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बौद्ध धर्म के अगन्ना सुत्त (Agganna Sutta) में सामाजिक-राजनीतिक एवं दार्शनिक विश्लेषण

Socio-political and philosophical analysis in the Agganna Sutta of Buddhism

बौद्ध धर्म के सुत्त साहित्य में अगन्ना सुत्त (Agganna Sutta) एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह सुत्त न केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी गहन अर्थ रखता है। यह संवाद दीर्घनिकाय (Digha Nikaya) के अंतर्गत आता है, जो त्रिपिटक (Vinaya, Sutta, Abhidhamma) का प्रमुख भाग है।
गौतम बुद्ध ने इस सुत्त में जातिवाद, सामाजिक असमानता तथा राज्य की उत्पत्ति जैसे गूढ़ विषयों पर यथार्थवादी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।

पृष्ठभूमि

अगन्ना सुत्त का प्रसंग उस समय का है जब बुद्ध सावट्ठी नामक नगर में विहार कर रहे थे। दो ब्राह्मण वसेठ और भारद्वाज बौद्ध संघ में प्रवेश की इच्छा रखते थे, परंतु समाज ने उन्हें अपमानित किया। इस अपमान के संदर्भ में उन्होंने बुद्ध से मार्गदर्शन प्राप्त किया।
बुद्ध ने उनके साथ संवाद के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और आचरण से निर्धारित होती है।

सुत्त का अर्थ एवं उद्देश्य

‘अगन्ना’ शब्द का अर्थ है उत्पत्ति तथा ‘सुत्त’ का अर्थ है उपदेश या संवाद। इस प्रकार अगन्ना सुत्त का शाब्दिक अर्थ है- ‘उत्पत्ति से संबंधित संवाद’।
इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य मानव समाज, राज्य और जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का विवेचन करना तथा ब्राह्मणवादी दैवी सिद्धांतों का खंडन करना है।

अर्थात् सुत्त वह ग्रंथ या संवाद होता है जिसमें बुद्ध के उपदेशों और शिक्षाओं का संग्रह किया गया हो।
यह बौद्ध धर्म के सुत्त पिटक (Sutta Pitaka) का हिस्सा होता है, जो त्रिपिटक का एक प्रमुख विभाग है।

त्रिपिटक के तीन भाग:

  1. विनय पिटक — भिक्षुओं के आचार और अनुशासन से संबंधित
  2. सुत्त पिटक — बुद्ध के उपदेशों और संवादों का संग्रह
  3. अभिधम्म पिटक — बौद्ध दर्शन और मनोविज्ञान पर गूढ़ विवेचन

इस प्रकार, सुत्त का अर्थ केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि एक ऐसा संवाद है जो जीवन, समाज और सत्य के गहरे प्रश्नों पर बुद्ध की तर्कसंगत दृष्टि प्रस्तुत करता है।

जाति व्यवस्था पर बौद्ध दृष्टिकोण

बुद्ध ने ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित उस विचार का तीव्र विरोध किया जिसमें यह कहा गया था कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए हैं।
बुद्ध के अनुसार, सभी मनुष्य समान हैं, और उनकी श्रेष्ठता केवल उनके कर्म, आचरण और ज्ञान से निर्धारित होती है।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि —

‘कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी जाति में जन्मा हो, यदि वह धम्म का अनुयायी है, तो वही श्रेष्ठ है।’

गौतम बुद्ध ने अगन्ना सुत्त में ‘जाति व्यवस्था’ (Caste System) की दैवी उत्पत्ति (Divine Origin Theory) को अस्वीकार किया है।
उन्होंने यह स्पष्ट रूप से कहा कि जातियाँ ब्रह्मा के शरीर से नहीं, बल्कि मनुष्यों के कर्म और व्यवहार से उत्पन्न हुई हैं।

यह सुत्त दो ब्राह्मणों — वसेठ और भारद्वाज — के संवाद पर आधारित है, जिन्होंने बुद्ध से यह प्रश्न किया कि क्या वास्तव में ब्राह्मण जाति सर्वोच्च है?

