत्रता को ‘हस्तक्षेप के अभाव’ के रूप में स्पष्ट किया। उन्होंने तर्क दिया कि नकारात्मक स्वतंत्रता इस प्रश्न का उत्तर देती है कि “वह क्षेत्र क्या है जिसके भीतर किसी व्यक्ति को बिना दूसरों के हस्तक्षेप के रहने या करने दिया जाना चाहिए?”

2- सकारात्मक स्वतंत्रता (Positive Liberty)

सकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि स्वतंत्रता केवल बंधनों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों की उपस्थिति है जिनमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सके। यह “स्वयं का स्वामी होने” (Being one’s own master) की क्षमता पर बल देती है। सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थकों का तर्क है कि गरीबी, अज्ञानता और बीमारी जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक व्यक्ति की स्वतंत्रता में उतनी ही बड़ी बाधा हैं जितनी कि कानूनी प्रतिबंध।

2.1: सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख आयाम

सकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति की आंतरिक क्षमता और राज्य की कल्याणकारी भूमिका से जुड़ी है। इसमें प्रश्न यह होता है कि “वह क्या है या कौन है जो यह तय करता है कि कोई व्यक्ति यह बने या यह करे?” यह अवधारणा मानती है कि राज्य एक ‘आवश्यक बुराई’ नहीं बल्कि एक ‘नैतिक संस्था’ है जो व्यक्ति को स्वतंत्र बनाने में सहायता करती है।

2.2: प्रमुख विचारकों के दृष्टिकोण

  • टी.एच. ग्रीन (T.H. Green): ग्रीन ने सकारात्मक स्वतंत्रता को ‘कुछ करने या उपभोग करने की सकारात्मक शक्ति’ के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सौंदर्य का अर्थ केवल कुरूपता का अभाव नहीं है, उसी प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ केवल बंधनों का अभाव नहीं है। ग्रीन के अनुसार, स्वतंत्रता का अर्थ उन कार्यों को करने की क्षमता है जो करने योग्य हैं।
  • जी.डब्ल्यू.एफ. हीगल (G.W.F. Hegel): हीगल ने स्वतंत्रता को राज्य के कानूनों के पालन में देखा। उनके अनुसार, राज्य ‘पृथ्वी पर ईश्वर का अवतरण’ है और वास्तविक स्वतंत्रता केवल राज्य के भीतर ही संभव है।
  • जी.डी.एच. कोल और हेरोल्ड लास्की (Harold Laski): लास्की ने अपनी पुस्तक ‘A Grammar of Politics’ में तर्क दिया कि स्वतंत्रता उन सामाजिक परिस्थितियों का संरक्षण है जिनके बिना कोई भी व्यक्ति अपने सर्वोत्तम रूप को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने स्वतंत्रता को अधिकारों और समानता के साथ जोड़कर देखा।
  • अमर्त्य सेन (Amartya Sen): आधुनिक संदर्भ में, नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने स्वतंत्रता को ‘क्षमता’ (Capability) के रूप में देखा। उनकी ‘Development as Freedom’ की अवधारणा बताती है कि जब तक व्यक्ति के पास शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी, तब तक उसके लिए स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।

3- नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता के बीच वैचारिक द्वंद्व

नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता के बीच का संघर्ष राजनीतिक दर्शन का एक केंद्रीय विषय रहा है। जहाँ नकारात्मक स्वतंत्रता ‘प्रक्रियात्मक’ (Procedural) न्याय और व्यक्तिवाद पर जोर देती है, वहीं सकारात्मक स्वतंत्रता ‘तात्विक’ (Substantive) न्याय और सामाजिक कल्याण की बात करती है।

ईसा बर्लिन ने चेतावनी दी थी कि सकारात्मक स्वतंत्रता का विचार अक्सर अधिनायकवाद (Totalitarianism) की ओर ले जा सकता है। बर्लिन का तर्क था कि जब राज्य यह तय करने लगता है कि व्यक्ति के लिए ‘वास्तविक हित’ क्या है, तो वह व्यक्ति की वर्तमान इच्छाओं को कुचलकर उसे ‘स्वतंत्र’ बनाने के नाम पर जबरदस्ती कर सकता है। इसके विपरीत, नकारात्मक स्वतंत्रता के आलोचक जैसे चार्ल्स टेलर का तर्क है कि केवल बाधाओं का न होना पर्याप्त नहीं है; यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी इच्छाओं को पूरा करने के साधन ही नहीं हैं, तो वह औपचारिक रूप से स्वतंत्र होकर भी व्यावहारिक रूप से परतंत्र ही रहता है।

4- निष्कर्ष:

स्वतंत्रता की पूर्ण समझ के लिए इन दोनों आयामों का समन्वय आवश्यक है। एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में नकारात्मक स्वतंत्रता व्यक्ति को राज्य के दमन से बचाती है, जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता राज्य को नागरिकों के सशक्तिकरण के लिए प्रेरित करती है। समकालीन विमर्श में अब ‘स्वतंत्रता’ को ‘समानता’ और ‘न्याय’ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

स्वतंत्रता एक गतिशील अवधारणा है। जहाँ शास्त्रीय विचारकों ने इसे निजी संपत्ति और व्यक्तिवाद से जोड़ा, वहीं मार्क्सवादी विचारकों ने इसे आर्थिक शोषण से मुक्ति के रूप में देखा। अंततः, स्वतंत्रता का लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भय के अपनी विवेकपूर्ण क्षमताओं का अधिकतम उपयोग कर सके।

UPSC CIVIL SERVICES MAINS EXAM PYQ

  1. “नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ हस्तक्षेप का अभाव है, जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ आत्म-निर्णय है।” इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और ईसा बर्लिन के विचारों के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।(2020)
  2. “नकारात्मक स्वतंत्रता, सकारात्मक स्वतंत्रता की तुलना में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अधिक सुरक्षित गारंटी देती है।” टिप्पणी कीजिए। (2016)
  3. “स्वतंत्रता के सकारात्मक और नकारात्मक आयामों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। क्या आपको लगता है कि सकारात्मक स्वतंत्रता अनिवार्य रूप से सर्वाधिकारवाद (Totalitarianism) की ओर ले जाती है?” (2012)

UGC NET परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

1- “स्वतंत्रता का अर्थ उन कार्यों को करने और उपभोग करने की सकारात्मक शक्ति है, जो करने योग्य हैं।” यह कथन किसका है?

(a)जे.एस. मिल

(b)टी.एच. ग्रीन

(c)ईसा बर्लिन

(d)एडम स्मिथ

2- जे.एस. मिल ने अपनी पुस्तक ‘On Liberty’ में स्वतंत्रता के किन दो प्रकारों के बीच अंतर किया है?

(A) नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता

(B) स्व-विषयक और पर-विषयक कार्य

(C) आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता

(D) प्राकृतिक और वैधानिक स्वतंत्रताl

3- ईसा बर्लिन के अनुसार ‘सकारात्मक स्वतंत्रता’ का विचार खतरनाक क्यों हो सकता है?

(A) क्योंकि यह व्यक्ति को बहुत अधिक छूट देता है।

(B) क्योंकि यह राज्य को व्यक्ति की ‘वास्तविक इच्छा’ के नाम पर तानाशाही करने का अवसर दे सकता है।

(C) क्योंकि यह पूंजीवाद का समर्थन करता है।

(D) क्योंकि यह कानून के शासन के विरुद्ध है।


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