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भारतीय निर्वाचन तंत्र में समितियाँ एवं सुधार : समयानुसार महत्वपूर्ण बदलाव

क्रम

समिति / आयोग का नाम

वर्ष

अध्यक्ष / प्रमुख

मुख्य उद्देश्य / अनुशंसाएँ

1

तारकुंडे समिति

1974

जे. पी. तारकुंडे

स्वतंत्र चुनाव आयोग, मतदाता सूची सुधार, लोकसभा/विधानसभा में जनप्रतिनिधित्व सुधार।

2

धनकर आयोग (गोस्वामी समिति से पहले)

1977

जे. एम. धनगर

चुनावी भ्रष्टाचार रोकने और खर्च नियंत्रण हेतु सुझाव।

3

गोस्वामी समिति (चुनाव सुधार समिति)

1990

दिनेश गोस्वामी

चुनाव खर्च नियंत्रण, आपराधिक तत्वों पर रोक, मॉडल कोड को कानूनी दर्जा।

4

वेणुगोपाल समिति

1998

के. वेणुगोपाल

EVM के व्यापक उपयोग, मतदाता सूची सुधार और बूथ स्तर पारदर्शिता।

5

इंद्रजीत गुप्ता समिति

1998

इंद्रजीत गुप्ता

राजनीतिक दलों को सरकारी फंडिंग देने की सिफारिश।

6

लॉ कमीशन (170वीं रिपोर्ट)

1999

विधि आयोग

राजनीतिक दलों का पंजीकरण/विनियमन, चुनाव प्रणाली सुधार।

7

राष्ट्रीय आयोग–संवैधानिक समीक्षा (NCRWC)

2001

एम. एन. वेंकटचलैया

चुनाव आयोग की शक्तियों को बढ़ाना; भ्रष्टाचार रोकना।

8

विधि आयोग (2015 रिपोर्ट – 255वीं)

2014–2015

ए. पी. शाह

दागी नेताओं पर रोक, आंशिक सरकारी फंडिंग, आपराधिक राजनीति समाप्त करना।

9

चुनाव आयोग–NITI Aayog संयुक्त प्रस्ताव

2016–2017

एक राष्ट्र–एक चुनाव (One Nation, One Election) पर सुझाव।

10

विधि आयोग (2018 रिपोर्ट – 277वीं)

2018

जस्टिस बी. एस. चौहान

एक राष्ट्र–एक चुनाव, NOTA सुधार, EVM–VVPAT विश्वसनीयता बढ़ाना।

11

एक राष्ट्र–एक चुनाव विशेषज्ञ समिति

2023

रामनाथ कोविंद

देश में एक साथ चुनाव कराने पर विस्तृत रिपोर्ट और सुझाव।

1996 से पहले भारत में कई महत्वपूर्ण चुनाव सुधार किए गए, जिनका मकसद चुनावों को ज्यादा साफ, ईमानदार और आसान बनाना था। सबसे बड़ा बदलाव 1988 में हुआ जब 61वें संविधान संशोधन के द्वारा वोट देने की उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल कर दी गई। इससे देश के युवाओं को पहली बार बड़े पैमाने पर चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने का मौका मिला।

इसके बाद 1989 में यह नियम बनाया गया कि मतदाता सूची बनाने, उसे ठीक करने और चुनाव से जुड़े दूसरे काम करने वाले सभी कर्मचारी चुनाव आयोग के अधीन काम करेंगे। इससे चुनाव आयोग की शक्ति बढ़ी और चुनावों पर सरकारी दबाव कम हुआ, जिससे चुनाव ज्यादा निष्पक्ष बने।

इसी समय नामांकन प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया। अब राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में किसी उम्मीदवार के नामांकन पत्र पर ज्यादा प्रस्तावक (supporters) जरूरी कर दिए गए। यह इसलिए किया गया ताकि गैर-गंभीर लोग चुनाव न लड़ सकें और चुनाव प्रक्रिया में अनुशासन बना रहे।