बुद्ध के समय में यह धारणा प्रचलित थी कि:

‘ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए हैं।’

बुद्ध ने इस दैवी सिद्धांत (Divine Theory) को मूर्खतापूर्ण और असत्य बताया।
अगन्ना सुत्त के अनुसार —
प्रारंभ में पृथ्वी पर मनुष्य समान और पवित्र थे। उनमें न तो जाति का भेद था, न लिंग का, न ही संपत्ति का।
सभी लोग शुद्ध, आत्मनिर्भर और समान जीवन जीते थे।

धीरे-धीरे जब लालच, स्वार्थ और अहंकार उत्पन्न हुए, तब समाज में असमानताएँ बढ़ीं।
इसी सामाजिक परिवर्तन के साथ ‘विभिन्न कर्मों के आधार पर वर्ग’ बनने लगे और यही आगे चलकर ‘जातियाँ’ कहलाईं।

चार जातियों की उत्पत्ति का विवेचन

क्रमांकजाति का नाम (पाली/संस्कृत)उत्पत्ति का कारणअर्थ / कार्य
1️⃣ब्राह्मण (Brahmana)जिन्होंने बुरे कर्मों और पापों का त्याग कर तपस्या व संयम का मार्ग अपनायासमाज के मार्गदर्शक और शिक्षाकर्मी बने
2️⃣खटिया / क्षत्रिय (Khattiya)जो समाज की रक्षा और न्याय के लिए नियुक्त हुएशासक वर्ग — राजा, योद्धा
3️⃣वैस्स (Vessa)जिन्होंने कृषि, व्यापार और आर्थिक कार्य अपनाएसमाज का आर्थिक वर्ग
4️⃣सुड्डा / शूद्र (Sudda)जिन्होंने शिकार और श्रम को जीवन का आधार बनायासेवा एवं श्रमजीवी वर्ग

बुद्ध ने कहा कि जाति किसी व्यक्ति के नैतिक या आध्यात्मिक मूल्य को निर्धारित नहीं करती।
उन्होंने यह सिखाया कि: ‘जो व्यक्ति सद्कर्म करता है, वही ब्राह्मण है चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो।’

उन्होंने आगे यह भी कहा कि —

  • यदि ब्राह्मण दुष्कर्म करता है, तो वह अधम है।
  • यदि शूद्र धम्म का पालन करता है, तो वह उत्तम है।

अर्थात्, कर्म ही व्यक्ति की सच्ची पहचान है, जन्म नहीं।

जाति व्यवस्था का सामाजिक और नैतिक आधार

अगन्ना सुत्त में बुद्ध ने यह भी बताया कि जातियाँ समाज की आवश्यकता के अनुसार बनीं-
इसे उन्होंने ‘आवश्यकता सिद्धांत (Need Theory of Caste)’ कहा।
जब समाज जटिल होता गया, तब विभिन्न कार्यों और जिम्मेदारियों के लिए लोगों ने अपने कर्म के अनुसार स्थान ग्रहण किया।
इस प्रकार जाति एक कार्यगत व्यवस्था (Functional Order) के रूप में विकसित हुई, न कि ईश्वरीय व्यवस्था के रूप में।

बुद्ध का स्पष्ट मत था कि —

‘सभी मनुष्य एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं; उनमें कोई स्वाभाविक ऊँच-नीच नहीं है।’

उन्होंने कहा —

‘धम्म के अनुसार चलने वाला व्यक्ति ही सच्चा ब्राह्मण है; वह धम्म के मुख से उत्पन्न हुआ है।’

इस प्रकार बुद्ध ने जन्माधारित जाति व्यवस्था के स्थान पर कर्माधारित नैतिक समानता (Moral Equality) की स्थापना की।

