स्वतंत्रता की अवधारणा मानव समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इतिहास के हर दौर में दार्शनिकों और राजनीतिक विचारकों ने यह समझने की कोशिश की है कि स्वतंत्रता क्या है, इसकी सीमाएँ क्या होनी चाहिए और इसका व्यक्ति व समाज से क्या संबंध है। अलग-अलग समय और परिस्थितियों में स्वतंत्रता को अलग-अलग अर्थों में समझा गया। इसलिए स्वतंत्रता पर कोई एक समान दृष्टिकोण नहीं मिलता, बल्कि विभिन्न विचारकों के अलग-अलग विचार देखने को मिलते हैं।
John Locke के विचार
जॉन लॉक स्वतंत्रता के प्रमुख समर्थकों में माने जाते हैं और उन्हें उदारवाद का जनक कहा जाता है। उनके अनुसार मनुष्य जन्म से ही स्वतंत्र होता है। स्वतंत्रता मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार है, जिसे कोई भी सत्ता उससे छीन नहीं सकती। जॉन लॉक का मानना था कि मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में पूर्ण स्वतंत्रता का आनंद लेता है, लेकिन यह स्वतंत्रता नैतिक नियमों के अधीन होती है। उनके अनुसार जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति मनुष्य के मूल अधिकार हैं। राज्य का उद्देश्य इन अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें सीमित करना। यदि राज्य इन अधिकारों की रक्षा नहीं करता, तो जनता को सरकार बदलने का अधिकार है। जॉन लॉक के विचारों का प्रभाव अमेरिका के संविधान और आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
John Stuart Mill के विचार
जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ऑन लिबर्टी’ (1859) में स्वतंत्रता का विस्तार से समर्थन किया। उनके अनुसार स्वतंत्रता केवल व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है। मिल का मानना था कि समाज की उन्नति ज्ञान और विचारों के विकास पर निर्भर करती है। विचारों का विकास तभी संभव है, जब समाज मेंविचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक सीमित नहीं की जानी चाहिए, जब तक वह दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचा रहा हो। इसे ही उनका‘हानि सिद्धांत’ (Harm Principle) कहा जाता है।
मिल के अनुसार स्वतंत्रता व्यक्ति को आत्म-विकास का अवसर देती है और समाज को प्रगतिशील बनाती है।
Herbert Spencer के विचार
हर्बर्ट स्पेंसर नकारात्मक स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है। स्पेंसर का मानना था कि राज्य को स्वतंत्रता का विरोधी माना जाना चाहिए, इसलिए उन्होंने राज्य को ‘पुलिस-राज्य’ कहा।
उनके अनुसार राज्य का कार्य केवल दो ही होना चाहिए
इसके अलावा राज्य को व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। स्पेंसर का विचार था कि व्यक्ति स्वयं अपने हितों को बेहतर ढंग से समझ सकता है, इसलिए उसे अधिकतम स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
Isaiah Berlin के विचार
बर्लिन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Two Concepts of Liberty’ (1958)में स्वतंत्रता के दो प्रकार बताए नकारात्मक स्वतंत्रता और सकारात्मक स्वतंत्रता। बर्लिन ने नकारात्मक स्वतंत्रता का समर्थन किया। उनके अनुसार नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है “व्यक्ति को अपने विवेक के अनुसार कार्य करने से न रोका जाए।”
उनका मानना था कि राज्य का मुख्य कार्य केवल व्यक्ति की नकारात्मक स्वतंत्रता की रक्षा करना है।
वे सकारात्मक स्वतंत्रता को राज्य के हस्तक्षेप से जोड़ते थे और मानते थे कि यह व्यक्ति पर ज़बरदस्ती थोपे गए उद्देश्यों को जन्म देती है।
बर्लिन का यह भी मत था कि सकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा अक्सरसर्वसत्तावादी व्यवस्था को बढ़ावा देती है। इसलिए उन्होंने उदारवादी-व्यक्तिवादी सिद्धांत का समर्थन किया, जिसमें व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता सर्वोपरि होती है।
Crawford Brough Macpherson के विचार
क्रॉफर्ड मैकफर्सन ने बर्लिन की स्वतंत्रता की अवधारणा की आलोचना की। उनका कहना था कि बर्लिन की स्वतंत्रता की परिभाषा पूँजीवादी व्यवस्था को सही ठहराने का प्रयास है। मैकफर्सन के अनुसार बर्लिन की नकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा बहुत संकीर्ण और यांत्रिक है।
वे मानते थे कि केवल हस्तक्षेप की अनुपस्थिति ही स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि व्यक्ति की क्षमताओं का विकास भी स्वतंत्रता का आवश्यक भाग है।मैकफर्सन ने सकारात्मक स्वतंत्रता को मानव विकास से जोड़ा और कहा कि सच्ची स्वतंत्रता वही है, जो व्यक्ति को अपनी पूरी क्षमता को विकसित करने का अवसर दे।
फ्रेडरिक ऑगस्ट वॉन हेयक (Friedrich August Von Hayek)