चुनाव प्रक्रिया को आधुनिक बनाने के लिए 1989 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल करने की व्यवस्था की गई। इसका प्रयोग 1998 में कुछ राज्यों में किया गया, और 1999 में गोवा में पहली बार पूरे राज्य में सिर्फ EVM से चुनाव करवाए गए।

चुनावों में बूथ कैप्चरिंग एक बड़ी समस्या थी। इसे रोकने के लिए 1989 में चुनाव आयोग को यह अधिकार दिया गया कि अगर किसी जगह जबरन मतदान केंद्र पर कब्जा किया जाए, मतदाताओं को धमकाया जाए या EVM/मतपत्र छीन लिए जाएँ, तो वह चुनाव को रद्द या स्थगित कर सकता है। इससे चुनाव प्रक्रिया ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद हुई।

बसे बड़ा सुधार फोटो पहचान पत्र (EPIC) का था। चुनाव आयोग ने 1993 में यह निर्णय लिया कि देश के सभी मतदाताओं को फोटोयुक्त पहचान पत्र जारी किए जाएँ। इसका उद्देश्य फर्जी मतदान को रोकना, किसी दूसरे व्यक्ति की जगह वोट डालने की प्रथा समाप्त करना और मतदान प्रक्रिया को तेज और भरोसेमंद बनाना था। EPIC जारी करने का आधार मतदाता सूची ही रखा गया। इससे चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ी।

इसके बाद 1996 में कुछ महत्वपूर्ण सुधार और लागू किए गए। एक महत्वपूर्ण सुधार था उम्मीदवारों के नामों को व्यवस्थित रूप से सूचीबद्ध करने की नई व्यवस्था। अब उम्मीदवारों को तीन वर्गों में रखा जाने लगा(1) मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार, (2) पंजीकृत पर गैर-मान्यता प्राप्त दलों के उम्मीदवार, और (3) निर्दलीय उम्मीदवार। मतपत्र और उम्मीदवार सूची में इन्हें इसी क्रम में रखा जाता है और हर श्रेणी में नाम वर्णक्रमानुसार लिखे जाते हैं। इससे मतदाताओं के लिए नाम ढूँढना आसान हो गया और भ्रम की संभावना कम हुई।

एक अन्य महत्वपूर्ण सुधार था राष्ट्रीय गौरव का अनादर करने पर अयोग्यता। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता है, संविधान का अनादर करता है या राष्ट्रगान गाने से रोकता है, तो वह छह वर्ष तक लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता। यह प्रावधान राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा बनाए रखने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।

इसके अतिरिक्त, चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए मतदान से 48 घंटे पहले शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया। इस अवधि में मतदान क्षेत्र में किसी भी दुकान, होटल, ढाबे या सार्वजनिक/निजी स्थान पर शराब या नशीले पेय की बिक्री या वितरण पूरी तरह वर्जित है। इसका उद्देश्य मतदाताओं को प्रलोभन से बचाना और शांतिपूर्ण वातावरण सुनिश्चित करना था।

भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला हैं। समय–समय पर चुनाव प्रक्रिया में उत्पन्न समस्याओं और बढ़ती जटिलताओं को देखते हुए यह आवश्यक हो गया था कि चुनाव प्रणाली का पुनरावलोकन किया जाए और उसमें सुधार किए जाएँ। इसी उद्देश्य से वर्ष 1989–90 में वी.पी. सिंह सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया।

सरकार के कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया, जिसे सामान्यतः दिनेश गोस्वामी समितिकहा जाता है। इस समिति का मुख्य उद्देश्य था

चुनाव प्रणाली का विस्तृत अध्ययन करना,
उसमें मौजूद त्रुटियों और कठिनाइयों की पहचान करना,
उन्हें दूर करने के लिए तर्कसंगत सुझाव देना।

