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हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट और भारत की ऊर्जा रणनीति

होर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व/Strategic importance of the Strait of Hormuz

  • पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति में आई रुकावट ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है। इस संकट का सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
  • ऐसी स्थिति में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल के आयात को बढ़ाने पर विचार करना उसकी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व

  • हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकीर्ण समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।
  • यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग माना जाता है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
  • भारत के लिए इसका महत्व और भी अधिक है। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन इसी जलडमरूमध्य से होकर आता है, जो कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा है।
  • इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ता इसी मार्ग पर निर्भर हैं।

भारत की ऊर्जा निर्भरता

  • भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों का 88 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। गैस खपत का भी बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है।
  • ऐसे में यदि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर न केवल कच्चे तेल पर बल्कि एलपीजी और एलएनजी जैसी आवश्यक ऊर्जा आपूर्तियों पर भी पड़ता है।

एक व्यवहारिक विकल्प: रूसी तेल

  • हॉर्मुज़ संकट के बीच रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरा है।
  • एशियाई जलक्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में रूसी कच्चा तेल उपलब्ध है, जिसमें फ्लोटिंग स्टोरेज (समुद्र में संग्रहित तेल) भी शामिल है।
  • अनुमान है कि लगभग 10 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल एशियाई समुद्री क्षेत्रों में उपलब्ध है।
  • हाल के महीनों में भारत ने रूसी तेल आयात में कमी की थी, विशेषकर अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं के दौरान। फरवरी में रूस से आयात घटकर लगभग 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया था, जबकि 2025 में यह 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक था।
  • अब यह कमी भारत को आयात बढ़ाने का अवसर प्रदान कर रही है।

अल्पकालिक सुरक्षा कवच

  • भारत के पास तत्काल संकट से निपटने के लिए कुछ सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। भारतीय रिफाइनरियों के पास 10 दिनों से अधिक का कच्चे तेल का भंडार है, जबकि सामरिक पेट्रोलियम भंडार में लगभग एक सप्ताह की अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध है। इससे अल्पकालिक व्यवधान का प्रभाव कम किया जा सकता है।

भारत की वास्तविक चिंताऐ क्या है?

  • हालांकि कच्चे तेल के मामले में विकल्प उपलब्ध हैं, परंतु एलपीजी और एलएनजी के क्षेत्र में स्थिति अधिक संवेदनशील है।
  • भारत अपनी 80–85 प्रतिशत एलपीजी आवश्यकता आयात करता है, जो मुख्य रूप से खाड़ी देशों से आती है। एलपीजी के बड़े सामरिक भंडार उपलब्ध नहीं हैं, जिससे इसकी आपूर्ति व्यवधान के प्रति अधिक संवेदनशील है।
  • इसी प्रकार, भारत के लगभग 60 प्रतिशत एलएनजी आयात भी हॉर्मुज़ के माध्यम से आते हैं। यदि संकट लंबा खिंचता है, तो गैस आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।

जोखिम और संभावनाएं

  • विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज़ की दीर्घकालिक नाकेबंदी की संभावना कम है। फिर भी, यदि व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि और घरेलू ईंधन दरों पर दबाव बढ़ सकता है।
  • भारत के पास अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे अन्य स्रोतों से आयात बढ़ाने का विकल्प भी है, लेकिन निकटवर्ती समुद्री क्षेत्रों में उपलब्ध रूसी तेल तत्काल राहत प्रदान कर सकता है।

निष्कर्ष

  • हॉर्मुज़ संकट ने एक बार फिर भारत की ऊर्जा निर्भरता और रणनीतिक संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। रूस से आयात बढ़ाने का निर्णय केवल एक तात्कालिक उपाय नहीं, बल्कि एक व्यापक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
  • दीर्घकाल में भारत को ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, घरेलू उत्पादन में वृद्धि और नवीकरणीय ऊर्जा पर अधिक निवेश जैसे कदम उठाने होंगे। फिलहाल, संकट की इस घड़ी में रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार के रूप में उभर रहा है।

 


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