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निरंतर क्रांति का सिद्धांत: ट्राटस्की

निरंतर क्रांति का सिद्धांत रूसी मार्क्सवादी विचारक लियोन ट्रॉट्स्की (Leon Trotsky) द्वारा विकसित एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक सिद्धांत है। यह सिद्धांत बताता है कि क्रांति एक बार होने वाली घटना नहीं है, बल्कि एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जो समाज के विभिन्न चरणों से होकर निरंतर आगे बढ़ती है।

सिद्धांत का मूल आधार:

ट्रॉट्स्की का मानना था कि पूँजीवादी या सामंती समाजों में सामाजिक-आर्थिक ढाँचा इतना जटिल होता है कि क्रांति एक चरण में पूरी नहीं हो सकती।

इसलिए —

1. क्रांति चरणबद्ध नहीं, निरंतर होती है:

समाजवादी क्रांति, लोकतांत्रिक क्रांति के पूर्ण होने का इंतज़ार नहीं करती। दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ और निरंतर आगे बढ़ती हैं।

2. पिछड़े देशों में क्रांति की अनिवार्यता:

ट्रॉट्स्की के अनुसार विकासशील या अर्ध-सामंती देशों में भी मजदूर वर्ग क्रांति का नेतृत्व कर सकता है, भले ही पूँजीवादी ढाँचा परिपक्व न हो।

3. अंतरराष्ट्रीय क्रांति आवश्यक:

किसी एक देश में समाजवादी क्रांति स्थिर नहीं रह सकती।

समाजवाद की सफलता के लिए वैश्विक स्तर पर क्रांति का विस्तार आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • क्रांति निरंतर और अविराम प्रक्रिया है।
  • मजदूर वर्ग मुख्य नेतृत्वकर्ता है।
  • लोकतांत्रिक और समाजवादी क्रांतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
  • राष्ट्रीय सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय क्रांति अनिवार्य।
  • समाजवादी परिवर्तन का लक्ष्य व्यापक और दीर्घकालिक।

स्टालिन से भिन्नता:

स्टालिन “एक देश में समाजवाद” का समर्थक था, जबकि ट्रॉट्स्की ने कहा कि समाजवाद तभी सफल होगा जब पूरी दुनिया में क्रांति फैले।

यही विचारधारा सोवियत राजनीति में दोनों के संघर्ष का प्रमुख कारण बनी।

समकालीन प्रासंगिकता:

  • वैश्विक पूँजीवाद की परस्पर निर्भरता
  • असमानता, शोषण और श्रमिक अधिकारों के प्रश्न
  • क्रांतिकारी आंदोलनों में अंतरराष्ट्रीय एकजुटता

यह सिद्धांत आज भी क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलनों और राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

ट्रॉट्स्की बनाम मार्क्स : निरंतर क्रांति सिद्धांत की तुलना

1. मूल वैचारिक आधार

मार्क्स:

  • इतिहास आर्थिक आधार पर आगे बढ़ता है – दासप्रथा → सामंतवाद → पूँजीवाद → समाजवाद → साम्यवाद।
  • समाजवादी क्रांति तभी संभव जब पूँजीवादी उत्पादन पद्धति परिपक्व हो जाए और मजदूर वर्ग बहुत बड़ा हो जाए।

ट्रॉट्स्की:

  • इतिहास का विकास रैखिक, चरणबद्ध नहीं है।
  • पिछड़े देशों में भी मजदूर वर्ग क्रांति का नेतृत्व कर सकता है।
  • क्रांति “एक चरण के बाद दूसरा” नहीं, बल्कि सतत, अविराम होती है।

2. क्रांति की शर्तें

मार्क्स:

  • क्रांति की अनिवार्यता तब होती है जब पूँजीवादी समाज अपने ही अंतर्विरोधों से टूटने लगता है।
  • एक देश में परिपक्व औद्योगिक ढाँचा समाजवादी क्रांति की पूर्व-शर्त।

ट्रॉट्स्की:

  • विकासशील देशों में पूँजीवाद पूरी तरह परिपक्व नहीं होता, इसलिए मजदूर वर्ग और किसान मिलकर क्रांति का नेतृत्व कर सकते हैं।
  • पिछड़े देशों की क्रांति अलग नहीं बल्कि विश्व क्रांति से जुड़ी होगी।

3. भूमिकाओं का विश्लेषण

मार्क्स:

  • प्रोलतेरियत (मजदूर वर्ग) समाजवादी क्रांति का मुख्य नेतृत्व करेगा।
  • किसान वर्ग द्वितीयक भूमिका में।

ट्रॉट्स्की:

  • मजदूर वर्ग निर्णायक, लेकिन किसान उसके “सहयोगी” बनते हैं।
  • पिछड़े देशों में किसान बड़ी शक्ति हैं, इसलिए मजदूर-किसान संयुक्त मोर्चा आवश्यक।

4. क्रांति की प्रकृति

मार्क्स:

  • क्रमिक और चरणबद्ध – लोकतांत्रिक क्रांति → समाजवादी क्रांति।
  • हर चरण का अपना अलग सामाजिक आधार होता है।

ट्रॉट्स्की:

  • लोकतांत्रिक और समाजवादी क्रांति के बीच कोई दीवार नहीं; दोनों एक साथ और निरंतर चलती हैं।
  • कोई अंतिम ‘समाप्ति बिंदु’ नहीं – क्रांति आगे बढ़ती रहती है।

5. अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

मार्क्स:

  • मार्क्स ने अंतरराष्ट्रीय मजदूर एकता पर ज़ोर दिया, पर क्रांति के प्रसार पर विशिष्ट सिद्धांत विकसित नहीं किया।

त्रॉट्स्की:

  • समाजवाद एक देश में सफल नहीं हो सकता।
  • यदि क्रांति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं फैली, तो वह दबा दी जाएगी।
  • इसलिए “Permanent Revolution = International Revolution”.

6. स्टालिनवाद से दूरी

यह मार्क्स के मुकाबले ट्रॉट्स्की की सबसे व्यावहारिक आलोचना थी:

मार्क्स:

  • एक देश में समाजवाद का विचार उनके ग्रंथों में स्पष्ट रूप से नकारा गया है, लेकिन उन्होंने इस पर विस्तृत रणनीति नहीं दी।

ट्रॉट्स्की:

  • स्टालिन के “एक देश में समाजवाद” को पूरी तरह अवैज्ञानिक कहा।
  • कहा कि समाजवाद तभी टिकेगा जब पूरा विश्व पूँजीवाद से मुक्त होगा।
  • मार्क्स ने क्रांति को चरणबद्ध आर्थिक विकास की परिणति माना, जबकि ट्रॉट्स्की ने क्रांति को सतत राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में देखा।मार्क्स पूँजीवाद की परिपक्वता को आवश्यक शर्त मानते हैं, जबकि ट्रॉट्स्की औद्योगिक रूप से पिछड़े देशों में भी समाजवादी क्रांति की संभावना को स्वीकारते हैं।

    ट्रॉट्स्की का सिद्धांत मार्क्सवाद का व्यावहारिक, अंतरराष्ट्रीय और क्रांतिकारी विस्तार है।


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