समिति ने तेजी से कार्य करते हुए 1990 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। इस रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे। इन सुझावों में से कुछ को बाद में 1996 में लागू किया गया, जिससे चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और मतदाता–हितैषी बन गई।

दिनेश गोस्वामी समिति की सिफारिशों के आधार पर चुनाव आयोग नेउम्मीदवारों की सूची और मतपत्र (Ballot Paper) को व्यवस्थित और सरल बनाने के लिए एक नई प्रणाली लागू की।

पहले कई बार मतपत्र देखने में भ्रम होता था, उम्मीदवारों के नाम अनियमित क्रम में होते थे, जिससे मतदाता को कठिनाई होती थी। इसे दूर करने के लिए उम्मीदवारों को तीन स्पष्ट वर्गों में विभाजित किया गया:

1. मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार

ये वे उम्मीदवार हैं जिन्हें चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त है। इन्हें प्राथमिक श्रेणी में रखा गया।

2. पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार

ये ऐसे दल हैं जो चुनाव आयोग में पंजीकृत तो हैं लेकिन उन्हें आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। इन्हें दूसरी श्रेणी में रखा गया।

3. अन्य (निर्दलीय) उम्मीदवार

ये वे उम्मीदवार हैं जो किसी भी राजनीतिक दल से नहीं जुड़ते और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हैं। इन्हें तीसरी श्रेणी में रखा गया।

सुधार का महत्व

यह सुधार चुनाव प्रक्रिया के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ। इससे—

मतदाताओं को उम्मीदवारों को पहचानने और ढूँढ़ने में आसानी हुई,
भ्रम और अव्यवस्था समाप्त हुई,
मतपत्र अधिक साफ, व्यवस्थित और पढ़ने योग्य बन गया,
और चुनाव निष्पक्षता तथा पारदर्शिता को बढ़ावा मिला।

1990 के बाद चुनावी सुधार

चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए सबसे ज़रूरी माना गया किउम्मीदवारों की पृष्ठभूमि मतदाताओं को साफ़-साफ़ दिखाई दे। इसी सोच से 2003 में एक बड़ा निर्णय लिया गया। अब हर उम्मीदवार को अपने नामांकन पत्र के साथ अपनी संपत्ति, शिक्षा, आपराधिक मामलों और सजा से संबंधित सभी विवरण अनिवार्य रूप से देना होता है। यदि उम्मीदवार किसी ऐसे मुकदमे में अभियुक्त है जिसमें दो वर्ष या उससे अधिक की सजा हो सकती है, तो उसे उस मामले का पूरा विवरण voters के सामने रखना पड़ता है। इससे मतदाता अधिक सूझबूझ के साथ निर्णय कर सकते हैं।

इसी अवधि में चुनावों को अधिक गंभीर बनाने और बिना समर्थन वाले लोगों की भीड़ को रोकने के लिए जमानत राशि भी बदली गई। पहले सिर्फ 2500 रुपये जमानत देनी पड़ती थी, जिसके कारण कई लोग बिना किसी उद्देश्य के चुनाव लड़ लेते थे। इस समस्या को कम करने के लिए राशि को बढ़ाकर 15,000 रुपये कर दिया गया, ताकि सिर्फ वही लोग चुनाव में आएँ जिनके पास वास्तव में जनसमर्थन और गंभीरता हो।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग को चुनाव के दौरान पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध हों, यह सुनिश्चित करने के लिए 1998 में एक और व्यवस्था शुरू की गई। इसके तहत राष्ट्रीयकृत बैंकों, विश्वविद्यालयों, जीवन बीमा निगम, स्थानीय निकायों और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों के कर्मचारियों को भी चुनाव ड्यूटी पर बुलाया जा सकता है। इससे चुनाव संचालन अधिक सुगठित और आसान हुआ।