एफ.ए. हेयक ऑस्ट्रियाई नव-उदारवादी अर्थशास्त्री थे। उन्होंने स्वतंत्रता को ‘वैयक्तिक स्वतंत्रता’ के रूप में पेश किया है। स्वतंत्रता के संदर्भ में इसकी नकारात्मक प्रकृति का पक्ष लिया है। उनका कथन है, मानव स्वतंत्रता तब प्राप्त करता है जब वह किसी भी निरंकुश इच्छा द्वारा विवश या बाध्य न हो। वैयक्तिक स्वतंत्रता की अवधारणा राजनीतिक स्वतंत्रता, आंतरिक स्वतंत्रता और शक्ति-रूपी स्वतंत्रता से अलग है। उनके अनुसार स्वतंत्रता की उचित परिभाषा ‘प्रतिबंधों का अभाव’ ही है व राज्य का उपयुक्त कार्य ‘प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना’ है। उनका मत था कि राज्य को ऐसे नियम, विधियाँ नहीं बनाने चाहिये, जिनका ध्येय स्वयं बाज़ार व्यवस्था को वितरणमूलक न्याय का साधन बना देना हो।
पुस्तकें: The Constitution of Liberty (1960), Law, Legislation and Liberty: Rules and Order (1973)
मिल्टन फ्रीडमैन (Milton Friedman)
मिल्टन फ्रीडमैन एक अमेरिकी अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने माना कि केवल पूंजीवाद के अंतर्गत ही स्वतंत्रता का विकास हुआ। इन्होंने स्पेंसर के तर्कों के आधार पर नकारात्मक स्वतंत्रता की संकल्पना का समर्थन किया।’राजनीतिक स्वतंत्रता’ (Political Liberty) से अर्थ है कि एक व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों द्वारा कुछ करने या न करने के लिये विवश न किया जा सके। उनके मतानुसार व्यक्तियों की वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता केवल पूंजीवादी व्यवस्था में संभव हो सकती है।
वे यह भी मानते थे कि पूंजीवाद व्यक्तियों के मध्य स्वेच्छा से लेन-देन को प्रोत्साहित करता है, जबकि समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्तियों को निर्धारित ढांचे के अंतर्गत स्वतंत्रता की तलाश करनी होती है। पूंजीवादी व्यवस्था राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति में सहायक है जबकि समाजवादी व्यवस्था बाधक है।
सी.बी. मैकफर्सन (C.B. MacPherson) ने अपनी कृति ‘Democratic Theory: Essays in Retrieval’ (1973) के अंतर्गत फ्रीडमैन (Friedman) की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति की सृजनात्मक स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।
जेराल्ड सी. मैकलम जूनियर (Gerald C. MacCallum Jr.)
फिलॉसफिकल रिव्यू’ में 1967 में प्रकाशित अपने लेख ‘Negative and Positive Freedom’ में स्वतंत्रता की व्याख्या की। उन्होंने कहा, नकारात्मक स्वतंत्रता वह स्थिति है जब व्यक्ति को अकेला छोड़ दिया जाए और सकारात्मक स्वतंत्रता की स्थिति वह है जब व्यक्ति को अपनी इच्छाओं को साकार करने के अवसर मिलें। उन्होंने स्वतंत्रता की संकल्पना की तीन तत्वों ‘कर्ता’ (Agent), ‘बाध्यता’ (Constraint) तथा ‘लक्ष्य’ (Goal) के रूप में व्यक्त किया है।
चार्ल्स टेलर (Charles Taylor)
चार्ल्स टेलर एक समुदायवादी विचारक हैं। टेलर ने अपने लेख ‘What’s Wrong with Negative Liberty’ के अंतर्गत स्वतंत्रता के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों के बारे में आइजिया बर्लिन के दृष्टिकोण की समीक्षा की है। उन्होंने उद्देश्यात्मक स्वतंत्रता का समर्थन किया, जहाँ कुछ स्वतंत्रताएँ अन्य से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।
चार्ल्स टेलर ने नकारात्मक स्वतंत्रता को अवसरवादी संकल्पना तथा सकारात्मक स्वतंत्रता को ‘अभ्यास की संकल्पना’ कहा। टेलर ने ‘समुदायवाद’ (Communitarianism) के महत्त्व को व्यक्त किया। सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल देते हुए टेलर ने कहा, “यदि व्यक्ति प्रस्तुत ‘अवसर’ के उपयोग के स्थान पर अपने समुदाय से संबंधित मूल्यों से मार्गदर्शन प्राप्त करेगा तो उसके लिये यथार्थ स्वतंत्रता के प्रयोग की संभावना बढ़ेगी।
ज्यों-जाक रूसो: “मनुष्य को स्वतंत्र होने के लिये विवश किया जा सकता है। (Man can be forced to be free). रूसो की स्वतंत्रता की संकल्पना बाध्यकारी स्वतंत्रता है। रूसो के अनुसार, व्यक्ति ‘सामान्य इच्छा’ (General Will) का पालन करते हुए यथार्थ स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है।
डी.डी. राफाएल (D.D. Raphael) ने अपनी पुस्तक ‘Problems of Political Philosophy’ (1976) में 4 ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है, जहाँ स्वतंत्रता पर कानूनी प्रतिबंध तर्कसंगत माने जा सकते हैं। अपराध के क्षेत्र, सिविल विवादों के क्षेत्र, आर्थिक नियंत्रण के क्षेत्र, समाज कल्याण की व्यवस्था के क्षेत्र में
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