यह कथन 18वीं शताब्दी के महान राजनीतिक दार्शनिक जाँ जैक रूसो की कृति Social Contract से लिया गया है। यह मानव स्वतंत्रता, समाज में सत्ता-संरचना और सामाजिक असमानता के जटिल संबंधों पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करता है। रूसो मानते थे कि प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य स्वतंत्र, समान और नैतिक रूप से सुशांत होता है, लेकिन समाज और उसकी संस्थाएँ उसे अनेक प्रकार के बंधनों में बाँध देती हैं।
अर्थ की व्याख्या:
- प्राकृतिक स्वतंत्रता:
जन्म के समय मनुष्य पर कोई राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक बंधन नहीं होते। वह स्वतंत्रता, समानता और आत्मनिर्णय के आधार पर जीवन प्रारम्भ करता है। - समाज में उत्पन्न बंधन:
सभ्यता के विकास के साथ व्यक्ति विभिन्न ‘जंजीरों’—
जैसे परंपराएँ, वर्ग विभाजन, संपत्ति असमानता, राजनीतिक सत्ता, और सामाजिक नियंत्रण—
के अधीन हो जाता है। - संपत्ति और असमानता:
रूसो के अनुसार निजी संपत्ति की उत्पत्ति ने सामाजिक विषमता को जन्म दिया, जिसने व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया। - राजनीतिक सत्ता की भूमिका:
शासक-शासित सम्बन्ध, कानूनों की कठोरता, और सत्ता का केंद्रीकरण भी व्यक्ति की प्राकृतिक स्वतंत्रता को बाधित करता है।
रूसो का समाधान – सामाजिक अनुबंध (Social Contract):
रूसो मनुष्य की स्वतंत्रता को पुनर्स्थापित करने के लिए सामूहिक इच्छा (General Will) पर आधारित राज्य की स्थापना का समर्थन करते हैं।
वे कहते हैं कि वास्तविक स्वतंत्रता तब मिलती है जब कानून सभी की सामूहिक इच्छा से बनता है, न कि किसी एक वर्ग या शासक की इच्छा से।
समकालीन प्रासंगिकता:
- लोकतांत्रिक शासन:
आधुनिक लोकतंत्र रूसो की विचारधारा पर आधारित हैं, जहाँ जनसहमति और समान अधिकारों को प्राथमिकता दी जाती है। - मानवाधिकार:
स्वतंत्रता, समानता और गरिमा पर आधारित मानवाधिकार घोषणाएँ रूसो की दार्शनिक पृष्ठभूमि को दर्शाती हैं। - सामाजिक असमानता:
आज भी जाति, वर्ग, लिंग और आर्थिक विषमता व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करती हैं—रूसो की आलोचना आज भी प्रासंगिक है। - नागरिक स्वतंत्रताएँ:
अत्यधिक राज्य नियंत्रण, निगरानी व्यवस्था, और दमनकारी नीतियाँ आधुनिक “जंजीरों” के रूप में देखी जा सकती हैं।
निष्कर्ष:
रूसो का यह कथन मानव स्वभाव, स्वतंत्रता और सामाजिक संस्थाओं के बीच टकराव का गहरा दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि समाज में वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब शासन सामूहिक इच्छा पर आधारित हो, असमानताएँ न्यूनतम हों और व्यक्ति की गरिमा को सर्वोपरि रखा जाए।
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