धम्म का दार्शनिक स्वरूप

धम्म बौद्ध दर्शन का केंद्रीय तत्व है। बुद्ध के अनुसार धम्म कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि वह सार्वभौमिक नैतिक व्यवस्था (Cosmic Law and Order) है, जो समस्त प्राणी जगत को नियंत्रित करती है।
धम्म का पालन करने वाला व्यक्ति लोभ, मोह और द्वेष से मुक्त होकर निर्वाण की ओर अग्रसर होता है। अतः बुद्ध ने कहा कि जो व्यक्ति धम्म से उत्पन्न है, वही ‘भगवान का पुत्र’ है।

बुद्ध ने कहा कि धम्म केवल जानने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन जीने का मार्ग (Way of Life) है।
इसका सारांश त्रिशिक्षा (Threefold Training) में निहित है —

  1. शील (Sila) — नैतिक आचरण
  2. समाधि (Samadhi) — मन की एकाग्रता
  3. प्रज्ञा (Paññā) — सत्य ज्ञान

इन तीनों का पालन व्यक्ति को निर्वाण की ओर ले जाता है, जो धम्म का अंतिम लक्ष्य है।

अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन

बुद्ध ने दुःखों से मुक्ति के लिए ‘अष्टांगिक मार्ग’ (Eightfold Path) का निर्देश दिया, जिसमें आठ तत्व हैं-

  1. सम्यक दृष्टि (सत्य की यथार्थ पहचान)
  2. सम्यक संकल्प (हिंसा और मोह का त्याग)
  3. सम्यक वचन (सत्य और नैतिक भाषा)
  4. सम्यक कर्मांत (सद्कर्म)
  5. सम्यक आजीविका (न्यायपूर्ण आजीविका)
  6. सम्यक व्यायाम (सद्गुणों की वृद्धि)
  7. सम्यक स्मृति (चित्त की शुद्धि)
  8. सम्यक समाधि (एकाग्रता)

यह मार्ग बुद्ध के ‘मध्यम मार्ग’ के दर्शन को अभिव्यक्त करता है, जो भोग और संन्यास, दोनों की चरम सीमाओं से दूर है।

राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धांत

बुद्ध ने ‘राज्य’ की उत्पत्ति को दैवीय सिद्धांत का परिणाम न मानकर मानव-निर्मित विकासवादी प्रक्रिया बताया।
उनके अनुसार प्रारंभ में मनुष्य नैतिक, शांतिप्रिय और सुखी थे; किंतु धीरे-धीरे लोभ और हिंसा ने स्थान ले लिया।
अव्यवस्था को समाप्त करने के लिए लोगों ने आपसी समझौते से एक व्यक्ति को चुना, जिसे ‘महा सम्मत’ कहा गया अर्थात ‘जनता द्वारा अनुमोदित व्यक्ति’।
यहीं से शासन, कानून और कर प्रणाली का आरंभ हुआ। यह विचार आधुनिक लोकतंत्र (Democracy) की जड़ों की ओर संकेत करता है।

गौतम बुद्ध ने इसमें यह सिद्ध किया कि —

‘राज्य की उत्पत्ति किसी ईश्वरीय आदेश से नहीं, बल्कि मानव की सामाजिक आवश्यकताओं और नैतिक पतन से हुई है।’

अर्थात्, यह सिद्धांत दैवी सिद्धांत (Divine Theory) का खंडन करता है और एक वैज्ञानिक, तर्कसंगत और विकासवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

प्रारंभिक अवस्था – स्वर्ण युग (Golden Age)

अगन्ना सुत्त में कहा गया है कि आरंभ में पृथ्वी पर मनुष्य समान, शांतिप्रिय और नैतिक थे।

  • सभी लोग एक-दूसरे का सम्मान करते थे।
  • न तो चोरी थी, न हिंसा, न कोई शासक।
  • सभी स्वेच्छा से धम्म के अनुसार जीवन जीते थे।