मतदान सुविधा को सरल बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। 1990 में उन मतदाताओं के लिए डाक मतपत्र (Postal Ballot) की व्यवस्था की गई जो किसी कारणवश अपने मतदान क्षेत्र में उपस्थित नहीं हो सकते—विशेषकर वे सरकारी कर्मचारी जिन्हें चुनाव कार्य में लगाया जाता है। चुनाव आयोग समय-समय पर अन्य श्रेणियों को भी इस सुविधा के तहत शामिल कर सकता है, और जिन मतदाताओं को यह सुविधा मिलती है, वे सिर्फ इसी माध्यम से वोट डाल सकते हैं।

ऐसे ही, दूरस्थ क्षेत्रों में तैनात सैनिकों और अर्धसैनिक बलों के जवानों की मदद के लिए 2003 में प्रॉक्सी मतदान (Proxy Voting) की सुविधा शुरू की गई। इस व्यवस्था में सैनिक अपने स्थान पर किसी विश्वसनीय व्यक्ति को ‘प्रॉक्सी’ नियुक्त कर सकते हैं, जो उनके behalf पर मतदान करता है। इसके लिए सैनिक को केवल एक निर्धारित प्रपत्र भरकर अपने निर्वाचन क्षेत्र के अधिकारी को इसकी सूचना देनी होती है।

इन्हीं सुधारों के बीच, चुनाव से संबंधित एक और अहम बदलाव 1977 में किया गया। पहले राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पद के लिए भी कई ऐसे लोग नामांकन भर देते थे जिन्हें न्यूनतम समर्थन भी प्राप्त नहीं था। इससे चुनाव प्रक्रिया जटिल बन जाती थी। इसलिए राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए सिफारिश करने वाले निर्वाचकों की संख्या 10 निर्धारित की गई। उप-राष्ट्रपति चुनाव में भी यही नियम लागू हुआ, ताकि केवल गंभीर और समर्थ उम्मीदवार ही चुनाव मैदान में आएँ।

2010 के बाद

क्रम

सुधार

वर्ष / अवधि

मुख्य बिंदु

1

राष्ट्रीय मतदाता दिवस

2011

हर साल 25 जनवरी को मतदाताओं को जागरूक बनाने के लिए मनाया जाता है।

2

फोटो मतदाता सूची व डिजिटल डेटाबेस

2010 के बाद निरंतर

फर्जी मतदाताओं को हटाने, डुप्लीकेट नाम बंद करने और साफ़ मतदाता सूची बनाने के लिए तकनीक का उपयोग।

3

NOTA की शुरुआत

2013

मतदाता को सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का विकल्प मिला; EVM में अलग बटन।

4

चुनावी खर्च सीमा में वृद्धि

2014 के बाद

लोकसभा चुनाव खर्च सीमा बड़े राज्यों में 70 लाख, छोटे राज्यों में कम।

5

एक्ज़िट पोल पर प्रतिबंध

2010–2014

मतदान शुरू होने से लेकर खत्म होने के 30 मिनट बाद तक एक्जिट पोल प्रतिबंधित; उल्लंघन पर सजा/जुर्माना।

6

पोस्टल बैलेट सुविधा का विस्तार

2010 के बाद

सरकारी कर्मचारियों, सशस्त्र बलों, और विदेशों में रहने वाले भारतीयों को पोस्टल बैलेट की सुविधा।

7

GPS व वीडियो रिकॉर्डिंग

2015 के बाद

मतदान केंद्रों की रियल-टाइम निगरानी, COMET सिस्टम की स्थापना।

8

राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता

2017 के बाद

20,000 रुपये से अधिक के चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देना अनिवार्य।

9

दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिक सुविधा

2019 के बाद

रैंप, व्हीलचेयर, हेल्पडेस्क, घर से मतदान जैसी सुविधाएँ।

10

NRI वोटिंग सुधार

2018–2019

NRI मतदाताओं के लिए प्रॉक्सी वोटिंग और ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था।


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