यह अवस्था नैतिकता और समानता का युग थी, जिसे स्वर्ण युग कहा गया है।

पतन की शुरुआत (Moral Decline)

समय के साथ मनुष्य के मन में लालच, स्वार्थ और मोह उत्पन्न होने लगा।

  • कुछ लोगों ने अधिक अन्न, वस्तुएँ और संसाधन जमा करने शुरू किए।
  • चोरी और झूठ का जन्म हुआ।
  • लोगों में ईर्ष्या और हिंसा बढ़ने लगी।

इस प्रकार समाज में अराजकता (Anarchy) का वातावरण बन गया।

सामाजिक अनुबंध की आवश्यकता (Need for Order)

जब अव्यवस्था बढ़ी, तो लोगों ने आपसी विचार-विमर्श से यह निर्णय लिया कि —

‘हम ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करें जो सही और गलत में भेद करे, अपराधियों को दंड दे, और समाज में शांति स्थापित करे।’

लोगों ने उस व्यक्ति को चावल का एक भाग देकर उसकी सेवा का प्रतिफल दिया।
यह व्यक्ति समाज का पहला शासक बना —
उसे महा सम्मत (Mahā Sammata) कहा गया, जिसका अर्थ है —

‘जनता द्वारा चुना गया’ या ‘जनता की सहमति से नियुक्त।’

राज्य की स्थापना (Formation of State)

इस प्रकार ‘राज्य’ और ‘शासन’ की स्थापना किसी दैवी आदेश से नहीं, बल्कि मानव समाज के आपसी समझौते (Social Contract) से हुई।
राज्य की स्थापना के उद्देश्य थे –

  1. अपराधियों को दंड देना
  2. व्यवस्था और न्याय बनाए रखना
  3. नागरिकों की सुरक्षा करना
  4. समाज में नैतिकता पुनर्स्थापित करना

इस प्रकार राज्य एक सामाजिक संस्था (Social Institution) के रूप में विकसित हुआ।

संघ का संगठनात्मक ढाँचा

बुद्ध के काल में संघ (Sangha) का विकास तीन चरणों में हुआ —

  1. प्रारंभिक चरण — केवल बुद्ध के नियंत्रण में।
  2. मध्य चरण — वरिष्ठ भिक्षुओं को अधिकार प्राप्त हुआ।
  3. उत्तर चरण — संघ एक लोकतांत्रिक संस्था के रूप में विकसित हुआ।

संघ का संचालन सामूहिक निर्णयों और नैतिक अनुशासन पर आधारित था, जो प्रारंभिक लोकतांत्रिक प्रणाली का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

राजनीति और नैतिकता का संबंध

बुद्ध के अनुसार राजनीति का आधार धर्म और नैतिकता होना चाहिए। राजा का प्रमुख कर्तव्य है —

  • प्रजा की सुरक्षा,
  • न्यायपूर्ण कर व्यवस्था,
  • दुष्कर्मियों का दंड,
  • गरीबों की सहायता।

राजा को अपने निजी स्वार्थ या हिंसा के माध्यम से शासन नहीं करना चाहिए। अतः बुद्ध की राजनीति नैतिक शासन प्रणाली का आदर्श प्रस्तुत करती है।

निष्कर्ष

अगन्ना सुत्त केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक दस्तावेज़ है। यह सुत्त उस युग के जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और असमानता का तार्किक प्रतिवाद प्रस्तुत करता है।
गौतम बुद्ध ने इस सुत्त के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि-

  • मनुष्य की श्रेष्ठता कर्म और नैतिकता में है,
  • राज्य और समाज का विकास मानव सहमति और विवेक पर आधारित है,
  • और सच्चा धर्म वह है जो समानता, करुणा और ज्ञान की भावना को स्थापित करे।

इस प्रकार अगन्ना सुत्त भारतीय सामाजिक चिंतन में लोकतंत्र, समानता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रारंभिक दर्शन प्रस्तुत करता है।

 


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